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दलित राजनीति की एक नई उम्मीद

मायावती के राजनीतिक पराभव के साथ ही नई चेतना लेकर चंद्रशेखर आजाद का अभ्युदय हिंदी प्रदेश में नई दलित राजनीति की उम्मीद पैदा करता है। इस बार बेहद जटिल चुनावी माहौल में आजाद समाज पार्टी (कांशीराम) के...

दलित राजनीति की एक नई उम्मीद
Monika Minalहिन्दुस्तानFri, 14 Jun 2024 10:38 PM
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मायावती के राजनीतिक पराभव के साथ ही नई चेतना लेकर चंद्रशेखर आजाद का अभ्युदय हिंदी प्रदेश में नई दलित राजनीति की उम्मीद पैदा करता है। इस बार बेहद जटिल चुनावी माहौल में आजाद समाज पार्टी (कांशीराम) के उम्मीदवार के रूप में संसद के लिए आजाद का चुना जाना न सिर्फ प्रतीकात्मक है, वरन महत्वपूर्ण भी है। वह बहुकोणीय मुकाबले में भाजपा, सपा, बसपा, तीनों दलों को हराकर विजयी हुए हैं। जाहिर है, बसपा की लंबी सियासी निष्क्रियता से निराश और हताश दलित समुदाय ने चंद्रशेखर की बातों में रोशनी देखी और धीरे-धीरे वह उनकी ओर आकर्षित हुआ। आजाद सरकारी दमन का सामना करते हुए निर्भीक होकर दलित जागरण के अपने न्यायसंगत ध्येय की दिशा में बढ़ते रहे। विपक्षी ‘इंडिया’ ब्लॉक ने उन्हें अपने साथ शामिल नहीं किया, हालांकि उनके संघर्ष से इंडिया को और इंडिया के प्रति जनता के झुकाव से आजाद समाज पार्टी को मदद मिली है। सबसे उल्लेखनीय बात है कि भारत के अति ताकतवर प्रधानमंत्री अपने क्षेत्र वाराणसी से डेढ़ लाख वोट से जीते और चंद्रशेखर भी नगीना से डेढ़ लाख वोट से ही जीते! आजाद का जीतना दलित राजनीति में एक नए दौर के आविर्भाव का द्योतक है।
अजय तिवारी, टिप्पणीकार
उम्मीद की लौ
उत्तर प्रदेश की नगीना सीट से चंद्रशेखर आजाद व कैराना से इकरा हसन की जीत के गहरे निहितार्थ हैं। चंद्रशेखर में गजब का आत्मविश्वास और संघर्ष का जज्बा है। एकदम आम आदमी की भाषा में बात करते हुए सीमा के भीतर दृढ़ता देखकर मेरी कामना थी कि ऐसे लोगों को संसद में होना चाहिए। विरासत की बात तो दूर, इनको न मायावती ने और न ही अखिलेश ने प्रश्रय दिया। यह युवा अकेले शेर की तरह लड़ता हुआ संसद में पहुंचने में सफल रहा। इसी तरह, इकरा हसन ऐसी मुस्लिम युवती हैं, जो इंग्लैंड में पढ़ी हैं। एक ऐसे समुदाय में, जिसे अपेक्षाकृत बंद समाज माना जाता है, इकरा हसन एक प्रेरक प्रतीक बन सकती हैं। उनकी शालीनता और हर समुदाय की युवतियों व ्त्रिरयों से अपनापे का व्यवहार समाज की सोच को प्रभावित करेगा। यह बात जरूर है कि राजनीति को बदलने के संकल्प के साथ संसद जाने वालों को ही राजनीति बदल देती है। मगर इसका यह अर्थ नहीं कि हम हर कोशिश को संदिग्ध मान नकारात्मक ही सोचें। अगर मान लें कि ऐसा ही होता है, तब भी हम अगले किसी चंद्रशेखर आजाद और इकरा हसन की प्रतीक्षा करेंगे। गहन और विराट अंधकार में हम तो एक टिमटिमाती लौ से ही आह्लादित होने वाले लोग हैं।
कर्मेंदु शिशिर, टिप्पणीकार
वंचितों की मुक्ति का कोई विजन नहीं 
चंद्रशेखर आजाद को अभी ही दलित राजनीति का युवा और भरोसेमंद चेहरा बता देना जल्दबाजी होगी। इसकी एक बड़ी वजह तो यही है कि खुद दलितों का उन पर विश्वास नहीं जम सका है। अगर यह भरोसा बना होता, तो छत्तीसगढ़, बिहार, दिल्ली, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में चंद्रशेखर की पार्टी आसपा को हार नहीं मिलती। चंद्रशेखर की जीत मूलत: उनकी निजी कोशिशों का नतीजा है। संघर्ष को उन्होंने अपना हथियार बना लिया है, इसलिए लोगों ने उनको पसंद किया, लेकिन यह पसंद व्यक्तिगत स्तर पर है, पार्टी के स्तर पर नहीं। अगर उनको वाकई दलित राजनीति का एक स्थायी चेहरा बनना है, तो सबसे पहले दलित मुक्ति का एक व्यावहारिक नजरिया पेश करना होगा। दलित चिंतक कंवल भारती के शब्दों में कहें, तो वह तात्कालिक परिस्थितियों पर ही प्रतिक्रिया देते हैं, निजीकरण, उदारीकरण से लेकर दलित उत्थान के बारे में उनका अपना कोई विचार अब तक सामने नहीं आ सका है। 
वास्तव में, जिस तरह से बिहार की पूर्णिया सीट पर पप्पू यादव को जीत मिली है, चंद्रशेखर की जीत को भी इसी चश्मे से देखा जाना चाहिए। इसका दलित राजनीति पर खास असर नहीं पड़ेगा, क्योंकि वह आक्रामक तो हैं, पर संगठन क्षमता के मामले में उन्हें अभी खुद को साबित करना है। यहां हमें इस सच को भी नहीं भूलना चाहिए कि समाज में बहुजन समाज पार्टी की उपस्थिति अब भी ठीक-ठाक है। माना यही जाता है कि अब भी उसके पास तकरीबन नौ फीसदी कोर वोटर हैं, जबकि आजाद समाज पार्टी की तो बस शुरुआत ही हुई है। 
इसका साफ संकेत है कि बसपा के दिन अभी नहीं लदे हैं। चुनावी हार के बाद जिस तरह से मायावती सक्रिय हो गई हैं, वह एक बड़ा संकेत है। बीच चुनाव में ही उन्होंने अपने भतीजे आकाश आनंद को भी तमाम दायित्वों से मुक्त कर दिया था। स्पष्ट है, वह अपनी कमजोर पड़ती उपस्थिति को मजबूत बनाना चाहती हैं और इसके लिए प्रभावी कार्य-योजना तैयार की जा रही है। माना यह भी जा रहा है कि वह अब कहीं बड़े दिल के साथ उम्मीदवारों का चयन करेंगी, क्योंकि 2007 में जब वह सत्ता में आई थीं, तब उनके साथ पिछड़ा, अति पिछड़ा और गैर-जाटव, तमाम वर्गों के लोग थे। एक बार फिर वह उसी रणनीति को अपना सकती हैं। अगर ऐसा होता है, तो चंद्रशेखर की राह और मुश्किल हो जाएगी। देश की दलित राजनीति में मायावती एक स्थापित नाम हैं, जबकि चंद्रशेखर को जमीनी स्तर पर अभी अपनी पहचान बनानी है। 
रंजीत राम, टिप्पणीकार