
इस संविधान संशोधन की सख्त जरूरत
संक्षेप: भारतीय राजनीति में कभी यह परंपरा थी कि जैसे ही किसी मंत्री या सांसद पर गंभीर आपराधिक आरोप लगते या उनकी गिरफ्तारी होती, तो वह स्वेच्छा से पद छोड़ देता था…
भारतीय राजनीति में कभी यह परंपरा थी कि जैसे ही किसी मंत्री या सांसद पर गंभीर आपराधिक आरोप लगते या उनकी गिरफ्तारी होती, तो वह स्वेच्छा से पद छोड़ देता था। लालकृष्ण आडवाणी ने जैन हवाला कांड में नाम आते ही लोकसभा की अपनी सदस्यता त्याग दी थी और स्पष्ट कहा था कि दोषमुक्त होने तक संसद नहीं लौटेंगे। ऐसी परंपराएं राजनीतिक जीवन में नैतिकता को मजबूत करती थीं और जनता में उसके प्रति विश्वास बढ़ाती थीं।
मगर आज स्थिति बदल गई है। अब नेता गंभीर मामलों में गिरफ्तार होने पर भी पद से चिपके रहते हैं। कुछ तो जेल में रहते हुए भी सरकार चलाने का दावा करते हैं। अरविंद केजरीवाल का उदाहरण सबके सामने है, क्योंकि उन्होंने इस्तीफा देने से इनकार कर दिया था। यह लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए वाकई चिंता का विषय है, क्योंकि इससे शासन की विश्वसनीयता पर सवाल उठते हैं। इसी पृष्ठभूमि में यह विधेयक पेश किया गया है कि केंद्र या राज्यों के मंत्री यदि किसी संगीन मामले में गिरफ्तार होते हैं और 30 दिनों के लिए जेल जाते हैं, तो उन्हें इस्तीफा देना होगा। ऐसा न करने पर वे स्वतः पदमुक्त मान लिए जाएंगे। संविधान सभा ने सोचा था कि कोई उच्च पद पर आसीन व्यक्ति ऐसी स्थिति आने पर खुद ही पद छोड़ देगा, इसलिए उसने कोई विशेष प्रावधान नहीं किया। मगर आज की राजनीति में जब नैतिकता बेहद कमजोर पड़ चुकी है, तब संविधान संशोधन अपरिहार्य हो गया है।
फिर भी, विपक्ष, विशेषकर ममता बनर्जी जैसी नेता, इसे ‘सुपर आपातकाल’ बताकर विरोध कर रही हैं। उनका तर्क है कि केंद्र में सत्तासीन दल राजनीतिक लाभ उठाने के लिए विपक्षी नेताओं को झूठे मामलों में फंसा सकता है और उनसे मंत्री पद छीन सकता है। बेशक, यह चिंता पूरी तरह निराधार नहीं है, क्योंकि हमारे देश में जांच एजेंसियों के दुरुपयोग की शिकायतें समय-समय पर सामने आती रही हैं, लेकिन इस व्यवस्था में सत्ता पक्ष के लिए भी कोई छूट नहीं रखी गई है। यह नियम सब पर समान रूप से लागू होगा। यदि इसे निष्पक्ष भाव से देखें, तो यह लोकतंत्र की मर्यादा बनाए रखने और राजनीति में स्वच्छता लाने का मजबूत प्रयास है। हां, इसका उपयोग करते हुए यह सुनिश्चित करना होगा कि जांच एजेंसियों का दुरुपयोग न हो और मंत्रियों की गिरफ्तारी के ठोस आधार हों, यानी बिना ठोस सुबूत के उनकी गिरफ्तारी न हो। इस तरह के प्रावधान इसमें जोड़े जा सकते हैं। इसलिए यह विधेयक लोकतंत्र की गरिमा बहाल करने के लिए लाया गया है, हालांकि इसके साथ निष्पक्षता और पारदर्शिता की गारंटी भी उतनी ही जरूरी है।
मधु बुड़ावनवाला, टिप्पणीकार
विपक्ष के खिलाफ इसका इस्तेमाल होगा
राजनीति को स्वच्छ बनाने के लिए नेताओं को नैतिकता का पर्याय होना चाहिए। यह पूरा देश चाहता है। इसी क्रम में गृह मंत्री अमित शाह ने संसद में एक विधेयक पेश किया, जिसमें यह प्रावधान है कि अगर कोई मंत्री या मुख्यमंत्री (यहां तक कि प्रधानमंत्री भी) 30 दिनों तक जेल में रहता है, तो उसे पद से हटना होगा। यह विधेयक स्वागतयोग्य है, क्योंकि देश में राजनीति जितनी स्वच्छ होगी, लोकतंत्र उतना ही मजबूत होगा। मगर बड़ा सवाल यह है कि इसके पीछे की मंशा कितनी पवित्र है? इस बात की क्या गारंटी है कि उक्त बिल पास होकर कानून बन गया, तो इसका दुरुपयोग नहीं होगा? 2014 के बाद जिस तरह से विपक्षी दलों के नेताओं पर भ्रष्टाचार के आरोप लगे और उनको डर दिखाया गया, यह पूरे देश ने देखा है। महज आरोप लगाने या ईडी-सीबीआई द्वारा गिरफ्तार कर लेने मात्र से कोई अपराधी साबित नहीं हो जाता, पर बिना पुख्ता सुबूत के कुछ खास नेताओं को 30 दिनों से अधिक जेल में रखा गया। साफ है, उनके लिए खतरा बढ़ जाएगा। बेशक, यह विधेयक सही हो, मंशा भी सही हो, लेकिन इसका दुरुपयोग हो सकता है। इससे भारतीय राजनीति शायद ही स्वच्छ और पारदर्शी हो सकेगी।
हेमा हरि उपाध्याय, टिप्पणीकार
‘हमें ईडी के बारे में कुछ कठोर टिप्पणियां करनी पड़ेंगी। राजनीतिक लड़ाई मतदाताओं के सामने लड़ी जाए। इसके लिए ईडी का दुरुपयोग क्यों किया जा रहा है?’ सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी 21 जुलाई की है। कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया की पत्नी और एक मंत्री पर मनी लॉन्ड्रिंग का केस किया गया था। इस केस को हाईकोर्ट ने रद्द कर दिया, तो ईडी अधिकारी सुप्रीम कोर्ट पहुंच गए, जहां पर उन्हें यह प्रतिकूल टिप्पणी सुननी पड़ी। कुछ ऐसा ही मिलता-जुलता वाकया हेमंत सोरेन और अरविंद केजरीवाल के मामले में भी हो चुका है। पिछले वर्षों में ईडी के माध्यम से कई सरकारों को अस्थिर करने के प्रयास हुए और वे सारे प्रयास असफल हो गए। अब एक काला कानून बनाया जा रहा है कि कोई भी मुख्यमंत्री या मंत्री 30 दिन जेल में रह लेता है, तो वह पद से मुक्त कर दिया जाएगा। मतलब किसी को भी फर्जी केस में फंसाया जाएगा और सरकार गिरा दी जाएगी। सवाल न उठे, इसलिए मुख्यमंत्री-मंत्री के साथ प्रधानमंत्री को भी जोड़ दिया गया है। अगर यही सब होना है, तो लोकतंत्र का क्या मतलब है? चुनाव, लोकतंत्र, संविधान आदि का दिखावा क्यों किया जा रहा है? जाहिर है, यह विपक्ष को निपटाने और संविधान की कब्र खोदने के लिए लाया गया है।
कृष्णकांत, टिप्पणीकार

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