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प्रेम की पराकाष्ठा

लिव-इन की जिस परिपाटी को आज हम फलता-फूलता पा रहे हैं, अमृता प्रीतम ने इसकी नींव 1966 में ही रख दी थी। तब उनकी जगहंसाई तो होनी ही थी, पर इससे उनके रिश्ते में कभी न कोई फर्क आना था, न आया। और न ही उनकी जिंदगी पर इसका कभी कोई असर रहा। साहिर और इमरोज से अपने रिश्ते को बयान करती हुई अमृता कहती हैं, ‘साहिर मेरी जिंदगी के लिए आसमान हैं, और इमरोज मेरे घर की छत।’ इमरोज से बेपनाह प्यार के बावजूद भी वह अगर साहिर से अपने प्यार को भूल न सकीं, तो बस इसलिए कि स्त्रियां अपने हिस्से के सुख-दुख को कभी विदा नहीं करतीं। एक यह भी कारण हो सकता है कि अपने लाख बगावती तेवर के बावजूद वह अपनी पहली शादी से मिले पति के नाम प्रीतम, यानी प्रीतम कौर के प्रीतम को जिंदगी भर साथ लेकर चलती रहीं।

अगर प्यार कोई शब्द है, तो अमृता ने उसे अपनी कलम की स्याही में बसा लिया था। अगर वह कोई स्वर है, तो वह अमृता के जीवन का स्थाई सुर रहा। जिस तरह अमृता ने इमरोज के लिए यह कहा कि अगर स्वाधीनता दिवस किसी इंसान की शक्ल ले सकता है, तो वह तुम हो। ठीक उसी तरह प्रेम अगर किसी इंसान की शक्ल में आए, तो उसकी शक्ल अमृता जैसी होगी।

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  • Web Title:Cyber sansaar article in HIndustan on 03 September