मन से मानिए महिलाओं को बराबर
अपने देश में एक सच्चाई को अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है। यह सच्चाई हाल ही में विश्व आर्थिक मंच की वैश्विक लैंगिक विषमता रिपोर्ट के आंकड़ों से निकलकर सामने आई है। इस रिपोर्ट में भारत को 148 देशों की सूची में 131वें स्थान पर रखा गया है…

माजा दारूवाला,मुख्य संपादक, इंडिया जस्टिस रिपोर्ट
अपने देश में एक सच्चाई को अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है। यह सच्चाई हाल ही में विश्व आर्थिक मंच की वैश्विक लैंगिक विषमता रिपोर्ट के आंकड़ों से निकलकर सामने आई है। इस रिपोर्ट में भारत को 148 देशों की सूची में 131वें स्थान पर रखा गया है। लैंगिक समानता के लिहाज से यह ब्रिक्स देशों और दक्षिण एशिया के अपने ज्यादातर पड़ोसियों से भी पीछे है।
यह पिछड़ापन इसलिए नहीं है कि भारत में लैंगिक बराबरी के खिलाफ काम हो रहा है, बल्कि इसलिए है कि अन्य देशों में इस विषमता की खाई को तेजी से पाटा जा रहा है। साफ है, भारत को अगर तरक्की करनी है, तो महिलाओं को बराबरी के स्तर पर लाना जरूरी होगा। इस मामले में अच्छी और बुरी, दोनों तरह की खबरें हैं। अच्छी खबर यह है कि शिक्षा और सियासत के क्षेत्र में अच्छी प्रगति हुई है। 97 प्रतिशत पढ़ी-लिखी महिलाएं पुरुषों से बराबरी की ओर बढ़ रही हैं। भारत में महिलाओं के राजनीतिक सशक्तीकरण की रफ्तार चीन से अधिक और ब्राजील के बेहद करीब है। यह तरक्की शायद पंचायती राज संस्थाओं में महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण देने के कारण हुई है। पंचायती राज संस्थाओं में महिलाओं की भागीदारी 45 प्रतिशत तक है। हालांकि, देश की संसद में अब तक के इतिहास में सर्वाधिक 14 प्रतिशत महिलाएं ही पहुंच पाई हैं।
महिलाओं की कमजोर आर्थिक भागीदारी के कारण भारत दुनिया के पांच निचले देशों में है। भारी बेरोजगारी के माहौल में पुरुषों के हाथ ही ज्यादा नौकरियां आती हैं। विश्व बैंक की रिपोर्ट के अनुसार, महिला श्रम की भागीदारी दर में पिछले दशक में ऐतिहासिक गिरावट आई है और सकल घरेलू उत्पाद, यानी जीडीपी में स्त्रियों का योगदान 20 प्रतिशत से भी कम रह गया है। महिलाएं पुरुषों के मुकाबले एक-तिहाई से भी कम कमाती हैं और निर्णय लेने में उनकी भूमिका बहुत कम है।
यह केवल लैंगिक मुद्दा नहीं है, बल्कि यह आर्थिक महत्वाकांक्षा से जुड़ा हुआ मसला है। मैकिन्से ग्लोबल इंस्टीट्यूट का आकलन है कि यदि भारत में लैंगिक समानता होती, तो 2025 के अंत तक इसके जीडीपी में 770 अरब डॉलर का इजाफा हो सकता था। लेकिन मौजूदा दर से वहां तक पहुंचने में 135 साल लग सकते हैं। इस असलियत को देखते हुए हमारे नीति-नियंताओं को महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने के लिए राष्ट्रीय प्राथमिकताओं में तत्काल बदलाव करने चाहिए। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी इस बात को बार-बार कहा है कि महिलाओं को नेतृत्वकारी भूमिका में लाने पर ही प्रगति संभव है।
