
हर वर्ग को लुभा रहा पुस्तक मेला
अमेरिकी इतिहासकार बारबरा डब्ल्यू टचमैन ने कहा है कि पुस्तकें सभ्यता की वाहक होती हैं। इनके बिना इतिहास मौन है, साहित्य गूंगा, विज्ञान अपंग, विचार और अटकलें स्थिर हैं। पुस्तकें परिवर्तन का इंजन होती हैं…
अमेरिकी इतिहासकार बारबरा डब्ल्यू टचमैन ने कहा है कि पुस्तकें सभ्यता की वाहक होती हैं। इनके बिना इतिहास मौन है, साहित्य गूंगा, विज्ञान अपंग, विचार और अटकलें स्थिर हैं। पुस्तकें परिवर्तन का इंजन होती हैं, दुनिया की खिड़कियां और समय के समुद्र में खड़ा प्रकाशस्तंभ हैं। इन दिनों राजधानी दिल्ली के प्रगति मैदान स्थित ‘भारत मंडपम’ में विश्व पुस्तक मेला चल रहा है। यह साहित्यिक उत्सव है, जो अगले रविवार (18 जनवरी) तक चलेगा। मालूम हो कि इस मेले में 35 से अधिक देशों के 1,000 से ज्यादा प्रकाशक शिरकत कर रहे हैं।
इस मेले की खासियत यहां होने वाले साहित्यिक आयोजन हैं। इस बार करीब 600 कार्यक्रम होंगे, जिनमें लेखकों से संवाद और पुस्तकों का विमोचन तो होगा ही, कार्यशालाएं भी आयोजित की जाएंगी। दिल्ली का यह पुस्तक मेला बिल्कुल अलग एहसास देता है। यही कारण है कि इस मेले में हर वर्ग के लोगों को शामिल होना चाहिए, खास तौर से युवाओं को, क्योंकि इसमें आपको ऐसी पुस्तकें मिल सकती हैं, जो आपके करियर के लिए महत्वपूर्ण साबित हों। आज बेशक इंटरनेट का जमाना है, लेकिन पुस्तकों का भी महत्व बना हुआ है। खास तौर पर धर्म, संस्कृति और अन्य प्राचीन तथ्यों की जानकारी हमें पुस्तकों से जितनी मिल सकती है, उतनी शायद इंटरनेट से न मिले। इतना ही नहीं, इस तरह के मेले की जरूरत इसलिए भी है, क्योंकि एक ही जगह आपको तमाम विधाओं की किताबें मिल जाती हैं। आपको कहीं और भटकने की जरूरत नहीं पड़ती। इसलिए, पुस्तक मेले का आयोजन सुखद है। ऐसे आयोजन रोजमर्रा के हमारे जीवन में नया उल्लास भरते हैं।
राजेश कुमार चौहान, टिप्पणीकार
किताबें मेरे और उनके बीच पुल बनाती हैं/ मैं करती हूं सवाल और वे जवाब बनाती हैं। नई दिल्ली में आयोजित ‘विश्व पुस्तक मेला’ पूरी सर्दी के मौसम का सबसे शानदार दिन होता है। साहित्य से नजदीकी हमारे व्यक्तित्व में ज्यादा बदलाव नहीं, तो एक संवेदनशील इंसान बनने में हमारी मदद जरूर करती है, बशर्ते पुस्तकों के चयन में हम थोड़ी विविधता रखें। किताबों को पढ़ते हुए हमें पात्रों/ घटनाओं के माध्यम से न जाने कितने अनजान रास्तों से गुजरते हुए विविधताओं से भरे अपने समाज/ देश को जानने का अवसर मिलता है। किताबों में पढ़े स्थानों की जब हम यात्रा करते हैं, तो वह एक सपने के सच होने जैसा लगता है और जाना-पहचाना-सा भी। तो खूब पढ़ें और जितना संभव हो घूमें। विश्व पुस्तक मेला तो जरूर जाइए।
