जी राम जी नाम होने से क्या बिगड़ेगा
नाम में क्या रखा है, यह प्रसिद्ध वाक्य महान नाटककार विलियम शेक्सपियर ने कहा था। बावजूद इसके भारतीय संसद में जो कुछ हो रहा है, वह आंखें खोलने वाला है। सदन में महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना का नाम बदलकर विकसित भारत रोजगार एवं आजीविका गारंटी मिशन…

नाम में क्या रखा है, यह प्रसिद्ध वाक्य महान नाटककार विलियम शेक्सपियर ने कहा था। बावजूद इसके भारतीय संसद में जो कुछ हो रहा है, वह आंखें खोलने वाला है। सदन में महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना का नाम बदलकर विकसित भारत रोजगार एवं आजीविका गारंटी मिशन करने पर हंगामा मचा है। मनरेगा बनाम जी राम जी पर बहस हो रही है। जी राम जी विधेयक पर विपक्ष ने कड़ा विरोध जताया है। उसके अनुसार, मनरेगा का नाम नहीं बदलना चाहिए, क्योंकि यह राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के नाम से जुड़ा है। दुखद है कि हंगामा अब संसद का स्थायी हिस्सा बन चुका है। ऐसा करके जनता के हित बड़ी आसानी से भुला दिए जाते हैं। नाम कुछ भी हो, लेकिन उससे गरीबों को फायदा होना चाहिए। किसी गरीब के लिए यह बात मायने नहीं रखती कि सरकार द्वारा जारी योजना का नाम मनरेगा है या जी राम जी? उसके लिए यह बात मायने रखती है कि घर के लिए दो वक्त की रोटी कैसे जुटाई जाए? इसलिए, योजना का नाम कुछ भी हो, महत्वपूर्ण यह होना चाहिए कि इसकी जानकारी हर उस जरूरतमंद को हो, जो इसका लाभ उठा सकता है, अन्यथा सरकारी योजनाएं सिर्फ फाइलों और दलालों के बीच फंसकर रह जाती हैं। सरकार नाम बदलने की कवायद जरूर कर रही है, लेकिन उसे यह सुनिश्चित करना चाहिए कि इस योजना का लाभ जरूरतमंदों को मिले, तभी नामकरण सफल साबित हो सकेगा।
शैलबाला कुमारी, गृहिणी
मोदी सरकार द्वारा पेश नई रोजगार योजना ‘जी राम जी’ न सिर्फ मनरेगा के भ्रष्टाचार पर प्रहार है, बल्कि इसके निहितार्थ कुछ और भी हैं। असल में, आजकल विभिन्न राज्य सरकारों द्वारा मुफ्त की रेवड़ियां बांटने का चलन जोरों पर है। चूंकि मनरेगा में 90 फीसदी फंड केंद्र सरकार द्वारा दिए जाते थे, इसलिए विभिन्न राज्य सरकारें तमाम लोगों को इससे जोड़कर लूट-खसोट में लगी थीं। अब चूंकि जी राम जी में केंद्र सिर्फ 60 प्रतिशत भागीदारी निभाएगा और शेष राज्य सरकारों को देनी होगी, इसलिए कोई भी राज्य सरकार अपना पैसा लुटता देखना नहीं चाहेगी और जरूरतमंदों तक ही यह योजना पहुंचाएगी। इतना ही नहीं, इसमें पूरी तरह से डिजिटल व्यवस्था होगी और बायोमेट्रिक भी, यानी लाभार्थी के नाम पर किसी दूसरे का नाम जोड़ना काफी कठिन होगा। फिर, इस योजना के जरिये सरकार ने आधिकारिक रूप से स्पष्ट कर दिया है कि जो राम का नहीं, वह किसी काम का नहीं। एक तरह से इस योजना को लाकर केंद्र सरकार ने कई शिकार एक साथ किए हैं।
हरि गुप्ता, टिप्पणीकार
नई योजना से नुकसान गांवों का होगा
मनरेगा मामूली योजना नहीं थी। गरीबों के लिए ढाल थी। काम उनका हक था। भीख नहीं। काम मांगने पर पंद्रह दिन में काम न मिले, तो सरकार को भत्ता देना पड़ता था- यह कानून कहता था। इसमें सवाल की गुंजाइश थी और जवाबदेही तय थी। अब तस्वीर बदल रही है। मनरेगा की जगह ‘जी राम जी’ लाई जा रही है। नाम नया है और ढांचा भी। यहां काम हक नहीं, लक्ष्य है। मिशन है। वायदा है। मगर वायदा टूटे, तो किससे सवाल होगा, यह साफ नहीं है। जवाबदेही धुंधली हो जाती है।
सरकार 125 दिन के रोजगार की बात कर रही है, लेकिन यह संख्या कानून में नहीं लिखी होगी। यह नीति में लिखी जाएगी। नीति बदलती रहती है। आज 125, कल 80 और परसों 50 दिन। गरीब के लिए यह अनिश्चितता है। भरोसा नहीं। नई योजना में नया जॉब कार्ड और नया पंजीकरण होगा। इसका मतलब है कि पुराने कार्ड अपने-आप बेकार हो सकते हैं। लाखों लोग बाहर हो सकते हैं। बुजुर्ग, प्रवासी मजदूर, कागज से दूर लोग और नेटवर्क से कटे गांव सबसे पहले प्रभावित होंगे। तकनीक यहां सहारा नहीं बन रही। तकनीक दरवाजा बनती जा रही है। हाजिरी एप से होगी। नेटवर्क नहीं, तो हाजिरी नहीं। हाजिरी नहीं, तो पैसा नहीं। असली चोट जलवायु पर पड़ेगी। मनरेगा ने सिर्फ रोजगार नहीं दिया था। उसने गांवों को संभाला था। तालाब बने। मेड़बंदी हुई। पानी रुका। मिट्टी बची। पेड़ लगे। गांवों ने सांस ली। यह सब जलवायु सापेक्षता का काम था। बाढ़ से लड़ने की तैयारी। सूखे से निपटने की समझ। गर्मी के असर को कम करने का रास्ता। आज जब जलवायु संकट तेज हो रहा है, तब ऐसे कामों की जरूरत और बढ़ गई है।
नई योजना में भाषा बदल रही है। उत्पादकता की बात है। आजीविका का जिक्र है। मगर प्रकृति पीछे छूटती दिखती है। सामूहिक और सार्वजनिक काम सिमटने का खतरा है। जल, जंगल और मिट्टी हाशिये पर जा सकते हैं। इससे जलवायु सापेक्षता के प्रयास ढीले पड़ेंगे। पंचायत और ग्रामसभा की भूमिका भी कमजोर पड़ सकती है। पहले जरूरतें नीचे से तय होती थीं। अब फैसले ऊपर से आने का रास्ता खुल रहा है। मिशन मोड में कागज और एप बोलेंगे। गांव की आवाज पीछे रह जाएगी।
जाहिर है, मसला नाम का नहीं है। मसला नीयत और ढांचे का है। मनरेगा ने हक दिया था। जी राम जी भरोसा मांगती है। हक में ताकत होती है, भरोसे में डर। अगर यह बदलाव ऐसे ही हुआ, तो नुकसान सिर्फ रोजगार का नहीं होगा। नुकसान पर्यावरण का होगा। सबसे ज्यादा नुकसान गांवों का होगा।
राकेश, टिप्पणीकार

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