ईरान संकट का समाधान आसान नहीं
पश्चिम एशिया में फिर तनाव की स्थिति बन गई है। पाकिस्तान में हुई शांति-वार्ता विफल रही है और अब दोनों पक्षों के बीच कड़वाहट साफ तौर पर दिखाई दे रही है। हालांकि, चौथे दिन का सीजफायर जारी है, लेकिन जिस तरह का अविश्वास का माहौल बना है…

पश्चिम एशिया में फिर तनाव की स्थिति बन गई है। पाकिस्तान में हुई शांति-वार्ता विफल रही है और अब दोनों पक्षों के बीच कड़वाहट साफ तौर पर दिखाई दे रही है। हालांकि, चौथे दिन का सीजफायर जारी है, लेकिन जिस तरह का अविश्वास का माहौल बना है, वह पूरी दुनिया को डराने वाला है। ईरान युद्ध की समस्या का हल आसानी से दिखाई नहीं दे रहा है।
अमेरिकी उप-राष्ट्रपति जेडी वेंस की अगुवाई में अमेरिकी पक्ष ने ईरान पर विश्वास बहाली की शर्तें रखीं, पर ईरान ने इन शर्तों को अनुचित बताते हुए ठुकरा दिया। दोनों पक्षों ने होर्मुज जलडमरूमध्य को फिर से खोलने, सुरक्षा गारंटी और युद्ध समाप्ति के मुद्दों पर लंबी बहस की, लेकिन कोई भी पक्ष दूसरे के प्रस्तावों पर सहमत न हो सका, जिससे वार्ता बेनतीजा समाप्त हो गई। शांति-वार्ता का विफल होना वैश्विक शक्ति संतुलन को बिगाड़ सकता है। फिलहाल कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया है, जिससे लगता है कि बड़े देश जैसे अमेरिका, चीन और रूस इस मुद्दे पर अलग-अलग रणनीति अपना रहे हैं। इस तनाव का सबसे बड़ा असर वैश्विक अर्थव्यवस्था पर पड़ने वाला है। वार्ता की विफलता ने यह साफ कर दिया है कि विश्व समुदाय को अब पारंपरिक कूटनीति से आगे बढ़कर नई बहुपक्षीय पहल करनी होगी, अन्यथा यह क्षेत्रीय तनाव जल्द ही बड़े वैश्विक संकट में बदल सकता है और दुनिया को फिर से शांति के लिए बड़ी कीमत चुकानी पड़ सकती है।
वीरेंद्र कुमार जाटव, टिप्पणीकार
ईरान-अमेरिका वार्ता का विफल होना यह संकेत देता है कि दोनों पक्ष अपनी-अपनी रणनीतिक और राजनीतिक सीमाओं से बाहर निकलने को तैयार नहीं हैं। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का आक्रामक रवैया भी स्थिति को जटिल बनाता जा रहा है। उनके बयानों और सैन्य कार्रवाई की चेतावनियों ने कूटनीतिक समाधान की संभावनाओं को कमजोर किया है। एकतरफा निर्णय और शक्ति प्रदर्शन की नीति अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था के लिए चुनौती बनती जा रही है। इससे यह भी स्पष्ट होता है कि वैश्विक नेतृत्व में समन्वय की कमी है। इस संकट का एक चिंताजनक पहलू यह भी है कि संयुक्त राष्ट्र समेत वैश्विक संस्थाएं प्रभावी भूमिका निभाने में असमर्थ दिखाई दे रही हैं। यदि बड़ी शक्तियां अंतरराष्ट्रीय नियमों की अनदेखी कर अपनी मनमानी करती रहेंगी, तो पूरी वैश्विक व्यवस्था कमजोर होती जाएगी। यदि समय रहते कूटनीतिक प्रयासों को प्राथमिकता नहीं दी गई, तो अमेरिका-ईरान का यह टकराव व्यापक संघर्ष का रूप ले सकता है।
सुभाष बुड़ावन वाला, टिप्पणीकार
जैसा मध्यस्थ, वैसा नतीजा, फिर हैरानी क्यों
अमेरिका, इजरायल और ईरान के बीच एक माह से अधिक समय तक चले तनावपूर्ण संघर्ष के बाद जिस शांति वार्ता की उम्मीद की जा रही थी, उसका अंत भी अपेक्षानुसार निराशाजनक ही रहा। दुनिया में आतंकवाद को संरक्षण देने की छवि से ग्रस्त पाकिस्तान द्वारा मध्यस्थ की भूमिका निभाने का प्रयास प्रारंभ से ही संदेह के घेरे में था। ऐसे में इस्लामाबाद में आयोजित वार्ता का विफल होना कोई आश्चर्य की बात नहीं है।
पाकिस्तान ने अमेरिका और ईरान के बीच दो सप्ताह के युद्ध विराम तथा शांति समझौते का मंच तैयार करने का दावा किया, किंतु उसकी विश्वसनीयता पर उठते प्रश्न इस पूरी प्रक्रिया पर भारी पड़े। यह परिणाम उस आशंका को पुष्ट करता है कि जिस देश की अंतरराष्ट्रीय छवि संदिग्ध हो, वह स्थायी शांति का माध्यम नहीं बन सकता। वर्तमान घटनाक्रम यह संकेत देता है कि शांति वार्ताओं का दौर समाप्त नहीं हुआ है, बल्कि उसे एक विश्वसनीय मंच और निष्पक्ष नेतृत्व की आवश्यकता है। भारत की भूमि, जिसने सदियों से शांति, सह-अस्तित्व और संवाद का संदेश दिया है, अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के लिए एक भरोसेमंद मंच बन सकती है। यदि भविष्य में वार्ताएं किसी निष्पक्ष और विश्वसनीय वातावरण में होती हैं, तो निश्चित ही समाधान की दिशा में ठोस कदम उठाए जा सकते हैं।
अरविंद रावल, टिप्पणीकार
आज दुनिया बारूद के उस ढेर पर खड़ी है जहां एक छोटी सी चिंगारी समूची सभ्यता को लील सकती है। ऐसे संक्रांति काल में आधुनिक भारत के शिल्पी और महान मानवतावादी विचारक डॉ बी आर आंबेडकर के विचार महज एक ऐतिहासिक स्मृति नहीं, बल्कि वैश्विक शांति की एक अनिवार्य नियमावली के रूप में उभरते हैं।
आंबेडकर ने स्पष्ट शब्दों में कहा था कि विश्व के समक्ष केवल दो ही मार्ग शेष हैं बुद्ध का मार्ग या युद्ध का मार्ग। आज जब महाशक्तियां अपनी सीमाओं और प्रभाव क्षेत्र के विस्तार की होड़ में हैं, तब आंबेडकर का ‘धम्म’ हमें याद दिलाता है कि वास्तविक विजय बल प्रयोग में नहीं, बल्कि बहुजन हिताय, बहुजन सुखाय में निहित है। आंबेडकर के दर्शन का मूल बंधुत्व है। अगर पाकिस्तान जैसा आतंक प्रिय और मानवता द्रोही देश ही शांति वार्ता की मेजबानी करेगा, तब तो शांति दो युद्धों के बीच का एक विराम मात्र बनी रहेगी। यदि विश्व को स्थायी शांति की स्थापना करनी है, तो उसे अपनी कूटनीतिक मेज पर डॉ आंबेडकर के व्यावहारिक मानवतावाद को जगह देनी ही होगी।
युगल किशोर राही, टिप्पणीकार
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