पर्यावरण के मित्र होते इलेक्ट्रिक वाहन

Feb 16, 2026 11:05 pm ISTHindustan लाइव हिन्दुस्तान
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अभी-अभी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ‘पीएम ई-बस सेवा योजना’ के तहत चंडीगढ़ के लिए लगभग 25 इलेक्ट्रिक बसों की वर्चुअल तरीके से शुरुआत की। इससे पहले, हिमाचल प्रदेश में भी ऐसी पहल हो चुकी है, जहां की सरकार ने वायु प्रदूषण को कम…

पर्यावरण के मित्र होते इलेक्ट्रिक वाहन

अभी-अभी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ‘पीएम ई-बस सेवा योजना’ के तहत चंडीगढ़ के लिए लगभग 25 इलेक्ट्रिक बसों की वर्चुअल तरीके से शुरुआत की। इससे पहले, हिमाचल प्रदेश में भी ऐसी पहल हो चुकी है, जहां की सरकार ने वायु प्रदूषण को कम करने के लिए हिमाचल रोडवेज के लिए सिर्फ नई इलेक्ट्रिक बसें और अन्य सरकारी वाहन ही खरीदने का मन बनाया है। हिमाचल सरकार अपने सूबे में डीजल और पेट्रोल का प्रयोग भी कम करेगी। यह एक अच्छी पहल है, जिसका न सिर्फ स्वागत किया जाना चाहिए, बल्कि इसकी सफलता की दिली कामना भी करनी चाहिए। यह अच्छी बात है कि अपने देश में इलेक्ट्रिक गाड़ियों की तरफ लोगों का रुझान बढ़ने लगा है। सड़कों पर अब ज्यादा संख्या में ईवी दिखने लगी हैं। ये गाड़ियां पेट्रोल या डीजल पर नहीं चलतीं, बल्कि बैटरी से चलती हैं। इससे वायु प्रदूषण को कम करने में निश्चय ही मदद मिलेगी। इतना ही नहीं, ये गाड़ियां ध्वनि प्रदूषण को भी खत्म करने में कारगर मानी जाती हैं, क्योंकि इन गाड़ियों से आवाज बेहद ही कम निकलती हैं, नाममात्र की। इस कारण ध्वनि प्रदूषण पर भी इसका खूब असर पड़ेगा। ऐसे में, जरूरी है कि इलेक्ट्रिक गाड़ियों को और अधिक सुलभ बनाने के प्रयास किए जाएं। लोगों को न सिर्फ प्रोत्साहित किया जाए, बल्कि जरूरी हो, तो ऐसी गाड़ियों पर सब्सिडी भी बढ़ाई जाए, ताकि सड़कों पर सिर्फ यही वाहन दिखें। वास्तव में देखा जाए, तो आने वाले समय में सौर ऊर्जा से भी वाहनों को चलते हम देख सकते हैं। ऐसा होना भी चाहिए, क्योंकि जीवाश्म ईंधन का विकल्प हमें ढूंढ़ना ही होगा। पृथ्वी को स्वच्छ बनाने के लिए पर्यावरण-हितैषी गाड़ियां आवश्यक हैं।

राजेश कुमार चौहान, टिप्पणीकार

इलेक्ट्रिक गाड़ियों के कई फायदे हैं। एक तो यह कम धुआं छोड़ती हैं और फिर शोर भी नहीं करतीं। इतना ही नहीं, इनका मैंटेनेंस यानी रख-रखाव भी तुलनात्मक रूप से आसान होता है। पेट्रोल-डीजल की गाड़ियां जहां अधिक खर्चीली होती हैं, वहीं ईवी में जेब कम ढीली होती है। फिर, पेट्रोल की कीमतें जिस तरह से पिछले कुछ महीनों में बढ़ी हैं, उस कारण भी इलेक्ट्रिक गाड़ियां कहीं अधिक अच्छी जान पड़ती हैं। पेट्रोल और डीजल की कीमतों में बढ़ोतरी का असर यह भी हुआ है कि लोगों के घरों का बजट बिगड़ गया है। इन सबको देखते हुए हमें इलेक्ट्रिक गाड़ियां ही अपनानी चाहिए। वैसे भी, भारत में प्रदूषण की जो स्थिति है, हवा जितनी खराब हो गई है, उसे देखते हुए हमें स्वच्छ ईंधन से चलने वाली गाड़ियां ही सड़कों पर दौड़ानी चाहिए।

