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तबला वादन और स्त्री

एक दफा मैं तबला सीखने गया, तो संगीत-शिक्षक ने कहा कि पहले उंगलियों के जोड़ों पर मुक्के मार-मारकर उन्हें सख्त बनाऊं। यह सुनकर मैं भाग आया। लेकिन जिनकी उंगलियां तवे पर रोटियां सेंकते और ओखरी में अनाज कूटते सख्त नहीं हुईं, उनका तबला बजाकर क्या होगा? यह बस यूं ही प्रचलन हो गया होगा कि पुरुष तबला बजाएंगे और महिलाएं ताल पर नृत्य करेंगी। महिला तबला बजाए और पुरुष नृत्य करे, तो? कल साबिर खान की सारंगी के साथ अनुराधा पाल को तबला बजाते देख रहा था। पहले भी देखा है, लेकिन अब उंगलियों पर गौर करने लगा। सुंदर, लंबी-नुकीली उंगलियां और क्या सुंदर ताल! कई दफे स्त्रियां जब मानकों को तोड़ती हैं, तो उग्र हो जाती हैं कि मर्दों के छक्के छुड़ा दूं। गाड़ी तेज चलाना, कलाबाजियां करना। पर अनुराधा जी ने इस अंतद्र्वंद्व पर अलग तरीके से काबू पाया है। उन्होंने स्त्रीत्व को ही शक्ति बनाया, पौरुष लाने का प्रयास नहीं किया। उनकी एक जुगलबंदी देखी, जिसमें वह दो दायां और एक बायां लेकर अकेले बजा रही हैं। एक बार वह मातृ-रूप लेकर बजाती हैं और एक बार पुत्री-रूप लेकर। दोनों का तारतम्य यूं बिठाया कि यह पुरुष से संभव ही नहीं। मातृत्व पुरुष नहीं ला सकते। स्त्री की शक्ति स्त्री में ही निहित है, उसे आयात नहीं करना।

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  • Web Title:cyber sansaar article in HIndsutan on 05 november