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आदेश की अवहेलना

किसी भी राष्ट्र के निर्माण में उस देश के लोगों का अहम योगदान होता है। मुल्क कब और कितना विकास करेगा, यह पूरी तरह से उस देश के नागरिकों पर निर्भर है। जिस देश के नागरिक जितने जागरूक, समझदार, सहनशील, अहिंसावादी और कर्तव्यों के प्रति ईमानदार होते हैं, वह देश उतनी ही तरक्की करता है। मगर हमारे यहां लोगों को सुधारने के लिए कानून का सहारा लेना पड़ता है। हालांकि माननीय सुप्रीम कोर्ट के आदेश और दिल्ली में दमघोंटू प्रदूषण के बावजूद लोग दिवाली पर पटाखे जलाने से बाज नहीं आए। यह देश के प्रति हमारी कमजोर मानसिकता का द्योतक है। हमें समझना चाहिए था कि पटाखों ने हमारा कितना नुकसान किया है? देश के प्रति जब तक हम अपने फर्ज से भागते रहेंगे, तब तक एक आदर्श और विकसित राष्ट्र नहीं बन पाएंगे।
हितेंद्र डेढ़ा, चिल्ला गांव, दिल्ली
hitender.dedha@gmail.com

कब संभलेंगे हम
लगता है कि सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दीपावली पर पटाखे फोड़ने के लिए समय निर्धारित करना जनता को बहुत बुरा लगा। मानो उनके मौलिक अधिकारों का हनन कर दिया गया हो। मेरा मानना है कि शायद बहुत कम लोग होंगे, जिन्होंने इस फैसले को सकारात्मक रूप से लिया। सवाल यह है कि पटाखे फोड़कर आखिर कौन-सी खुशी का हम इजहार करते हैं? अरबों-खरबों रुपये को आग में झोंककर, उनको धुआं-धुआं करके भला कैसी संतुष्टि हम हासिल करते हैं? जबकि हम जानते हैं कि पटाखों से निकला धुआं हम सबके लिए घातक है। एक दिन में ही पर्यावरण इतना प्रदूषित हो जाता है कि उसका असर लंबे समय तक बना रहता है। विगत वर्षों मे दिल्ली लगातार स्मॉग का शिकार हुई है, पर लोग हैं कि मानने की कोशिश भी नहीं कर रहे। दीपावली की खुशी दीपक जलाकर, घर को रोशन करके, मिठाई आदि बांटकर मनाना ही श्रेयस्कर है। हमें अदालती आदेश को इसी रूप में देखना चाहिए था।
विकास मिश्र
vikas.mishra913@gmail.com

शहीदों से मजाक
अपने यहां सरकारें कामों को कितनी सुस्त गति से करती हैं, इसका एक उदाहरण यह भी है कि अब तक भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव जैसे क्रांतिकारियों को हम शहीद का दर्जा नहीं दे सके हैं। आखिर क्यों? पूछने पर गृह मंत्रालय का जवाब होता है कि उसके पास इनका कोई रिकॉर्ड नहीं है। पिछली सरकारों ने इसे ठंडे बस्ते में डाले रखा और खुद को राष्ट्रवादी कहने वाली मौजूदा सरकार भी इसे लेकर उदासीन रही। जबकि आम लोगों की नजर में ये तीनों महान शहीद हैं। यहां तक कि हर साल 23 मार्च को देश में जहां-तहां ‘शहीद दिवस’ भी मनाया जाता है। कहीं ऐसा तो नहीं कि भगत सिंह की साम्यवादी विचारधारा के कारण सरकारें उन्हें शहीद का दर्जा देने से परहेज करती हैं?
जंग बहादुर सिंह, जमशेदपुर
jbsingh.bbc@gmail.com

नोटबंदी के दो वर्ष
8 नवंबर, 2016 की रात लगभग आठ बजे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अचानक राष्ट्र को संबोधित करते हुए 500 और 1,000 रुपये के पुराने नोटों को अमान्य कर दिया था। शुरुआत में लोग समझ नहीं पाए, पर धीरे-धीरे यह लगा कि कालेधन पर प्रहार करने और आर्थिक भ्रष्टाचार को रोकने के लिए प्रधानमंत्री ने यह ऐतिहासिक फैसला लिया है। इस फैसले को कामयाब बनाने के लिए आम जन ने भी सरकार का खूब साथ दिया। आर्थिक भ्रष्टाचार और कालेधन पर लगाम कसने के लिए मोदी सरकार ने बेशक नोटबंदी का कड़वा फैसला लिया था, पर नोटबंदी से काला धन कितना श्वेत हुआ, यह भी मोदी सरकार को जानना चाहिए। जिस देश की आबोहवा में ही भ्रष्टाचार का जहरीला धुआं फैल चुका हो, वहां भ्रष्टाचार को रोकना काफी मुश्किल है। सरकार को इस दिशा में भी काम करना चाहिए था।
राजेश कुमार चौहान, जालंधर
raju09023693142@gmail.com

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