
दिखावे की प्रवृत्ति पर सटीक चोट
सत्ता का उद्देश्य क्या होना चाहिए, इसका सबसे प्रभावी उदाहरण मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव ने पेश किया है। उन्होंने अपने छोटे बेटे की शादी उज्जैन के सांवराखेड़ी में 21 अन्य नवयुगलों के साथ की। इस सामूहिक विवाह में…
सत्ता का उद्देश्य क्या होना चाहिए, इसका सबसे प्रभावी उदाहरण मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव ने पेश किया है। उन्होंने अपने छोटे बेटे की शादी उज्जैन के सांवराखेड़ी में 21 अन्य नवयुगलों के साथ की। इस सामूहिक विवाह में मुख्यमंत्री के बेटे का आम युगलों की तरह फेरे लेना सभी के दिल को छू गया। यह विवाह केवल एक सामूहिक आयोजन नहीं था, बल्कि दहेज-प्रथा, फिजूलखर्ची और दिखावे की बढ़ती प्रवृत्ति पर सटीक चोट थी। एक ही मंडप में, विभिन्न जातियों और सामाजिक पृष्ठभूमि से आए सभी जोड़ों का समान रीति-रिवाजों से विवाह संपन्न कराया गया, जो सामाजिक समरसता का अद्भुत प्रतीक बना। बाबा रामदेव और धीरेंद्र शास्त्री जैसे संतों का आशीर्वाद इस पहल को और प्रबल बनाता है। जब आज करोड़ों की चमक-दमक वाली शादियां सामान्य हो चुकी हैं, तब यह सादगीपूर्ण आयोजन सच्चे बदलाव की दिशा दिखाता है। मुख्यमंत्री मोहन यादव ने प्रधानमंत्री के ‘सादा विवाह’ के संदेश को जीवंत कर यह स्पष्ट कर दिया कि असली खुशी खर्च में नहीं, बल्कि एकता, समानता व सरलता में है। यही वह नेतृत्व है, जो समाज को जोड़ता है। मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री को इस पहल के लिए बधाई।
आरके जैन ‘अरिजीत’, टिप्पणीकार
मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव ने देश-प्रदेश में समरसता और सादगी की मिसाल पेश की है। उज्जैन में आयोजित इस सामूहिक विवाह में 22 जोड़ों को आशीर्वाद देने संत और राजनीति से जुड़ी हस्तियां मौजूद थीं। ऐसे सामूहिक विवाह से हमारे समाज में सकारात्मक संदेश जाता है और आम लोगों को भी प्रेरणा मिलती है कि वे शादी जैसे आयोजनों में बेहिसाब खर्च करने से बचें और सामूहिक विवाह जैसे कार्यक्रम का हिस्सा बनें। इससे उनके काफी पैसे बच सकते हैं। कई बार तो यह भी देखने को मिलता है कि वैवाहिक खर्च के कारण माता-पिता इस तरह कर्ज के जाल में फंस जाते हैं कि जिंदगी भर उससे निकल ही नहीं पाते। संभवत: हाल-फिलहाल का यह पहला मौका था, जब देश का कोई मुख्यमंत्री अपने बेटे का इस तरह सामूहिक विवाह कर रहा था। समाज में इस नेक कार्य से समरसता का संदेश तो जाता ही है, अमीरी और गरीबी का भेदभाव भी खत्म होता दिखता है। इसमें अर्थ और समय की बचत भी खूब होती है! जाहिर है, इससे सभी को प्रेरणा लेनी चाहिए और कोई चाहे कितना भी बड़ा आदमी क्यों न हो, उसे सामूहिक विवाह को बढ़ावा देना चाहिए। साधुवाद के पात्र हैं मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री। उनकी भावना देश के हर हिस्से तक पहुंच रही है।
योगेश जोशी, टिप्पणीकार
सामूहिक शादी में गड़बड़ियां अधिक
यह सही है कि सामूहिक शादी आज के समय की जरूरत है, क्योंकि यह हमारी विवाह संस्था का हिस्सा बन चुकी कई गैर-जरूरी परंपराओं से हमें बचाती है, लेकिन ऐसे आयोजन अब भी प्रतीकात्मक ही अधिक होते हैं। दुर्भाग्य से मध्य प्रदेश में जो हुआ है, उससे बहुत उम्मीद नहीं जग रही। यह काफी हद तक लोकप्रियता पाने का ‘प्रचार’ लग रहा है, क्योंकि अगर वहां का सत्ता पक्ष ऐसे आयोजनों को लेकर गंभीर है, तो वह इसको लेकर कोई व्यवस्था विधानसभा से क्यों नहीं बना रहा? अगर वहां की विधानसभा यह कानून पारित कर दे कि हर समाज में सामूहिक विवाह अनिवार्य है, तो क्यों कोई बाप अपनी बेटी की शादी के लिए कर्ज लेने को मजबूर होगा?
एक दिक्कत और है। सामूहिक विवाह योजना में कई तरह की गड़बड़ियां सामने आती हैं। मध्य प्रदेश में ही यह शिकायत आई है कि एक युवक सामूहिक विवाह देखने गया था, लेकिन जबरन उसे भी वरमाला डाल दिया गया। इसी तरह, फर्जी युगलों को भी सामूहिक विवाह में देखा जाता है। हालांकि, इस तरह की घटना सिर्फ मध्य प्रदेश में नहीं होती। देश के हर हिस्से में ऐसा देखा जाता है। पिछले दिनों तो उत्तर प्रदेश में यह खुलासा भी हुआ था कि चूंकि सामूहिक विवाह में नए जोड़े को सरकार की तरफ से आर्थिक मदद दी जाती है, इसलिए कई लड़के-लड़कियां हर कुछ महीने के बाद ऐसे आयोजनों का हिस्सा बन जाते हैं और सरकारी योजनाओं का गलत फायदा उठाते रहते हैं। कहने का अर्थ यह है कि भ्रष्टाचार और निगरानी का अभाव सामूहिक विवाह जैसी अच्छी व्यवस्था को खराब बनाने पर आमादा है और स्थानीय प्रशासन भी इसको लेकर आंखें मूंदे रहता है।
साफ है, अपने बेटे की शादी सामूहिक आयोजन में करने से जो राजनीतिक फायदा मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री उठाना चाहते हैं, उसको वह तभी हकीकत में उठा सकेंगे, जब सामूहिक विवाह की खामियों को दूर करने में सफल होंगे। इसके अलावा, उनको अगर सादगी और समरसता का परिचय ही देना है, तो विधानसभा से ऐसे कानून पास करवाएं कि पूरे प्रदेश में सादगी से विवाह संभव हो सके। ऐसा करना इसलिए भी जरूरी है, क्योंकि आमतौर पर वर पक्ष के दबाव में ही वधु पक्ष शादी में बेहिसाब खर्च करता है, जिसके लिए कर्ज लेने के अलावा उसके पास कोई दूसरा रास्ता नहीं होता। अगर इस गलत परंपरा को रोकना है, तो कुछ सख्ती करनी होगी, यानी एक सख्त व्यवस्था बनानी होगी, जो बिना सरकार के सहयोग से संभव नहीं है। मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री इसके लिए ईमानदार प्रयास करें।
रोहित कुमार, टिप्पणीकार

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