Hindi Newsओपिनियन साइबर संसारHindustan cyber world column 23 October 2025
दक्षिण एशिया में इतना तनाव हो ही क्यों

दक्षिण एशिया में इतना तनाव हो ही क्यों

संक्षेप:

पाकिस्तान और अफगानिस्तान में संघर्ष-विराम हो गया है, लेकिन जिस तरह के हालात पिछले दिनों बने, वे शोचनीय हैं। दक्षिण एशिया में संघर्ष के नए मोर्चे का खुल जाना कई तरह के संकेत दे रहा है। यह बता रहा है कि यहां का समीकरण अपने बदलाव के दौर से…

Oct 22, 2025 10:45 pm ISTHindustan लाइव हिन्दुस्तान
share Share
Follow Us on

पाकिस्तान और अफगानिस्तान में संघर्ष-विराम हो गया है, लेकिन जिस तरह के हालात पिछले दिनों बने, वे शोचनीय हैं। दक्षिण एशिया में संघर्ष के नए मोर्चे का खुल जाना कई तरह के संकेत दे रहा है। यह बता रहा है कि यहां का समीकरण अपने बदलाव के दौर से गुजर रहा है, जिस कारण संघर्ष का केंद्र बदलने लगा है। वैसे, यह कहने की जरूरत नहीं है कि पाकिस्तान इस क्षेत्र का एकमात्र ऐसा देश है, जो हालात बिगाड़ने में मुब्तिला रहता है। वह ऐसे-ऐसे तिकड़म अपनाता है कि स्थिति बिगड़ने लगती है और संघर्ष के मैदान गरजने लगते हैं।

दरअसल, अफगानिस्तान और पाकिस्तान में संघर्ष का इस तरह उभरना आश्चर्य तो पैदा कर रहा था, लेकिन इसकी पृष्ठभूमि पुरानी है, इसलिए अगर हम चाहते हैं कि दक्षिण एशिया में शांति बनी रहे, तो हमें कुछ अतिरिक्त प्रयास करने होंगे। इनमें पाकिस्तान पर जिम्मेदारी कहीं अधिक है, क्योंकि उसकी गिनती ऐसे देशों में होती है, जो आतंकवाद को पालता-पोसता है। भारत में होने वाली आतंकी कार्रवाइयों में उसकी संलिप्तता किसी से छिपी नहीं है। यहां तक कि उसकी जमीन पर विदेशी तंजीमें भी पनाह पाती हैं। ऐसी सूरत में, वहां के हुक्मरानों को सबसे पहले अपने देश को स्वच्छ बनाना होगा। उन्हें तमाम आतंकी संगठनों पर नकेल कसनी होगी, फिर चाहे वे पाकिस्तान के हों या किसी अन्य देश के। इसके अलावा, उसे आतंकवाद का इस्तेमाल विदेश नीति के तौर पर करने से बचना होगा। उसे समझना होगा कि आतंकवाद का नुकसान खुद उसे ही उठाना पड़ रहा है। स्थिति यह है कि वह एक विफल देश बन चुका है और अपनी आर्थिक गतिविधियों के लिए विदेशी इमदादों का मुंह देखने को मजबूर है।

दक्षिण एशिया में स्थिरता का आना विश्व राजनीति के लिए भी काफी अहम है। वैसे भी, जब हम हिंद-प्रशांत की बात करते हैं, तो हमें यह सुनिश्चित करना ही होगा कि दक्षिण एशिया में अमन-चैन बना रहे। वैश्विक अर्थव्यवस्था की बेहतरी के लिए क्षेत्र का स्थिर बने रहना आवश्यक है। ऐसी सूरत में, यदि पाकिस्तान और अफगानिस्तान जैसे देश आपस में उलझते हैं, तो उसके असर काफी दूर तक होंगे। पाकिस्तान ने यह भी आरोप लगाया था कि अफगानिस्तान को भारत परोक्ष रूप से मदद कर रहा है, जबकि हमारी नीति स्पष्ट रही है कि हम किसी अन्य देश के आंतरिक मामलों में दखल नहीं देते। मगर चूंकि पाकिस्तान हमें अपना दुश्मन देश समझता है, इसलिए वह अपने ऊपर हुए हर हमले के लिए भारत को जिम्मेदार ठहराता है। इस तरह की सोच को खत्म करने के लिए भी जरूरी है कि दक्षिण एशिया शांत रहे।

