बाल दिवस का मकसद अब तक अधूरा
आज (14 नवंबर) भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू का जन्मदिवस है। यह दिन बाल दिवस के रूप में मनाया जाता है। पंडित नेहरू ने बच्चों के लिए कहा था, ‘आज के बच्चे कल के भारत का निर्माण करेंगे…

आज (14 नवंबर) भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू का जन्मदिवस है। यह दिन बाल दिवस के रूप में मनाया जाता है। पंडित नेहरू ने बच्चों के लिए कहा था, ‘आज के बच्चे कल के भारत का निर्माण करेंगे। हम जिस तरह से बच्चों की परवरिश करते हैं, उससे भारत का भविष्य तय होता है।’ मगर क्या हम नेहरू जी की इन बातों का असल अर्थ समझ सके हैं? स्थिति यह है कि एक तरफ देश बाल दिवस मनाता है, तो दूसरी तरफ गरीबी की मार झेल रहे बच्चे पेट भरने के लिए कड़ी मशक्कत करने को मजबूर होते हैं। यह देश के लिए शर्मनाक तस्वीर है।
गरीबी ही नहीं, कुपोषण के मामले में भी आज भारत की अच्छी स्थिति नहीं है। हर गरीब इंसान अपने बच्चों के भविष्य के सुनहरे सपने देखता है, लेकिन मजबूरी के कारण उसके सपने चकनाचूर हो जाते हैं। वह चाहकर भी कुछ नहीं कर पाता। क्या किसी सरकार ने गरीब बच्चों के बारे मे गंभीरता से यह सोचा है कि उनके सपने को कैसे पूरा किया जाए? कुछ बच्चे तो पढ़ाई-लिखाई भी करना चाहते हैं, पर पेट भरने के लिए उन्हें पहले मजदूरी करने को बाध्य होना पड़ता है। कहने के लिए मुफ्त शिक्षा की संकल्पना देश में की गई है। कई तरह की योजनाएं भी चलाई जा रही हैं। इसके पीछे सोच यही थी कि हर बच्चा साक्षर बनेगा। मगर शायद इन योजनाओं को भ्रष्टाचार का ग्रहण लगा हुआ है, जिसके कारण जरूरतमंदों को इनका लाभ नहीं मिल पाता। क्या आज कोई ऐसा है, जो इन बच्चों के दुख-दर्द को समझ सके? मेरा तो यही मानना है कि इन बच्चों की मानसिकता समझे बिना बाल दिवस मनाने का कोई औचित्य नहीं है। जब तक गरीब से गरीब बच्चा भी पढ़ेगा-लिखेगा नहीं या तीनों वक्त भरपेट भोजन नहीं कर पाएगा, तब तक हर बाल दिवस हमें सामाजिक विसंगति की याद ही दिलाता रहेगा।
जरूरी यही है कि भावी पीढ़ी को आर्दश नागरिक बनाने के गंभीर प्रयास किए जाएं। विद्यार्थियों को कुछ ऐसा पढ़ाया जाए कि वे अच्छे डॉक्टर, वकील, इंजीनियर या अन्य विशेषज्ञ व अफसर बनने के साथ एक आर्दश नागरिक बनें। देश में गलत काम के होने और बढ़ने का एक कारण यह भी है कि शुरू से ही बच्चों को नैतिक ज्ञान नहीं मिल पाता। इसी के साथ स्थानीय इतिहास, परंपरा, रीति-रिवाजों और अपने राज्य के बारे भी उनको पता होना चाहिए, ताकि उनका भविष्य अच्छा बन सके। यही कारण है कि बाल दिवस को सार्थक तरीके से मनाना चाहिए। वक्त की यही जरूरत है।
राजेश कुमार चौहान, टिप्पणीकार
हमारे देश की सफलता बच्चों पर निर्भर
बच्चों के कल्याण के लिए पंडित जवाहरलाल नेहरू कितने प्रतिबद्ध थे, उसी का सम्मान करने के लिए दिन है बाल दिवस। इसी दिन पंडित नेहरू का जन्म हुआ था। यह दिन हमें बच्चों की बेहतरी की याद दिलाता है। यह बताता है कि उनकी शिक्षा, पालन-पोषण और सुरक्षित वातावरण के लिए और क्या किया जाना चाहिए। बच्चे राष्ट्र की संपत्ति होते हैं और अपनी संपत्ति को हर कोई संभालकर रखना चाहता है। यहां तक कि उसे और समृद्ध बनाना चाहता है। हम भी आजाद नागरिक के तौर पर अपने भविष्य को, यानी बच्चों को समृद्ध बनाना चाहते हैं। जाहिर है, यह समृद्धि उसे ज्ञान से, पोषण से और सुरक्षित वातावरण से मिल सकती है। यही कारण है कि यह दिन कमियां गिनाने का नहीं, बल्कि समाज को बेहतर बनाने के संकल्प का होना चाहिए।
वास्तव में, भारत में बच्चों की बेहतरी के लिए कई काम हुए हैं। उनके लिए शिक्षा की अच्छी व्यवस्था की गई है, जिस कारण स्कूल छोड़ने की दर कम हुई है। विशेष तौर पर माध्यमिक स्तर तक शत-प्रतिशत नामांकन की ओर हम बढ़ चुके हैं और यहां से स्कूल छोड़ने की दरें भी काफी कम हो गई हैं। लड़कियों के लिए लैंगिक समानता में स्थिति अच्छी हुई है और लड़कियों के नामांकन व भागीदारी में वृद्धि हुई है। इतना ही नहीं, टीकाकरण की दिशा में भी देश ने अच्छा काम किया है। टीकाकरण कवरेज में सुधार हुआ है, हालांकि इसमें अब भी काम करने की जरूरत है, जिस पर हमें ध्यान देना होगा। देश की आर्थिक तरक्की से भी बच्चों का जीवन सुधरा है। देखा जाए, तो आर्थिक विकास ने बच्चों के लिए स्वास्थ्य, शिक्षा, पोषण आदि की सुविधा उपलब्ध कराई है। इसी का परिणाम है कि बाल श्रम अब काफी कम हो चुका है और हिंसा जैसी समस्याओं से निपटने के लिए कई प्रभावशाली प्रयास किए गए हैं।
पंडित नेहरू का मानना था कि देश की सफलता और समृद्धि बच्चों पर निर्भर है, जो आज भी प्रासंगिक है। बच्चों के विकास के बिना राष्ट्र का विकास नहीं हो सकता। अच्छी बात है कि तमाम सरकारें इस बात से सहमत हैं और बच्चों की बेहतरी के लिए अनवरत काम कर रही हैं। यह प्रवृत्ति आगे भी बनी रहेगी, और ऐसा तभी होगा, जब हम सरकारों के साथ मिलकर काम करेंगे, न कि उनकी आलोचना में रम जाएंगे। अगर हम चाहते हैं कि यह देश बच्चों के लिए और बेहतर बने, तो हमें सभी तबकों के बच्चों को समान रूप से आगे बढ़ाना होगा, खासतौर से वंचित और कमजोर तबके के बच्चों पर ध्यान देना होगा ।
शोभित कुमार, टिप्पणीकार
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