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3 दिसंबर, 2020|1:09|IST

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आडवाणी बेहतर होते

राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार के रूप में रामनाथ कोविंद को भाजपा द्वारा चुना जाना कई सवाल खड़े करता है। इस फैसले पर नरेंद्र मोदी और अमित शाह की जोड़ी फिर से सवालों के घेरे में आ गई है। जिस तरह पहले भाजपा ने हिंदुत्व के नाम पर वोट बटोरे और राम मंदिर के नाम पर लोगों का विश्वास जीता, उसी तरह इस बार उसने दलित कार्ड खेला है। यह सही है कि राष्ट्रपति एक माननीय पद है, मगर इस पर ऐसे शख्स को सुशोभित करना चाहिए, जो वाकई लोगों को प्रेरित करे। इस मामले में लालकृष्ण आडवाणी कहीं बेहतर उम्मीदवार होते। अगर उनके नाम की घोषणा की जाती, तो शायद सर्वसम्मति भी बन जाती। रामनाथ कोविंद अपनी जगह बिल्कुल योग्य हो सकते हैं, लेकिन आडवाणी को न चुनना एक तरह से कृतघ्नता है, क्योंकि पार्टी को बनाने में इस शख्स के योगदान को भुलाया नहीं जा सकता।
अनामिका बहुगुणा, देहरादून, उत्तराखंड

जीएसटी की घोषणा
आगामी 30 जून की मध्य-रात्रि को केंद्र सरकार सेंट्रल हॉल से जीएसटी लागू करने की घोषणा करेगी। इस कदम को 15 अगस्त की आजादी की घोषणा से जोड़ा जा रहा है। मगर सच यह है कि ‘आजादी’ की घोषणा होने से पूरा देश गुलामी के बोझ से मुक्त होकर प्रफुल्लित हुआ था, लेकिन ‘जीएसटी’ की घोषणा से पूरा देश करों के बोझ तले दबेगा। व्यापारी वर्ग अभी से ही नाराज है और वह जीएसटी के खिलाफ आंदोलन करने की बात कर रहा है। आखिर वह खुश कैसे होगा? हां, मालामाल होने की संभावना पाकर सरकार जरूर प्रफुल्लित हो जाएगी।
शकुंतला महेश नेनावा, गिरधर नगर, इंदौर

हतप्रभ जनता 
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पिछले साल नवंबर में नोटबंदी की घोषणा की थी। उसका जनता ने अनेक कष्ट सहकर समर्थन किया था। जनता को लगा था कि नोटबंदी से विदेशों में जमा काला धन वापस आएगा, देश में पांव पसार रहे आतंकवाद पर रोक लगेगी और जनता को नकली नोटों से छुटकारा मिलेगा। मगर अब तक न तो विदेशों से काला धन आया है, न आतंकवाद रुका है, और तो और अब तक प्रतिदिन भारी मात्रा में नकली नोट भी पकड़े जा रहे हैं। दुर्भाग्य है कि नए नोट के बाजार में आते ही उसके हमशक्ल नोट बाजार में आ गए। इस पर रोक लगनी चाहिए। जनता की मुश्किलों का अंत होना चाहिए।
राकेश कौशिक, नानौता, सहारनपुर

खेल का आनंद लें
अगर कोई पाकिस्तानी टीम का समर्थन करता है, तो करने दें न उसे। आखिर सबको अपनी पसंद जाहिर करने की आजादी है। हमारे मास्टर ब्लास्टर सचिन को भी तो पूरी दुनिया में लोग पसंद करते हैं; यहां तक कि विरोधी टीम के खिलाड़ी भी। लेकिन किसी का समर्थन करने पर उस शख्स का विरोध किया जाए, वह उचित नहीं है। चैंपियंस ट्रॉफी के फाइनल में भारत के हारने को दिल से नहीं लगाना चाहिए। खेल खेल होता है, उसमें हार-जीत लगी रहती है। इसलिए खेल को लेकर आपसी संबंधों को खराब मत कीजिए ।
फिरोज अली, शाहजहांपुर

हॉकी की दशा
भारत में क्रिकेट की लोकप्रियता को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। इसीलिए क्रिकेट प्रेमियों के लिए फाइनल में भारत की हार को पचा पाना कठिन सा हो रहा है। मगर सवाल यह है कि लोगों में राष्ट्रीय खेल हॉकी में जीत मिलने की खुशी थोड़ी सी भी नहीं दिखी। आखिर क्यों? वे क्रिकेट के गुण ही क्यों गाए जा रहे हैं? यह सच किसी से छिपा नहीं है कि अपने देश के राष्ट्रीय खेल के साथ ही हम सौतेली संतान जैसा व्यवहार करने लगे हैं। खेल सिर्फ और सिर्फ क्रिकेट ही नहीं है। दूसरे भी कई खेल हैं, जिनमें भारतीयों का प्रदर्शन लगातार निखर रहा है। हमें उन्हें भी प्रोत्साहित करना चाहिए।
रतिका ओबराय, संगरूर, पंजाब


 

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  • Web Title:Presidential Candidates, Ramnath Kovind, BJP, Narendra Modi, Amit Shah