दलवंती सहरावत, टिप्पणीकार
समस्या समाधान का भी हो प्रयास
देश की राजधानी दिल्ली इन दिनों किताबों से गुलजार है। यहां विश्व पुस्तक मेला चल रहा है, जो पुस्तक प्रेमियों के लिए एक शानदार उत्सव है और साहित्यिक महाकुंभ बन चुका है। इसमें सैकड़ों स्टॉल लगे हैं, जहां देश-विदेश की किताबें उपलब्ध हैं। पाठक यहां किताबों को न सिर्फ देख सकते हैं, बल्कि उनकी खरीदारी भी कर सकते हैं। यहां आयोजित कार्यक्रमों में लेखक, पाठक और संपादक, सभी एक साथ विचारों का आदान-प्रदान करते हैं। यहां लोग अपनी पसंद की पुस्तकें खरीदते हैं और नई रचनाओं से रूबरू होते हैं, लेकिन इस उत्सव की खुशी में कुछ समस्याएं भी जुड़ी हुई हैं।
वास्तव में, प्रगति मैदान के आसपास भारी ट्रैफिक जाम और मेले के प्रवेश द्वार पर लगने वाली लंबी-लंबी कतारें दिल दुखाती हैं, जो दर्शकों का बहुत सारा समय बर्बाद कर रही हैं। पहले दिन करीब एक लाख लोग पहुंचे, तो रविवार को रिकॉर्ड दो लाख से अधिक पुस्तक प्रेमी आए, लेकिन इन बड़ी संख्याओं के साथ ट्रैफिक की मार और घंटों कतार में खड़े रहने की मजबूरी ने कई लोगों का उत्साह कम किया। नि:शुल्क प्रवेश का सरकारी निर्णय सराहनीय है, लेकिन इससे काफी अधिक संख्या में लोग यहां पहुंच रहे हैं। इनमें उन लोगों की संख्या भी कम नहीं है, जो सिर्फ तफरीह करने के लिए मेला परिसर आ रहे हैं। उनको किताबों से कोई खास लगाव नहीं है। इसलिए अब समय आ गया है कि स्थानीय प्रशासन और ट्रैफिक विभाग मिलकर पुख्ता इंतजाम करें, ताकि लोगों का वक्त जाम और लंबी लाइनों में बर्बाद न हो। ऐसे लोगों को भी रोका जाए, जो यूं ही मेला परिसर आ रहे हैं।
लोग न सिर्फ आसानी से मेले में प्रवेश कर सकें, बल्कि मेला स्थल तक पहुंचने के लिए मेट्रो से अच्छी शटल व्यवस्था भी की जाए, ताकि यहां अपनी गाड़ी लाना मजबूरी न हो। साथ ही, उन लोगों को भी हतोत्साहित करने के प्रयास हों, जो सिर्फ घूमने के इरादे से यहां आ रहे हैं। पार्किंग सुविधा, वैकल्पिक रास्तों का प्रबंधन और प्रवेश द्वारों पर तेज प्रोसेसिंग सिस्टम जैसे कदम उठाए जाने की जरूरत है, ताकि पुस्तक प्रेमी अधिक समय स्टॉल पर बिता सकें और किताबों की अपनी जिज्ञासा शांत कर सकें। वे लेखकों से मिल सकें, विचार-विमर्श कर सकें और किताबों की दुनिया में खो सकें। पुस्तक मेले में नि:शुल्क प्रवेश किताबों को जन-जन तक पहुंचाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है, लेकिन इसका सुफल तभी मिल सकेगा, जब मेलास्थल पर पहुंचने और वहां घूमने की पूरी प्रक्रिया सुगम व आरामदायक हो। इससे यह मेला वास्तव में हर पुस्तक प्रेमी के लिए आकर्षक बन जाएगा।
वीरेंद्र कुमार जाटव, टिप्पणीकार

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