राजधानी में लड़कियां आज भी असुरक्षित
राजधानी दिल्ली में 16 वर्षीया छात्रा के साथ चलती बस में गैंगरेप की कथित घटना बेहद शर्मनाक और चिंताजनक है। सवाल सिर्फ अपराध का नहीं, उस मानसिकता का भी है, जो किसी मासूम की इंसानियत और सम्मान को कुचलने की हिम्मत…

राजधानी दिल्ली में 16 वर्षीया छात्रा के साथ चलती बस में गैंगरेप की कथित घटना बेहद शर्मनाक और चिंताजनक है। सवाल सिर्फ अपराध का नहीं, उस मानसिकता का भी है, जो किसी मासूम की इंसानियत और सम्मान को कुचलने की हिम्मत देती है। क्या ऐसे अपराध करने वालों को निर्भया कांड (2012) और उसके बाद हुई कड़ी कानूनी कार्रवाई का पता नहीं? क्या उन्हें कानून और सजा का डर नहीं? फिर भी कुछ लोग ऐसे घिनौने अपराध क्यों करते हैं? इसका जवाब केवल कठोर सजा में नहीं, बल्कि बचपन से मिलने वाले संस्कार, महिलाओं के प्रति सम्मान, सही शिक्षा और अपराध के प्रति समाज की असहिष्णुता में भी छिपा है। जब तक बेटियों को इंसान और बराबर का अधिकार रखने वाला व्यक्ति समझने की मानसिकता मजबूत नहीं होगी, कानून अकेला पर्याप्त नहीं होगा। साथ ही, माता-पिता को बच्चों के साथ संवाद बनाना चाहिए। छोटी-मोटी घरेलू नाराजगी में बच्चियों का अकेले घर से निकलना और अनजान लोगों या वाहनों पर भरोसा करना जोखिमपूर्ण हो सकता है। बेटियों को सावधान करना उनकी स्वतंत्रता रोकना नहीं, बल्कि उन्हें सुरक्षित निर्णय लेने के लिए सक्षम बनाना है। और, अपराधियों के लिए संदेश स्पष्ट होना चाहिए- कानून से बचने का कोई रास्ता नहीं।
देव प्रकाश बमनावत, टिप्पणीकार
राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़े दिल्ली में महिलाओं के खिलाफ अपराध को लेकर चिंता पैदा करते रहे हैं। विशेष रूप से वर्ष 2013 के बाद के वर्षों में बलात्कार के मामलों का आंकड़ा इस समस्या की गंभीरता की ओर संकेत करता है। ऐसे में, 4 अगस्त की रात हुई घटना केंद्र सरकार से लेकर दिल्ली प्रशासन और पुलिस की बहुस्तरीय सुरक्षा व्यवस्था पर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े करती है। हालांकि, यह परिवार, समाज, प्रशासन और स्वयं महिलाओं, या यूं कहें कि हम सभी की साझा जिम्मेदारी है। महिलाओं की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए सार्वजनिक स्थानों पर प्रकाश की पर्याप्त व्यवस्था, प्रभावी और सक्रिय सीसीटीवी कैमरे, सुरक्षित व विश्वसनीय सार्वजनिक परिवहन और त्वरित पुलिस सहायता सुनिश्चित करना बहुत ही जरूरी है। किसी भी सभ्य समाज की पहचान इस बात से होती है कि वहां महिलाएं और बेटियां कितनी सुरक्षित हैं? यह हमारी सुरक्षा व्यवस्था की उन कमजोर कड़ियों को दूर करने का अवसर है, जिनका लाभ अपराधी उठाते हैं। कानून में कठोरता जरूरी है, लेकिन उससे भी अधिक जरूरी है, उसका ईमानदार क्रियान्वयन।
सुनील कुमार महला, टिप्पणीकार
पहले से कहीं अधिक सुरक्षित हुई दिल्ली
साल 2012 में पूरे देश को झकझोरने वाले निर्भया कांड के बाद यदि किसी भारतीय शहर में महिलाओं की सुरक्षा को लेकर सबसे व्यापक संस्थागत सुधार हुए हैं, तो वह दिल्ली है। भले ही, उसी तरह की फिर से एक घटना हुई है, लेकिन यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि तमाम चुनौतियों से जूझने के बावजूद इसे पूरी तरह से असुरक्षित शहर घोषित करना सच्चाई से आंखें मूंद लेना होगा।
सबसे पहले, कानूनी ढांचे में बड़ा बदलाव आया। 2013 के ‘निर्भया ऐक्ट’ के बाद बलात्कार की परिभाषा बदली गई, कठोर दंड का प्रावधान किया गया और फास्ट-ट्रैक अदालतों की स्थापना की गई। इसके साथ ही निर्भया फंड के माध्यम से सीसीटीवी, पैनिक बटन, महिला हेल्पलाइन और सुरक्षित सार्वजनिक परिवहन जैसी योजनाएं शुरू की गईं। इन सुधारों का उद्देश्य अपराध के बाद कार्रवाई में मदद से कहीं अधिक अपराध की रोकथाम था। दूसरा, दिल्ली में महिलाओं के लिए विशेष पुलिस व्यवस्था विकसित की गई। कई थानों में महिला हेल्प डेस्क, रात में पीसीआर गश्त, मेट्रो स्टेशनों पर महिला सुरक्षाकर्मी और सार्वजनिक स्थानों पर कैमरों का विशाल नेटवर्क बनाया गया। दिल्ली मेट्रो को विश्व की अपेक्षाकृत सुरक्षित सार्वजनिक परिवहन प्रणालियों में गिना जाता है, जहां प्रतिदिन लाखों महिलाएं बिना किसी बड़ी सुरक्षा आशंका के यात्रा करती हैं। तीसरा, हालिया घटना में पुलिस की त्वरित कार्रवाई भी व्यवस्था की एक सकारात्मक मिसाल है। रिपोर्टों के अनुसार, सीसीटीवी और तकनीकी साक्ष्यों के आधार पर बस ड्राइवर और परिचालक को कुछ ही घंटों में गिरफ्तार कर लिया गया। इससे यह संकेत मिलता है कि जांच एजेंसियों की प्रतिक्रिया-क्षमता पहले की तुलना में अधिक प्रभावी हुई है। बदलाव सामाजिक स्तर पर भी दिखाई देता है। आज महिलाएं देर रात तक काम करती हैं, विश्वविद्यालयों, कॉरपोरेट कार्यालयों और सेवा क्षेत्र में उनकी भागीदारी लगातार बढ़ी है। किसी भी यौन अपराध पर समाज, मीडिया व न्यायपालिका की संवेदनशीलता पहले की अपेक्षा कहीं ज्यादा है। यही वजह है कि निर्भया के समय जो जन-आक्रोश दिखाई दिया था, वह अब इस घटना के बाद नहीं दिखता। महिलाओं के अधिकार अब राष्ट्रीय विमर्श के विषय बन चुके हैं।
निस्संदेह, राजधानी दिल्ली पहले से अधिक सुरक्षित हुई है। सुरक्षा केवल अपराधों की संख्या से नहीं, बल्कि कानून, संस्थाओं, त्वरित न्याय और नागरिकों की जागरूकता से भी मापी जाती है, इसलिए एक जघन्य घटना पूरे शहर की प्रगति को नकारने का आधार नहीं बन सकती; यह सुधारों को और मजबूत करने का संकेत है।
अपर्णा कुमारी, टिप्पणीकार
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