Hindi Newsओपिनियन साइबर संसारhindustan cyber world column 11 December 2025
बच्चों को सोशल मीडिया से हटाना चाहिए

बच्चों को सोशल मीडिया से हटाना चाहिए

संक्षेप:

आखिरकार ऑस्ट्रेलिया ने 16 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया के उपयोग पर पूरा प्रतिबंध लागू कर दिया है। इंस्टाग्राम, फेसबुक, यू-ट्यूब, टिकटॉक, स्नैपचैट, थ्रेड्स, एक्स, रेडिट, ट्विच और किक जैसे बड़े प्लेटफॉर्म…

Dec 10, 2025 10:48 pm ISTHindustan लाइव हिन्दुस्तान
share Share
Follow Us on

आखिरकार ऑस्ट्रेलिया ने 16 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया के उपयोग पर पूरा प्रतिबंध लागू कर दिया है। इंस्टाग्राम, फेसबुक, यू-ट्यूब, टिकटॉक, स्नैपचैट, थ्रेड्स, एक्स, रेडिट, ट्विच और किक जैसे बड़े प्लेटफॉर्म अब बच्चों को अपनी सेवाएं नहीं दे पाएंगे। वहां की सरकार का कहना है कि यह फैसला बच्चों को हानिकारक अश्लील सामग्रियों, ऑनलाइन फ्रॉड, साइबर बुलिंग और लत लगाने वाले एल्गोरिदम से बचाने के लिए लिया गया है। कंपनियां अगर इन बच्चों को ब्लॉक करने में नाकाम रहीं, तो उन पर लगभग पांच करोड़ ऑस्ट्रेलियाई डॉलर तक का भारी जुर्माना लगेगा।

इसके साथ ही ऑस्ट्रेलिया दुनिया का पहला देश बन गया है, जिसने इतना बड़ा कदम उठाया है। सरकार का दावा है कि सोशल मीडिया के एल्गोरिदम बच्चों को देर रात तक स्क्रीन से चिपकाए रखते हैं। कई ऑस्ट्रेलियाई माता-पिता लंबे समय से इसकी शिकायत कर रहे थे कि बच्चे पढ़ाई से दूर हो रहे हैं और कई बार ऑनलाइन बुलिंग या अजीबोगरीब सामग्री के कारण तनाव झेलते हैं। प्रधानमंत्री एंथनी अल्बनीज ने इसे ‘ऑस्ट्रेलियाई बच्चों के बचपन को सुरक्षित करने’ का फैसला बताया। उन्होंने कहा कि अगर बच्चे फोन से हटकर खेलेंगे, पढ़ेंगे और दोस्तों से आमने-सामने मिलेंगे, तो समाज पर इसका अच्छा असर पड़ेगा। प्रतिबंधित मंचों की सूची काफी लंबी है और इसमें सभी बड़े प्लेटफॉर्म शामिल हैं। इन कंपनियों को आदेश दिया गया है कि 16 साल से नीचे के बच्चों की पहुंच पूरी तरह रोकें।

इस तरह के प्रतिबंध भारत में भी लगाए जाने चाहिए। यहां देखें, तो भारतीय युवा अपनी बोली, संस्कृति के इर्द-गिर्द बने वीडियो कंटेंट से कहीं दूर तक चले गए हैं और वे अन्य देशों-संस्कृतियों- भाषाओं में बने वीडियो बड़े चाव से देख रहे हैं। इनमें से अधिकतर कंटेंट डब होते हैं और अश्लीलता से भरे होते हैं। आंकड़े बताते हैं कि भारत में इस साल 77 फीसदी जेन-जी ने यू-ट्यूब पर दूसरी भाषाओं से डब किया हुआ कंटेंट देखा है। जाहिर सी बात है कि इस तरह के वीडियो देखने से बच्चों के मानस पर बुरा असर पड़ता है और कई बार वे कुंठा और अवसाद तक के शिकार हो जाते हैं और आत्महत्या जैसे कदम उठा लेते हैं। इसलिए जरूरी है कि हमारी सरकार भी ऑस्ट्रेलिया से सबक लेते हुए पूरे देश में किशोर उम्र तक के सभी बच्चों के लिए सोशल मीडिया के किसी भी प्लेटफॉर्म का उपयोग करने पर रोक लगा दे। इससे ये बच्चे अनाप-शनाप बातें दिमाग में भरने की जगह पढ़ाई-लिखाई में मन लगाएंगे और उनका सकारात्मक विकास संभव हो पाएगा।

