राजनीतिक भाषणों का गिरता स्तर चिंताजनक
इंसान जब निराश होता है या अपनी इच्छानुसार हालात को नियंत्रित नहीं कर पाता, तो यह हताशा उसके शब्दों और व्यवहार में झलकने लगती है। राजनीतिक परिदृश्य भी इस मानवीय कमजोरी से कभी अछूता नहीं रहा…

इंसान जब निराश होता है या अपनी इच्छानुसार हालात को नियंत्रित नहीं कर पाता, तो यह हताशा उसके शब्दों और व्यवहार में झलकने लगती है। राजनीतिक परिदृश्य भी इस मानवीय कमजोरी से कभी अछूता नहीं रहा। फिर भी सार्वजनिक बयानों, संवाद में एक स्तर का ख्याल हमेशा रखा जाता था, मगर हाल के दिनों में कई बड़े नेताओं के बयानों में कटुता और अमर्यादित भाषा का प्रयोग देखने को मिला। राष्ट्रीय हो या अंतरराष्ट्रीय मंच, जहां संयम, गरिमा व संतुलन की सर्वाधिक अपेक्षा की जाती है, वहीं नेताओं की जुबान फिसलने लगी है। फिसलना कहना भी सही नहीं, शायद वे जान-बूझकर ऐसा करने लगे हैं। हालांकि, यह आचरण न केवल उनकी व्यक्तिगत छवि, बल्कि उस पद की गरिमा को भी ठेस पहुंचाता है, जिस पर वे आरूढ़ होते हैं। वैश्विक स्तर पर जहां ट्रंप जैसे नेताओं के बयानों में अशालीनता व सतहीपन देखने को मिल रहा है, वहीं भारत की राजनीति भी इस प्रवृत्ति से अब बच नहीं रही।
भारतीय राजनीति कभी अपने उच्च आदर्शों और मर्यादित संवाद के लिए जानी जाती थी, आज यह कटु भाषा के कारण चर्चा में रहती है। संसद से लेकर चुनावी मंचों तक, नेता अपने प्रतिपक्षियों के लिए गालियों का प्रयोग करने लगे हैं। चाहे सत्ता पक्ष हो या विपक्ष- दोनों ओर से शर्मनाक बयान सामने आते हैं, जो लोकतांत्रिक संवाद की गरिमा को कमजोर करते हैं। उनके इस आचरण से आम नागरिकों के बीच भी संवाद की संस्कृति कमजोर पड़ रही है। इसलिए यह आवश्यक है कि राजनीतिक दल और नेता आत्ममंथन करें और अपने आचरण में सुधार करें। यदि भारतीय राजनीति को संयम, मर्यादा और संवाद जैसे मूल्यों की ओर वापस लौटना है, तो राजनेताओं को अपने शब्दों की शक्ति और जिम्मेदारी, दोनों को समझना होगा। यही एक स्वस्थ, सशक्त और परिपक्व लोकतंत्र की पहचान होगी।
मुनीष भाटिया, टिप्पणीकार
राजनेताओं का यह लोकतांत्रिक अधिकार है कि वे अपने विरोधियों की आलोचना करें, पर हिंसक शब्दों, अभद्र भाषा का प्रयोग और बेतुकी बयानबाजी का हक शायद किसी को नहीं है और न ही होना चाहिए। देश अभद्र भाषा का प्रयोग करने वाले नेताओं से पूछना चाहता है कि क्या आपको सभ्य भाषा का ज्ञान नहीं है? अभद्र टिप्पणी, छींटाकशी तो यही साबित करती है। यह सरासर अभव्यिक्ति की आजादी का दुरुपयोग है। दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के लिए यह जरा भी उचित नहीं है। चुनाव आयोग को ऐसे लोगों पर सख्त कार्रवाई करनी चाहिए।
राजेश कुमार चौहान, टिप्पणीकार
नेताओं पर उंगली उठाने से पहले खुद सुधरिए
राजनेताओं की अभद्र बयानबाजी या भाषा का प्रयोग कोई नई बात नहीं है। पिछले कई दशकों से ऐसा ही होता आ रहा है। आज की पीढ़ी तो शायद जानती भी नहीं होगी कि आपातकाल के समय इंदिरा गांधी को विरोधियों ने क्या-क्या बोला था? फिर स्यापा करने का क्या मतलब?
नेताओं द्वारा अभद्र भाषा का प्रयोग दुनिया भर में एक आम प्रवृत्ति है। इसका उपयोग अक्सर अपने राजनीतिक विरोधियों को नीचा दिखाने, ध्रुवीकरण करने या कट्टरपंथी समूहों को आकर्षित करने के लिए किया जाता है। गौर कीजिए, आज देश में वही नेता सबसे ज्यादा पसंद किया जाता है, जो अपने विरोधियों की खिल्ली उड़ाता, उनके खिलाफ आक्रामक भाषण देता है या अपशब्दों का प्रयोग करता है। यह मैं कोई गलत नहीं कह रहा। राज्य-दर-राज्य आप लोकप्रिय नेताओं या मंत्रियों की सूची बनाइए, पाएंगे कि मीडिया भी उन्हें ही भाव देता है। लोग चटखारे लेकर उनको पढ़ते-सुनते हैं। फिर इसके लिए नेताओं को क्यों दोषी ठहराया जाए?
दुनिया को राष्ट्रपति ट्रंप का शुक्रगुजार होना चाहिए कि उन्होंने अपने साथ-साथ अमेरिका के मूल चरित्र को बेपरदा कर दिया है। अमेरिका की हरेक सरकार, प्रत्येक राष्ट्रपति अपने सांविधानिक व्यवहार में ठीक ट्रंप सरीखा रहा है, वे सिर्फ अच्छे और लोकतांत्रिक होने का पाखंड रचते रहे। जूलियन असांजे के विकीलिक्स के जरिये सारे संसार को पता चल चुका है कि दुनिया की मोअज्जिज हस्तियों के प्रति अमेरिकी राष्ट्रपति और विदेश मंत्री कितनी छिछोरी और कामुक बातें करते थे। जाहिर है, उस खुलासे से भद्र समाज की भावनाओं को चोट पहुंची, पर सच्चाई यही है। आप कह सकते हैं कि अगर राजनेता और नौकरशाह यूं सार्वजनिक रूप से गाली-गलौज करने लगे, तब तो अराजकता फैल जाएगी। मेरा मानना है कि हालात को दुरुस्त करने की असली चाबी सिर्फ मतदाताओं के पास है। वे क्यों ऐसे लोगों को सुनने के लिए उमड़ पड़ते हैं, जो अशिष्ट हैं? नफरतियों, आपराधिक पृष्ठभूमि के लोगों को सरकार तो चुनाव नहीं जिताती? आप दागी सांसद, दबंग विधायक भी चुनेंगे और आपको निर्मल लोकतंत्र भी चाहिए? इस विरोधाभास से अगर समाज पहले खुद उबर जाए, तो देश की राजनीति अपने आप साफ-सुथरी हो जाएगी।
यही भारतीय समाज था, जिसमें किसी की ईमानदारी की कसमें खाई जाती थीं, आज उसको ‘मूर्ख’ समझा जाता है। सोचिए, कहां से चलकर कहां आ पहुंचे हैं हम, फिर उसमें दूसरों के लिए परवाह और अच्छा व्यवहार कहां दिखेगा?
महादेव सहनी, टिप्पणीकार
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