प्रशासनिक लापरवाही और अनियोजन का फल

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हर वर्ष मानसून का आगमन देशवासियों के लिए राहत, हरियाली और नवजीवन के संदेश के साथ आता है। विडंबना है कि यही बारिश हमारे अधिकांश शहरों की बदहाल व्यवस्था की पोल भी खोल देती है। कुछ घंटों की वर्षा के बाद सड़कों का…

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हर वर्ष मानसून का आगमन देशवासियों के लिए राहत, हरियाली और नवजीवन के संदेश के साथ आता है। विडंबना है कि यही बारिश हमारे अधिकांश शहरों की बदहाल व्यवस्था की पोल भी खोल देती है। कुछ घंटों की वर्षा के बाद सड़कों का तालाब में बदल जाना, घरों और बाजार में पानी भर जाना, घंटों तक यातायात ठप रहना और बिजली-पानी जैसी मूलभूत सेवाओं का बाधित हो जाना अब सामान्य दृश्य बन गया है। यह स्थिति केवल प्राकृतिक आपदा नहीं, बल्कि वर्षों से चली आ रही प्रशासनिक लापरवाही और अव्यवस्थित शहरी नियोजन का परिणाम है। देश के महानगरों से लेकर छोटे शहरों तक लगभग हर मानसून में एक जैसी तस्वीर सामने आती है। सवाल यह है कि जब हर वर्ष बारिश का समय निश्चित है, तो फिर हर बार नगर निकायों की तैयारियां क्यों विफल हो जाती हैं? नालों की सफाई के दावे कागजों तक सीमित क्यों रह जाते हैं? समस्या का सबसे बड़ा कारण अनियोजित शहरीकरण है। शहरों का विस्तार तो तेजी से हुआ, लेकिन उसी अनुपात में जल निकासी व्यवस्था नहीं की गई। प्राकृतिक जलमार्गों और तालाबों पर अतिक्रमण कर बहुमंजिला इमारतें खड़ी कर दी गईं। वर्षा जल के प्राकृतिक प्रवाह को रोक दिया गया। परिणामस्वरूप थोड़ी सी अधिक वर्षा भी शहरों के लिए संकट बन जाती है। नगर निकायों की कार्यप्रणाली भी गंभीर प्रश्नों के घेरे में है। निर्माण कार्यों में गुणवत्ता की कमी, भ्रष्टाचार और जवाबदेही का अभाव स्थिति को और गंभीर बना देता है। जब तक अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों की स्पष्ट जवाबदेही तय नहीं होगी, तब तक केवल बैठकों और घोषणाओं से समस्या का समाधान संभव नहीं है।

युगल किशोर राही, टिप्पणीकार

हर साल बरसात के मौसम में ऐसा ही होता है। स्थिति कभी नहीं सुधरती। आखिर सुधरे भी कैसे? जनता सरकार को दोष देती है और सरकार जनता को। जब दोनों में समन्वय होगा, तभी दोनों अपनी-अपनी जिम्मेदारियों को गंभीरता से समझेंगे। दिल्ली को लंदन बनाने से पहले उसे अपने ही देश की प्राचीन सभ्यता मोहनजोदड़ो जैसा बनाने की जरूरत है। मोहनजोदड़ो का ‘ड्रेनेज सिस्टम’ आज भी हमलोग पढ़ते हैं और इतनी बेहतरीन सुविधा अगर सारे शहर और शहरवासी अपनाएं, तो बारिश के मौसम में इतनी तबाही न आए। सबसे मुख्य कार्य है कि लोग कचरे को नालियों में न बहाएं और अपने आसपास की नालियों को ढककर रखें। हम सभी अपने काम जिम्मेदारी से करेें, तो बारिश का मौसम आफत नहीं, बल्कि आनंद की अनुभूति कराएगा।

शैलबाला कुमारी, गृहिणी

हमें खुद जागना होगा, आदतें सुधारनी होंगी

पांच या दस मिनट की थोड़ी तेज बारिश और पूरा शहर जलमग्न हो जाता है। नाले और सड़कें पानी से लबालब हो जाती हैं। लगता है, पूरी सड़क पर तालाब या नदी बह रही है। नालों और सड़कों का पानी लौटकर गलियों में आने लगता है। गली-मोहल्ले पानी में डूब जाते हैं। दो-दो फीट पानी भर जाता है।

हर समस्या की जड़ आदमी है और समाधान भी आदमी ही है। जैसे ही जलभराव होता है, हम नगर निगम और निर्माण विभाग को कोसने लगते हैं, पर हम भूल जाते हैं कि ये नाले-नालियां जो भरी हुई हैं, इन्हें हमने ही भरा है। हर साल कुछ दिन पन्नी वालों के लिए सब्जी के ठेलों और दुकानों पर चेकिंग अभियान चलाया जाता है। टार्गेट पूरा होते ही यह अभियान ठप हो जाता है। फिर वही ‘ढाक के तीन पात’। पन्नियां ही नालों-नालियों के जाम होने और पानी भरने की मूल जड़ हैं।

अब इस समस्या से निपटने के लिए हमें खुद जागना होगा। बाजार जाते समय कपड़े का थैला या जूट का थैला ले जाना होगा। पन्नियों को ‘बाय-बाय, टाटा’ कहना होगा। जब हम पन्नियां लेना बंद कर देंगे, तो दुकानदार खुद ही पन्नियों में सामान देना बंद कर देंगे। हमारी भी जिम्मेदारी है कि पन्नियों का उपयोग न करें। पन्नी में कूड़ा भरकर नालों में न डालें। हम नालों पर अतिक्रमण न करें, ताकि सफाईकर्मी आसानी से उनकी सफाई कर सकें। हमें जागना होगा, तभी इस समस्या से निदान पाया जा सकता है।

अतिवीर जैन ‘पराग’, टिप्पणीकार

हमारे अधिकांश शहरों में वर्षा हर साल संकट का कारण बन जाती है, लेकिन इसका कारण हम खुद हैं। हाल ही में बॉम्बे हाईकोर्ट ने कहा कि यह केवल प्राकृतिक आपदा नहीं, बल्कि नागरिकों द्वारा स्वयं पैदा किया गया संकट है। अदालत ने स्पष्ट किया कि अवैध कब्जे, नालों पर अतिक्रमण, सार्वजनिक भूमि का दुरुपयोग और जल निकासी मार्गों को बाधित करने जैसी प्रवृत्तियों ने स्थिति को भयावह बनाया है।

वास्तव में हम अपने अधिकारों के प्रति तो सजग रहते हैं, लेकिन कर्तव्यों के प्रति नहीं। हमें पता है कि प्लास्टिक नालों को जाम करता है, फिर भी उसका उपयोग कम नहीं करते। नदियों, तालाबों और प्राकृतिक जलमार्गों पर अतिक्रमण करते हैं, वर्षा जल के प्राकृतिक प्रवाह को रोक देते हैं और फिर सरकार को दोषी ठहराते हैं। समाधान केवल नालों की सफाई तक सीमित नहीं है। सरकार, स्थानीय निकाय, सामाजिक संगठन, धर्मगुरु, शिक्षण संस्थान और आम नागरिकों को सक्रिय होना होगा, तभी स्थिति बदल सकती है।

सुभाष बुड़ावन वाला, टिप्पणीकार

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