मृत्युंजय कुमार, टिप्पणीकार

प्रतिबंध किसी समस्या का समाधान नहीं

ऑस्ट्रेलिया की सरकार ने बुधवार से 16 साल से कम उम्र के बच्चों व किशोरों के लिए सोशल मीडिया मंचों पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया है। लागू कानून के मुताबिक, अगर कंपनियों ने बच्चों को अपने मंच पर ब्लॉक नहीं किया, और यदि वे कानून उल्लंघन की दोषी पाई गईं, तो उन्हें पांच करोड़ ऑस्ट्रेलियाई डॉलर तक का जुर्माना भुगतना पड़ सकता है। ऑस्ट्रेलिया सरकार के इस फैसले की मंशा निस्संदेह सराहनीय है, क्योंकि जिस पैमाने पर पश्चिम में बच्चों के साथ यौन अपराधों को अंजाम दिया जा रहा है, उसमें उनकी सरकारों को हर मुमकिन बचाव के कदम उठाने ही चाहिए, मगर यहीं पर यह सवाल भी उठता है कि यूरोपीय देश और ऑस्ट्रेलिया को अपने बच्चों की तो चिंता है, मगर दुनिया के गरीब देशों की कोई सुध नहीं है, क्योंकि इन सोशल मीडिया मंचों की ज्यादातर कंपनियां इन्हीं देशों की हैं।

इसका दूसरा पहलू यह भी है कि जो मंच किशोरों के लिए हानिकारक हैं, वे वयस्कों के लिए कैसे लाभकारी हो जाएंगे? जहर का असर उम्र देखकर कम-ज्यादा नहीं हो सकता। अगर प्रतिरोधक क्षमता अच्छी है, तो धीमा जहर बच्चों को भी कम नुकसान पहुंचाएगा और वयस्कों को भी। यदि कमजोर है, तो दोनों के लिए समान रूप से घातक होगा। फिर जिन सामग्रियों से किशोरों पर बुरा असर पड़ता है, उनके असर में आकर वयस्क भी बच्चों के साथ बुरा करते हैं, इसलिए पाबंदी सब पर लगनी चाहिए थी।

जैसी कि सूचनाएं हैं, प्रतिबंधित मंचों में यू-ट्यूब को भी आखिरी समय में शामिल कर लिया गया है, मगर वास्तव में यू-ट्यूब सिर्फ अश्लील सामग्रियों का मंच नहीं है, उस पर काफी ज्ञानवर्द्धक सामग्रियां भी उपलब्ध हैं, जिनसे ऑस्ट्रेलिया के किशोर अब वंचित हो जाएंगे। इस तरह की कार्रवाइयां सूचनाओं के प्रवाह को बाधित करती हैं। यू-ट्यूब व दूसरे सोशल मीडिया मंचों ने दुनिया के किशोरों को अपनी अनूठी प्रतिभा पेश करने का अवसर दिया है। कई तो इनकी मदद से ही स्टार तक बने हैं। मसलन, भारत में टीवी के लोकप्रिय शो ‘बिग बॉस’ में कई प्रतिस्पर्द्धी सिर्फ सोशल मीडिया पर बड़ी लोकप्रियता के कारण पहुंचे और आज उन सबका करियर निखर गया है।

पाबंदी या प्रतिबंध किसी समस्या का समाधान नहीं है। मुमकिन है कि सोशल मीडिया से प्रतिबंधित बच्चे अश्लील मुद्रित सामग्री की ओर मुड़ जाएं। बिहार में शराबबंदी का सबसे बुरा असर यह हुआ कि गांव-गांव के छोटे बच्चे इसकी तस्करी के कारोबार से जुड़ गए। इसलिए बच्चों को जागरूक करना व परिजनों की सतत निगरानी प्रतिबंध से अधिक कारगर होती।

रामाज्ञा तिवारी, टिप्पणीकार