महिमा सिंह, टिप्पणीकार

हमें अफगानिस्तान का साथ देना चाहिए

अफगानिस्तान के साथ सीमा-विवाद उस समय का है, जब पाकिस्तान बना भी नहीं था। अफगानिस्तान का संस्थापक अहमदशाह अब्दाली 1757 में भारत पर आक्रमण करता है। उसने मुगलों को पराजित किया और लूटा। खबर पुणे पहुंची, तो मराठों के पेशवा बालाजी राव ने अपने भाई रघुनाथ राव को दिल्ली भेजा। राघोबा ने 11 अगस्त, 1757 को मुगलों पर आक्रमण कर दिया। यह मुगलों का स्थायी पतन था, जिसके बाद वे मराठों की कठपुतली बन गए। राघोबा ने दिल्ली के बाद पंजाब की ओर कूच किया, पहले लाहौर को अब्दाली से छीना, फिर पेशावर और अंत में अटक। अटक उस समय अंतिम किला था और आज का खैबर पख्तूनख्वा भारत-अफगानिस्तान के बीच विशाल बफर जोन था।

लेकिन यहां एक गलती हो गई, मराठा सैनिकों ने जब अफगानों को बाहर किया, तब कई मराठे अफगानिस्तान की सीमा में प्रवेश कर गए और भयावह मार-काट कर दी। राघोबा ने इसे कभी स्वीकार नहीं किया कि ये उनके आदेश पर हुआ, मगर उन्होंने यह संदेश कंधार जरूर भेजा कि अटक से मराठा साम्राज्य, अर्थात भारत की सीमा आरंभ होगी। अब्दाली पंजाब का पश्चिमी हिस्सा भी चाहता था, उसने पंजाब के गवर्नर दत्ताजी सिंधिया को मरवा दिया और इसी के साथ मराठा-अफगान युद्ध शुरू हो गया, जो पानीपत तक गया। पानीपत में अब्दाली की जीत हुई और उसने पेशवा को संदेश भेजा कि अटक से नहीं, भिंड से मराठा साम्राज्य की सीमा होगी। मराठा मान गए, मगर सिख अड़ गए। सिखों ने पंजाब को अपने अधीन ले लिया और लाहौर को अपनी राजधानी बनाया। सिखों ने पंजाब तो लिया ही, साथ ही आज का खैबर भी उनके क्षेत्र में आ गया। इन विवादों के बीच इसी खैबर के आगे अंग्रेजों द्वारा डुरंड रेखा खींची गई, जिसे अफगानिस्तान ने आज तक मान्यता नहीं दी।

अफगानिस्तान में कई गृह युद्ध हुए, मगर कोई भी दल हो, उसने खैबर और पश्चिमी पंजाब को अफगानिस्तान का ही हिस्सा माना है। 1965 और 1971 के युद्ध में अफगानिस्तान ने पाकिस्तान पर हमला करने का विचार भी किया था, जब तालिबान का शासन आया, तब भी यह सीमा-विवाद बना रहा। इस आग में घी का काम तब हुआ, जब तालिबान के दो धड़े हो गए, एक अफगानिस्तान में, तो दूसरा पाकिस्तान में। देखा जाए, तो अभी दो बर्बाद देश आपस में लड़ रहे थे। हमें अफगानिस्तान का ही साथ देना चाहिए, क्योंकि ये राघोबा वाली स्थिति का समर्थक है। अखंड भारत आज नहीं तो कल, बनेगा ही। हमें सिर्फ बदलती स्थिति को समझना है, न कि भावनाओं में बहना है।

परख सक्सेना, टिप्पणीकार