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प्रशंसनीय कदम

केंद्र सरकार सवर्ण गरीबों को 10 प्रतिशत आरक्षण देकर बहुत सराहनीय काम करने जा रही है, क्योंकि गरीब सवर्ण ऐसा वर्ग है, जो एक तरफ अपने समाज में ही गरीबी के कारण भेदभाव का शिकार होता है, तो दूसरी ओर सवर्ण का ठप्पा लगे होने के कारण उसे अधिकांश सरकारी लाभकारी योजनाओं से वंचित रखा जाता है। चूंकि यह वर्ग बड़ा वोट बैंक नहीं है, इसलिए राजनीतिक दल भी इसकी उपेक्षा करते हैं। अभी सवर्ण गरीबों की हालत इतनी खराब है कि ये अपने बच्चों को न तो अच्छे स्कूल में पढ़ा सकते हैं, और न अच्छा खाना खिला सकते हैं। इस वर्ग के नौजवान तो खैर अब सरकारी नौकरियों से तौबा करने लगे हैं। ऐसे में, सरकार के इस फैसले से तमाम गरीब सवर्णों में उम्मीद जगी है। संसद से इस विधयेक को मंजूरी मिलनी ही चाहिए, ताकि गरीब सवर्णों को भी उनका हक मिल सके।
मुनीस कुमार वशिष्ठ, कासगंज

आरक्षण की सीमा
अंतत: चुनावी वर्ष में केंद्र सरकार ने आर्थिक आधार पर सवर्णों के लिए 10 प्रतिशत आरक्षण की व्यवस्था कर दी। देश का दुर्भाग्य यही है कि यहां गुणवत्ता को नकारकर आरक्षण व्यवस्था के नाम पर सियासत की जाती है। आलम यह है कि आरक्षण का नाम सुनते ही सबकी जिह्वा इसका लाभ लेने के लिए लपलपाने लगती हैं। कोई आरक्षण की समीक्षा करने को तैयार नहीं दिखता। जबकि वस्तुस्थिति यह है कि अनुसूचित जाति/ जनजाति अथवा पिछड़े वर्ग को दिए जा रहे आरक्षण का फायदा कुछेक परिवारों में सिमट गया है। सवणार्ें को आर्थिक आधार पर आरक्षण दिए जाने का लाभ भी कुछ परिवारों को मिलेगा, लेकिन केंद्र सरकार की यह घोषणा एक सियासी कदम ही है। आज आरक्षण की सीमा तय करने की जरूरत है। अभी होता यह है कि आरक्षित जातियों के योग्य अभ्यर्थी सामान्य वर्ग की सीटों में भी सेंध लगाते हैं, इसीलिए जरूरत ऐसी व्यवस्था बनाने की है कि आरक्षण के लाभार्थी सामान्य वर्ग के लिए बची अनारक्षित सीटों में कोई घुसपैठ न कर सकें।
सुधाकर आशावादी, ब्रहमपुरी, मेरठ

संविदा कर्मियों का वेतन
सरकारी स्थाई नौकरी मिलने से जीवन तो सुरक्षित हो ही जाता है, हर साल महंगाई व अन्य भत्ते भी खुद बढ़ते जाते हैं। मगर दुखद यह है कि जो लोग संविदा पर कार्यरत हैं, उनकी कोई सुध नहीं ली जाती। संविदा कर्मियों का हर तरह से शोषण किया जाता है, जबकि कार्य-क्षेत्र में वे स्थाई कर्मचारियों से हर दृष्टि से बेहतर साबित होते हैं। जब देश का कानून यह कहता है कि समान कार्य के लिए समान वेतन मिलना चाहिए, तो फिर इस कानून का पालन क्यों नहीं किया जा रहा? संविदा कर्मचारियों को कभी-कभी तो छह-छह महीने या साल भर बाद मानदेय मिलता है। इससे पता चलता है कि सरकार संविदा कर्मियों के प्रति कितनी गंभीर है?
मनमोहन लखेड़ा, देहरादून

साइकिल को प्रोत्साहन  
नीदरलैंड सहित कई यूरोपीय देशों में साइकिल को यातायात के साधन के रूप में प्रोत्साहित किया जा रहा है। वहां साइकिल से कार्यालय आने-जाने वाले कर्मचारियों को टैक्स में कई प्रकार की छूट और रियायतें दी जा रही हैं। हमारे देश में भी इसी तरह साइकिल को प्रोत्साहित किए जाने की जरूरत है। यह कदम पर्यावरण संरक्षण और वायुमंडल की शुद्धि के लिए मील का पत्थर साबित हो सकता है। इसके साथ ही, साइकिल के उपयोग से शारीरिक कसरत और फिटनेस का लाभ भी लोगों को मिलेगा। इस प्रयोग से न सिर्फ पेट्रोल पर हमारी निर्भरता कम होगी, बल्कि अतिरिक्त व्यय से भी हम बच सकेंगे। तमाम शहरों में इसके लिए अलग से साइकिल ट्रैक बनाने की व्यवस्था होनी चाहिए।
ललित महालकरी
इंदौर, मध्य प्रदेश

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