आर्थिक, राजनीतिक और सामाजिक जीवन में महिलाओं की समान भागीदारी सुनिश्चित करने वाली नीतियों व कार्यक्रमों का सरकारी और निजी, दोनों क्षेत्रों में अधिकतम किया जाना चाहिए। इसमें हर किसी की भूमिका है, लेकिन इस बदलाव को लागू करने की प्राथमिक जिम्मेदारी सरकार की है। हाल में भारतीय प्रशासनिक सेवा में 41 प्रतिशत महिलाएं चयनित हुई हैं और भारतीय विदेश सेवा में 38 प्रतिशत। ये आंकड़े बेहद उत्साहजनक हैं। हालांकि, इन दोनों सेवाओं में अभी कितनी महिलाएं कार्यरत हैं, यह आंकड़ा अस्पष्ट है। सशस्त्र बलों में महिलाएं तीन प्रतिशत से भी कम हैं और सभी पुलिस बलों को मिला दें, तब भी उनकी भागीदारी महज 12 प्रतिशत तक पहुंचती है। यहां तक कि जिन शीर्ष संस्थाओं पर लैंगिक बराबरी सुनिश्चित करने का दारोमदार है, वे स्वयं इस मामले में बहुत पीछे हैं। सुप्रीम कोर्ट में 2021 में 33 न्यायाधीशों में एक समय चार महिलाएं थीं, जो सर्वोच्च न्यायपालिका के इतिहास में सर्वाधिक संख्या है। अभी वहां मात्र एक महिला न्यायाधीश हैं। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के पूरे इतिहास में कभी भी एक से अधिक महिला सदस्य नहीं रही। वह भी शायद इसलिए कि इसके कानून में ‘कम से कम एक महिला सदस्य’ के होने की बाध्यता है।
महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने के कई काम चल रहे हैं। इनमें बड़ी संख्या में उनके नेतृत्व वाले स्वयं सहायता समूहों, लक्षित बचत योजनाओं में उनकी बढ़ी भागीदारी और कम ब्याज वाले ऋण के आवंटन ने आर्थिक आधार को बदलना शुरू कर दिया है। केरल से लेकर उत्तर प्रदेश तक सरकार समर्थित कार्यक्रमों ने लाखों ग्रामीण महिलाओं को उद्यमी बनने में मदद की है। जनगणना, परिसीमन के बाद संसद व विधानसभाओं में 33 प्रतिशत आरक्षण लागू होने से महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी में भी उछाल आने वाला है। लाखों महिलाएं पहले से पंचायती राज संस्थाओं में हैं, यानी राजनीतिक रूप से प्रशिक्षित स्त्रियों की कमी नहीं है।
ब्रिटेन में लेबर पार्टी द्वारा महिलाओं को शॉर्टलिस्ट करने पर जोर देने से दो दशकों में महिला प्रतिनिधित्व 10 से बढ़कर 30 प्रतिशत हो गया है। व्यवस्था समाज को आकार देती है और इसके मूल्यों व पूर्वाग्रहों को अगली पीढ़ियों तक ले जाती है। पितृ-सत्तात्मक समाज और परंपराओं के कारण महिलाओं की भागीदारी बाधित होती है। संस्थाएं यह मानकर चलती हैं कि पुरुष-प्रधान समाज तटस्थ, निष्पक्ष व योग्यता पर आधारित है। मगर जब महिलाएं अपने सामाजिक व जैविक सच पर गौर करने की मांग करती हैं, तो उनको भोग-विलास संबंधी मांग के रूप में देखा जाता है।
लैंगिक गैर-बराबरी की वास्तविकता से मुंह मोड़ने के कारण बहुत कम महिलाएं शीर्ष तक पहुंच पाती हैं। जिला अदालतों में 38 प्रतिशत महिला न्यायाधीश हैं, जबकि उच्च न्यायालयों में केवल 14 प्रतिशत। पुलिस विभाग में अधिकारी स्तर पर केवल आठ प्रतिशत महिलाएं हैं। हालांकि, निजी क्षेत्र में मध्यम क्रम के प्रबंधन स्तर पर उनकी संख्या ठीक-ठाक है। फिर भी, देश की फॉर्च्युन-500 कंपनियों में से केवल दो प्रतिशत ही महिलाएं चला रही हैं।
समानता का मतलब है समता और संतुलन। इसके लिए किसी भी लैंगिक समुदाय की कहीं पर भी 50-60 प्रतिशत से अधिक भागीदारी नहीं होनी चाहिए। यहां तो 33 प्रतिशत आरक्षण देने में ही हीला-हवाली है, मानो समान भागीदारी की मांग करना हिमाकत हो। उनकी धीमी वृद्धि को अक्सर प्रगति कहा जाता है, असल में यह महिलाओं को उनकी जगह देने की अनिच्छा ही दर्शाती है। बदलाव की जिम्मेदारी संस्थानों पर है और भागीदारी बढ़ाने का मतलब है कि सभी संस्थानों में यह तत्काल और सायास बढ़े, ताकि मौजूदा कमियां दूर की जा सकें। यह काम किसी अनुकंपा और अनुग्रह की मानसिकता से नहीं, लंबे समय से वंचित रखे गए अधिकारों की क्षतिपूर्ति के रूप में होना चाहिए।
(ये लेखिका के अपने विचार हैं)
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