
मौत के गड्ढे
हादसों को केवल दुर्घटना मानकर छोड़ा नहीं जा सकता, बल्कि यह उस पूरे सिस्टम की नाकामी है, जो बैरिकेडिंग और सुरक्षा के नाम पर खानापूर्ति करता है। आखिर प्रशासन को यह जवाब देना ही चाहिए …
दंड के बिना नहीं सुधरेगा नगर प्रशासन
देश की राजधानी के जनकपुरी इलाके में जोगिंदर सिंह मार्ग पर शुक्रवार को दिल्ली जल बोर्ड की लापरवाही एक हंसते-खेलते परिवार पर भारी पड़ गई। एक 25 साल का युवक, जो अपने सुनहरे भविष्य के सपने बुन रहा था, सड़क पर खुले पड़े 20 फुट गहरे गड्ढे में मोटरसाइकिल समेत गिरा और काल के गाल में समा गया। मृतक की पहचान कमल के रूप में हुई है। इससे पहले, इसी तरह की एक अन्य दुर्घटना में नोएडा के सेक्टर-150 में गत 16 जनवरी की रात एक दर्दनाक हादसे में सॉफ्टवेयर इंजीनियर युवराज मेहता की कार पानी से भरे गहरे गड्ढे (बेसमेंट के लिए खोदा गया) में गिर गई थी, जिससे उनकी मौत हो गई। 70 फीट गहरे गड्ढे में डूबकर मरने से पहले उन्होंने लगभग दो घंटे तक मदद की कातर गुहार लगाई, लेकिन उन्हें कोई नहीं बचा पाया।
कमल के जुड़वां भाई करण और उनके परिवार के लोग रात 1 बजे से ही दिल्ली की सड़कों और थानों के चक्कर काट रहे थे। उन्होंने जनकपुरी और विकासपुरी थाने में गुहार लगाई और उस रास्ते को खंगाला, जिससे कमल रोज आते-जाते थे। हैरानी की बात यह है कि परिजन रात में उस गड्ढे के पास भी पहुंचे थे, जहां यह हादसा हुआ था। करण ने बताया कि ‘हमने उस गड्ढे के पास फ्लैश लाइट जलाकर भी देखा था, लेकिन वहां सुरक्षा का कोई इंतजाम या चेतावनी बोर्ड नहीं था।’ जब सुबह उजाला हुआ, तब पता चला कि जिस गड्ढे के पास खड़े होकर वह अपने भाई को आवाज दे रहे थे, कमल उसी में गिरकर दम तोड़ चुका था। दिल्ली सरकार ने मामले की गंभीरता को देखते हुए सख्त कदम उठाए हैं। उसने दिल्ली जल बोर्ड के असिस्टेंट एग्जीक्यूटिव इंजीनियर, असिस्टेंट इंजीनियर व जूनियर इंजीनियर को तत्काल निलंबित कर उच्च स्तरीय जांच कमेटी का गठन किया है।
बात इतनी सी ही नहीं है। इस तरह के हादसों को केवल दुर्घटना मानकर छोड़ा नहीं जा सकता, बल्कि यह उस पूरे सिस्टम की नाकामी है, जो बैरिकेडिंग और सुरक्षा के नाम पर खानापूर्ति करता है। आखिर प्रशासन को यह जवाब देना ही चाहिए कि नोएडा जैसी दर्दनाक घटना के बाद भी दिल्ली में खुले गड्ढे ऐसे कैसे पड़े थे? जहां तक नोएडा वाली घटना का प्रश्न है, तो उसके जिम्मेदार बिल्डर को हाईकोर्ट से जमानत मिल चुकी है, क्योंकि प्रशासन ने उसके खिलाफ कोई ठोस सुबूत ही नहीं रखा। दिल्ली में भी प्रशासन द्वारा इसी तरह की लीपापोती की जाएगी। होना यह चाहिए कि जिम्मेदार प्रशासन के पूरे अमले के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाए, ताकि आगे से किसी भी विभाग के अधिकारी-कर्मचारी लापरवाही के बारे में न सोचें।
रितुराज, छात्र
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हर बात पर सरकार को कोसना ठीक नहीं
कांग्रेस की चर्चित राष्ट्रीय प्रवक्ता ने एक्स पर पोस्ट की है- ‘दिल्ली के रहने वाले कमल ऑफिस से घर के लिए निकले। रास्ते में बड़ा सा गड्ढा खुदा हुआ था। कमल बाइक के साथ गड्ढे में गिर गए, उनकी मौत हो गई। गड्ढा दिल्ली जल बोर्ड ने खोदा था, लेकिन न कवर किया, न कोई बैरिकेड लगाया और न चेतावनी का बोर्ड! बीजेपी के डबल इंजन में यह मौत है या हत्या? आप बताइए?’
