आर्थिक और रणनीतिक हितों के लिए अहम
भारत की मेजबानी में होने वाला ब्रिक्स शिखर सम्मेलन इस बार केवल बहुपक्षीय कूटनीति का मंच नहीं, बल्कि भारत के आर्थिक, तकनीकी और रणनीतिक हितों को आगे बढ़ाने का महत्वपूर्ण अवसर बनकर सामने आया है…

भारत की मेजबानी में होने वाला ब्रिक्स शिखर सम्मेलन इस बार केवल बहुपक्षीय कूटनीति का मंच नहीं, बल्कि भारत के आर्थिक, तकनीकी और रणनीतिक हितों को आगे बढ़ाने का महत्वपूर्ण अवसर बनकर सामने आया है। रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के 11 सितंबर को भारत आने और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ द्विपक्षीय बातचीत से सम्मेलन का महत्व और बढ़ गया है। दोनों नेताओं की बातचीत में रक्षा सहयोग, परमाणु ऊर्जा, व्यापार, स्थानीय मुद्राओं में लेन-देन और रूस-यूक्रेन संघर्ष जैसे विषय प्रमुख रहे। रूस की ओर से भी संकेत मिले हैं कि भारत के साथ तकनीकी और औद्योगिक सहयोग को आगे बढ़ाना उसकी प्राथमिकताओं में है।
भारत के लिए ब्रिक्स केवल सम्मेलन नहीं, आर्थिक अवसरों का मंच है। ब्रिक्स का विस्तार होने के साथ इसका आर्थिक महत्व भी तेजी से बढ़ा है। आज यह समूह केवल चार संस्थापक देशों की बातचीत तक सीमित नहीं है, बल्कि ‘ग्लोबल साउथ’ की आर्थिक और राजनीतिक आवाज को मजबूत करने वाला मंच बन चुका है। भारत के लिए इसका फायदा यह है कि यहां विकसित और विकासशील अर्थव्यवस्थाओं के बीच व्यापार, निवेश, ऊर्जा, तकनीक और वित्तीय सहयोग के नए रास्ते तलाशे जा सकते हैं।
भारत की प्राथमिकता यह होगी कि सम्मेलन की घोषणाएं केवल कागजों तक सीमित न रहें, बल्कि उनका सीधा लाभ भारतीय उद्योग, निर्यातकों, छोटे कारोबारियों, स्टार्टअप और बुनियादी ढांचा परियोजनाओं तक पहुंचे। कृषि, स्वास्थ्य, डिजिटल तकनीक, ऊर्जा और छोटे उद्योगों में सहयोग बढ़ने से भारतीय कंपनियों के लिए नए बाजार खुल सकते हैं।
ब्रिक्स की सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धियों में ‘न्यू डेवलपमेंट बैंक’ यानी एनडीबी की स्थापना रही है। इसका उद्देश्य सदस्य देशों में बुनियादी ढांचे और सतत विकास के लिए वित्त उपलब्ध कराना है। पुतिन की यात्रा इस पूरी तस्वीर में रूस के साथ द्विपक्षीय संबंधों को नया आयाम दे सकती है। रक्षा और परमाणु ऊर्जा के साथ व्यापार और तकनीकी सहयोग पर जोर भारत के लिए दीर्घकालीन लाभ का आधार बन सकता है। ऐसे में, ब्रिक्स सम्मेलन भारत के लिए अंतरराष्ट्रीय आयोजन नहीं, बल्कि आर्थिक विस्तार, तकनीकी आत्मनिर्भरता और ‘ग्लोबल साउथ’ में भूमिका मजबूत करने का अवसर है। यदि भारत इस मंच से निवेश, तकनीक, बाजार और वित्त के ठोस परिणाम हासिल करता है, तो आने वाले वर्षों में ब्रिक्स उसकी आर्थिक रणनीति का और महत्वपूर्ण हिस्सा बन सकता है।
कांतिलाल मांडोत, टिप्पणीकार
भारत के लिए यह बहुत फायदेमंद नहीं रहा
दिल्ली में 12 और 13 सितंबर को 18वां ब्रिक्स शिखर सम्मेलन आयोजित हो रहा है। सम्मेलन को देखते हुए 10 से 14 सितंबर तक दिल्ली में ट्रैफिक व्यवस्था बदल दी गई है और कई प्रमुख सड़कों पर डायवर्जन रहेगा। यहां देखें, तो ब्रिक्स से भारत को कोई अधिक लाभ होता नहीं दिखता, उल्टे इससे देश को कई नुकसान हैं, तो कई प्रकार की नई चुनौतियां भी इसके सामने आने वाली हैं।
ब्रिक्स के प्रमुख एजेंडे में स्थानीय मुद्राओं में व्यापार को बढ़ावा देना रहा है, यानी रुपये-रूबल और स्थानीय मुद्राओं से कारोबार। यह अमेरिका को नागवार गुजर सकता है। इसके साथ भुगतान संतुलन, मुद्रा विनिमय और व्यापार असंतुलन जैसी चुनौतियों पर भी ध्यान देना होगा। हालांकि, ब्रिक्स के सदस्य देशों के बीच डॉलर के प्रभुत्व को कम करने या वैकल्पिक पेमेंट सिस्टम को लेकर एक जैसी आर्थिक प्राथमिकताएं और सहमतियों का अभाव है। इसी तरह ब्रिक्स को केवल पश्चिमी देशों के आर्थिक विकल्प के रूप में देखना नुकसानदेह है। इसके बजाय भारत के लिए इसे बहुपक्षीय आर्थिक मंच के रूप में उपयोग करना अधिक लाभकारी होगा। भारत की रणनीतिक स्वायत्तता तभी मजबूत होगी, जब वह अलग-अलग शक्ति केंद्रों के साथ अपने हितों के अनुसार संबंध बनाए रखे। ब्रिक्स समूह में भारत के लिए अन्य प्रमुख चुनौतियों में इस संगठन पर चीन का बढ़ता प्रभुत्व, भू-राजनीतिक ध्रुवीकरण और पश्चिमी देशों के साथ संतुलन हैं। चीन ब्रिक्स को अपना जेबी संगठन बनाने और पश्चिमी विरोधी मंच के रूप में ढालने की कोशिश कर रहा है, जो भारत की रणनीतिक स्वायत्तता के खिलाफ है। इसी तरह, ईरान, रूस, और खाड़ी देशों का पश्चिम के प्रति दृष्टिकोण आक्रामक या तनावपूर्ण है, जबकि भारत अमेरिका और यूरोप के देशों के साथ भी गहरे सामरिक संबंध रखता है।
इसी तरह, इसमें आंतरिक एकजुटता की भी कमी है। नए सदस्यों के जुड़ने से समूह का दायरा तो बढ़ा है, लेकिन क्षेत्रीय प्रतिद्वंद्विता और अलग-अलग विदेशी नीतियों के कारण किसी भी साझा घोषणापत्र या आम सहमति पर पहुंचना कठिन हो गया है। इसमें आर्थिक असंतुलन भी बहुत है। समूह के भीतर सभी अर्थव्यवस्थाओं की अलग-अलग संरचनात्मक क्षमताएं बड़ी आर्थिक चुनौती हैं। ब्रिक्स से जो भारत को लाभ होने की बात कही जा रही है, यह लाभ भी अपने-आप मिलने वाले नहीं। सदस्य देशों के बीच राजनीतिक-आर्थिक हित अलग-अलग हैं। भारत को अपने हितों को देखते हुए संतुलित नीति अपनानी होगी।
सुधांशु कुमार, शोधकर्ता
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