सुषमा, टिप्पणीकार

ये गाड़ियां समस्याएं भी पैदा कर रहीं

इलेक्ट्रिक गाड़ियों की शान में कसीदे खूब पढ़े जाते हैं, लेकिन ऐसा करने से पहले यह भी जान लें कि ये गाड़ियां जी का जंजाल भी बन जाती हैं। इसका भुक्तभोगी मैं खुद हूं। मैंने एक नामी कंपनी की स्कूटी खरीदी। हालांकि, सरकार की तरफ से सब्सिडी भी मुझे दी गई थी, फिर भी, उसकी कीमत पेट्रोल वाली स्कूटी से काफी ज्यादा थी। खैर, वह स्कूटी जब घर आई, तो मैं काफी खुश था। उसे चलाने भी लगा। मगर करीब छह महीने हुए थे कि उसमें कुछ दिक्कतें आने लगीं। मैं उसे लेकर सर्विस सेंटर गया, जहां मुझे बताया गया कि इसके पूर्जे आसानी से नहीं मिलते, इसलिए कुछ दिनों के बाद आकर ठीक कराना उचित होगा। कुछ दिनों के बाद मेरी उस समस्या का निराकरण हो भी गया, लेकिन करीब डेढ़ साल होते-होते उस स्कूटी की बैटरी जवाब देने लगी। असल समस्या तभी आई। जब मैं बैटरी बदलवाने के लिए सर्विस सेंटर गया, तो उसकी कीमत इतनी थी कि उससे सस्ती मुझे पेट्रोल वाली स्कूटी लगी। आखिरकार मैंने उस स्कूटी को कबाड़ के हवाले कर दिया।

कहने का अर्थ यह है कि एक तो इलेक्ट्रिक गाड़ियों के कल-पुर्जे आसानी से नहीं मिलते, फिर उसकी कीमत भी ज्यादा होती है। इतना ही नहीं, बैटरी भी एक बड़ी समस्या है। यहां मैं उसके निपटान की चर्चा नहीं कर रहा हूं। फिर, इसका चार्जिंग प्वाइंट खोजना भी किसी बड़ी जंग जीतने से कम नहीं है। भले ही दिल्ली-एनसीआर में कई चार्जिंग प्वाइंट दिखते हैं, लेकिन चार्ज करने में लगने वाले समय को देखते हुए उन प्वाइंट पर लंबे समय तक खड़ा रहना भला किसे पसंद आएगा? दिक्कत यह भी है कि अभी इलेक्ट्रिक गाड़ी लेकर आप लंबी यात्रा पर नहीं निकल सकते। पेट्रोल-डीजल के पंप तो आपको आसानी से दिख जाएंगे, लेकिन ईवी चार्जिंग प्वाइंट नहीं। इसी कारण, इलेक्ट्रिक गाड़ियां लोगों को आकर्षित नहीं कर पा रही हैं। जो कुछ गाड़ियां हम सड़कों पर देखते हैं, वे वास्तव में ‘लोकल’ दूरी तय करने के लिए इस्तेमाल की जाती हैं, जैसे ऑफिस जाने के लिए, या आसपास घूमने के लिए। लंबी दूरी के लिए तो पेट्रोल-डीजल की गाड़ियां ही पसंद की जाती हैं।

अब जबकि सरकार की तरफ से जागरूकता फैलाने की लगातार कोशिशें हो रही हैं, जरूरी है कि ईवी से जुड़ी बुनियादी समस्याओं का समाधान किया जाए। अगर लोगों को परेशानी न हो, तो ये गाड़ियां वाकई अच्छी हैं, लेकिन कंपनियों को भी समझना होगा कि लोग गाड़ियां अपनी सुविधा बढ़ाने के लिए खरीदते हैं, परेशानी बढ़ाने के लिए नहीं। सरकार सोच-समझकर ही आगे बढ़े।

दीपक कुमार, टिप्पणीकार

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