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कब बदलेगी मानसिकता

मैं इंसानों के एक ‘विशेष समूह’ से संबंधित हूं, जिसको बांटने का आधार शारीरिक बनावट है। मैं इस देश का एक आम चेहरा हूं। मगर यह आम तब असहज हो जाता है, जब किसी सार्वजनिक जगह पर खुद को कई घूरती नजरों से घिरा हुआ पाता है। तब भी, जब पूरी सड़क खाली होते हुए भी कोई बहुत करीब से निकल जाता है। हाल ही में 16 दिसंबर, 2012 की घटना के मामले में फैसला आया है। जजों के पीठ की एक सदस्या ने फैसले के आखिरी पन्नों में हमारे समाज में शारीरिक बनावट के आधार पर बांटे गए इस वर्ग की स्थिति पर गहरी चिंता जताई है। विवेकानंद को उद्धृत करते हुए लिखा गया है- ‘कोई समाज महिलाओं के साथ कैसा व्यवहार करता हैै, यही उस समाज की प्रगति का पैमाना है।’ इशारा साफ है। शायद कमी हमारी इच्छा में है, जो सामाजिक जिम्मेदारी का नाम आते ही विकृत मानसिकता से दब जाती है। इसलिए कड़ी से कड़ी सजा भी क्या हमारी मानसिकता को बदल पाएगी?
कीर्ति कुमारी

संवेदना से दूर
जिस देश में श्रवण कुमार जैसे उदाहरण मौजूद हों, वहां कोई बेटा अपनी बूढ़ी और बीमार मां को अस्पताल में छोड़कर भाग जाए, तो बहुत दुख होता है। पुरानी फिल्मों की अदाकारा गीता कपूर के साथ जो हुआ, वह सोचने को मजबूर करता है। उन्होंने ‘पाकीजा’, ‘रजिया सुल्तान’ जैसी फिल्मों में अहम भूमिका निभाई है, बावजूद इसके उनका बेटा उन्हें अस्पताल में छोड़कर निकल भागा। जब बेटा का जन्म होता है, तो लोग कितना खुश होते हैं कि चलो, बुढ़ापे का सहारा आ गया। मगर गीता कपूर का हश्र देखकर सोचने की जरूरत है कि हम कैसा समाज गढ़ रहे हैं?
जंग बहादुर सिंह, गोलपहाड़ी

बाबुओं की संपत्ति
देश के 1,856 आईएएस अफसरों ने अपनी संपत्ति का ब्योरा सरकार के समक्ष पेश नहीं किया है। बाबुओं का ऐसा न करना उन पर शक पैदा करता है। मांगी हुई सूचना देना भी सरकारी कामकाज का हिस्सा है। लगता है कि सिस्टम को पारदर्शी बनाने से अधिकारी बचना चाहते हैं। तो फिर ऐसे अधिकारियों की भला क्या जरूरत? जनता के पैसों पर हम इन्हें क्यों पालें? सरकार को चाहिए कि इनके घर, दफ्तर जैसे ठिकानों पर छापे मारे और इनकी तमाम संपत्ति जब्त कर ले। तभी हमारी नौकरशाही व्यवस्था दुरुस्त होगी।
वैजयंती सूर्यवंशी

मीडिया का दायित्व
कल के अंक में प्रकाशित राजेन्द्र धोड़पकर का नश्तर पढ़ा। सेना को लेकर टीवी चैनलों पर किए गए व्यंग्य का तात्पर्य चैनल वाले अवश्य समझ गए होंगे। आजकल किशोर वर्ग, जिसको देश का भविष्य कहा जाता है, जितना प्रभावित मीडिया और सिनेमा से होता है, उतना अपने शिक्षकों या समाज के बुद्धिजीवी लोगों से शायद ही होता है। इसीलिए मीडिया संस्थानों को समाज के समक्ष कुछ परोसने से पहले खास सावधानी बरतनी चाहिए। सवाल यह भी है कि क्या लोगों को कुछ भी बोल देने या दिखाने की आजादी होनी चाहिए? संसार में अधिकतर समस्याओं का कारण असंयमित वाणी है। इसीलिए ऐसे तमाम माध्यमों से दृश्य सामग्री प्रस्तुत करते समय कायदे-कानून का पालन किया जाना चाहिए।
धर्मपाल सिंह, बंदपुर, बागपत


आंतरिक सुरक्षा पर खतरा 
पिछले कुछ वर्षों तक लश्कर-ए-तैयबा ,हिज्बुल मुजाहिदीन, आईएम, माओवादी, बोडो, सिमी जैसे संगठनों से ही देश को खतरा था, मगर अब भीम आर्मी जैसे संगठन भी आंतरिक सुरक्षा के लिए खतरा बन रहे हैं। लगता है कि गृह मंत्रालय और रक्षा मंत्रालय की पकड़ देश की सीमा और आंतरिक सुरक्षा पर ढीली पड़ती जा रही है। प्रधानमंत्री को इस दिशा में सोचना चाहिए और उन्हें ठोस कदम उठाने चाहिए।
राम कुमार शर्मा, पुरानी तहसील, मेरठ
 

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  • Web Title:When will change mentality