कमल तो अब इस दुनिया में नहीं रहे, पर उनके माता-पिता और परिजनों का दर्द समझा जा सकता है। कांग्रेस की प्रवक्ता ने उनके प्रति सहानुभूति का एक वाक्य नहीं लिखा, पर सियासत का मौका हाथ से न जाने दिया। हम यहां दिल्ली नगर निगम, दिल्ली जल बोर्ड या सरकार की भूमिका को ‘क्लीनचिट’ नहीं दे रहे, पर क्या हमारा राजनीतिक वर्ग ऐसी मौतों को लेकर वाकई संवेदनशील है? कहीं कोई हादसा होता है, जिस पार्टी की सरकार होती है, उसे कोसने समूची विरोधी पार्टियां जमा हो जाती हैं। दिल्ली में कांग्रेस कोसती है, बेंगलुरु में भाजपा, मुंबई में शिव सेना, तो लखनऊ में सपा। सवाल यह है कि इस सबसे कोई फर्क पड़ता भी है? दुर्योग से इसका उत्तर ‘नहीं’ है। फिर निदान क्या है? सबसे बड़ा समाधान तो यही है कि वाहन चलाते समय अपनी जान के प्रति खुद की जिम्मेदारी का परिचय दें। आप किसी भी सड़क पर निकल जाइए, आपको ऐसे अनेक लोग मिल जाएंगे, जो न सिर्फ बेहद लापरवाही से गाड़ी चला रहे होते हैं, बल्कि कई तो गैर-कानूनी रूप से वाहन ड्राइव करते हैं। वहां किसी नगर निगम या सरकार की गलती नहीं होती, वहां सरासर परवरिश और मां-बाप की गलती होती है।
सरकार ने तो कानून बना रखा है कि एक तय उम्र से कम आयु के बच्चों का ड्राइविंग लाइसेंस नहीं बनेगा, फिर कैसे छोटे-छोटे बच्चे गलियों में स्कूटी से धूल उड़ाते फिरते हैं या रईसजादे फुटपाथों पर लोगों को कुचलते घूमते हैं? हर बात के लिए सरकार को दोष देना अपने नागरिक दायित्व से बचने का सबसे आसान रास्ता है और हमारे देश में बहुत सारी समस्याओं में मूल में यही प्रवृत्ति है। विडंबना यह है कि हमारे देश में न अधिकारियों की जिम्मेदारी तय होती है और न नागरिकों की।
हमारे पास एक ढीला-ढाला न्यायिक ढांचा है, जो इतने सारे अंतरविरोधों का शिकार है कि समाज और देश को उससे कोई दिशा ही नहीं मिल पा रही। आप गांठ बांध लीजिए, कमल की दर्दनाक मौत आखिरी नहीं होने जा रही है। आपको चंद रोज के भीतर ही ऐसी खबरें फिर पढ़ने-देखने को मिलेंगी। ‘सिविक सेंस’ के बिना सिविल सोसायटी की अवधारणा ही बेमानी है।
मिहिर राणा, टिप्पणीकार

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