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प्रभावित होती कक्षाएं

दिल्ली विश्वविद्यालय (डीयू) में कई महीनों से शिक्षक अपनी मांगों को लेकर कभी भी हड़ताल पर बैठ जाते हैं। लंबित पदोन्नति के कारण हो रही यह हड़ताल डीयू के विद्यार्थियों के लिए भी गंभीर चिंता का विषय है। इस विश्वविद्यालय में दूर-दूर से बच्चे पढ़ने के लिए आते हैं, परंतु यदि हड़ताल इसी तरह चलती रही, तो क्या होगा? डीयू में शिक्षकों की कमी भी एक बड़ा मसला है, जिसके कारण बच्चों की कई कक्षाएं नहीं हो पा रही हैं। दिसंबर में हुई परीक्षाओं के बाद यह नियम पारित हुआ था कि प्रत्येक बच्चे की हाजिरी 67 प्रतिशत होनी चाहिए, अन्यथा वह परीक्षा में नहीं बैठ पाएगा। मगर सवाल यह है कि यदि कक्षाएं ही नहीं होंगी, तो इसमें छात्र भला क्या करेंगे?

हेमा जोशी , दिल्ली विश्वविद्यालय

अपना-अपना राग

सुप्रीम कोर्ट का फैसला तो एक है, लेकिन उसकी व्याख्याएं अनेक। भाजपा का कहना है कि जिस अफसर से ममता सरकार ने पूछताछ नहीं होने दी, उसे अब पेश होना होगा और जिस सीबीआई की एंट्री बंगाल ने रोक रखी थी, उसे जांच में सहयोग करना होगा, इसलिए यह उसकी जीत है। उधर, ममता बनर्जी का कहना है कि जिस अफसर को गिरफ्तार करने सीबीआई कोलकाता आई थी, उसे गिरफ्तार नहीं किया जा सकता, और जिस कमिश्नर पर सुबूत मिटाने के आरोप लगाए जा रहे थे, उसके कोई सुबूत ही नहीं पेश हो सके, इसलिए यह उनकी जीत है। इस तरह बंगाल से लेकर संसद और सुप्रीम कोर्ट तक तीन दिन चले ड्रामे का पहला पार्ट खत्म हुआ। बहरहाल, सुप्रीम कोर्ट के आदेश से कम से कम संघीय ढांचे का ताना-बाना तहस-नहस होने से बच गया। वरना, एक अजीब परंपरा बन सकती थी कि अगर किसी मामले में राज्य सरकार के अधिकारी पर आरोप हों, तो जांच राज्य की एजेंसी ही करेगी, केंद्रीय एजेंसी नहीं। सीबीआई जैसी केंद्रीय एजेंसियों की विश्वसनीयता बेशक खत्म हो गई है, फिर भी केंद्रीय एजेंसियों के अस्तित्व को एकदम खारिज कर देना संघीय ढांचे के लिए घातक है। इससे सियासी पार्टियों को बचना चाहिए।

मो. ताबिश, नई दिल्ली


बहाल हो पुरानी पेंशन

सरकारी कर्मचारियों और शिक्षकों को सेवानिवृत्ति के बाद मिलने वाली पेंशन सरकार ने 2005 में बंद कर दी, जिसकी बहाली के लिए लगातार घरने-प्रदर्शन हो रहे हैं। कर्मचारियों की दलील है कि जब विधायक-सांसदों को अल्पकाल की सेवा में भी पेंशन का हकदार मान लिया जाता है, तो जो कर्मचारी 35-36 वर्षों तक अपनी सेवा देते हैं, उनसे पेंशन का हक भला क्यों छीना जाए? विडंबना है कि अंतरिम बजट में सरकार ने असंगठित क्षेत्र में भी कर्मचारियों व मजदूरों को पेंशन दिए जाने का प्रावधान किया, जबकि सरकारी क्षेत्र में मिलने वाली पेंशन को बंद किया जा रहा है। आखिर यह कहां का न्याय है? रिटायरमेंट के बाद कर्मचारियों के पास आय का कोई दूसरा साधन नहीं होता। इन सब बातों को समझते हुए सरकार को पुरानी पेंशन-व्यवस्था बहाल कर देनी चाहिए।

श्याम सिंह
 माछरा, मेरठ

खतरे में पैदल यात्री

तेजी से बढ़ती अनियंत्रित जनसंख्या, वाहनों की भीड़, अनियोजित विकास और तूफानी अतिक्रमण आदि से सड़कों की चौड़ाई लगातार घट रही है, जिसके कारण पैदल चलने वालों पर खतरे बढ़ गए हैं। इसीलिए पैदल यात्रियों की मौत खबरें लगातार आने लगी हैं। दुर्भाग्य से सरकार के पास इस समस्या का कोई ठोस हल नहीं है। उसे जनसंख्या नियंत्रण के साथ-साथ पारदर्शी प्लानिंग की तरफ बढ़ना चाहिए। कई सुधारों की तरफ यदि सरकार ध्यान दे, तो हम मंजिल तक पहुंच सकते हैं। लेकिन दुर्भाग्य से इस दिशा में सरकार की सुस्ती के कारण हमें लंबा रास्ता तय करना है।

वेद मामूरपुर ,नरेला
 

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  • Web Title:mail box hindustan column on 9 february