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गोर्की भाई

इतना तो तभी समझ गया था कि गोर्की भाई के साथ यह आखिरी मुलाकात है। इंद्रेश अस्पताल में एक शय्या पर लेटे हुए उनकी आंखें बंद थीं और सांस धीरे-धीरे चल रही थी। मेरी स्मृति में बचपन के दृश्य घुमड़-घुमड़कर आ गए। गोर्की भाई हम बच्चों के क्या कुछ नहीं थे। पौड़ी में तब बर्फ भरपूर पड़ा करती थी। गोर्की भाई हमारे लिए बर्फ के इगलू बनाया करते। 

उनका नाम वरुण नयाल था, लेकिन हम उन्हें गोर्की भाई कहा करते थे। पहाड़ की लाल मिट्टी के कितने ही खिलौने वह हमारे लिए बनाते थे- आम, सेब, गुड़िया, हिरण... और फिर उनमें रंग भरते। हमें मिट्टी ओलना भी सिखाते। पहाड़ों की मिट्टी खिलौने बनाने के उपयुक्त नहीं होती, चटक जाती है, लेकिन गोर्की भाई उसे कोई न कोई आकार दे ही देते थे। जाहिर है, गणित-अंग्रेजी तो वह हमें समझाते ही थे। वह जितने मेधावी और अध्ययनशील थे, उन्हें जीवन में बहुत आगे जाना था। मगर किस्मत उनके लिए अच्छे दिन लेकर नहीं आई। शायद युवावस्था में ही उन्हें मष्तिष्क की कोई बीमारी हो गई थी। तभी से वह नितांत अकेले रहने लगे थे... हमारे गोर्की चले गए। गोर्की भाई तुम्हारी याद आ रही है। अपना बचपन भी याद आ रहा है। कितने खुशनसीब होते हैं वे बच्चे, जिनके मोहल्ले में कोई गोर्की भाई जैसा होता है?

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  • Web Title:Cyber sansaar article in HIndustan on 07 September