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मरीजों को राहत

प्रधानमंत्री द्वारा ‘सर्वजन हिताय’ की भावना से लोगों को सस्ती दवाएं उपलब्ध कराने के लिए जेनरिक स्टोर खोलने की योजना बनाई गई थी, जिसे उत्तर प्रदेश सरकार अमल में लाने जा रही है। गरीबों को अस्पतालों में सस्ती दवाएं ही नहीं, बल्कि अन्य चिकित्सकीय सामग्रियां भी बहुत कम मूल्य पर उपलब्ध हो सकेंगी। सरकार के इस जन-कल्याणकारी प्रयास की सराहना की जानी चाहिए। 80 प्रतिशत कम मूल्य पर दवाएं और इलाज के अन्य समान लोगों को आसानी से मिल सकें, इसके लिए सरकार प्रशासनिक ढांचे को चुस्त-दुरुस्त करे। मरीजों के प्रति डॉक्टरों का सहानुभूतिपूर्ण रवैया, उनकी समय पर उपस्थिति और अस्पतालों में उनकी मौजूदगी भी सरकार को सुनिश्चित करनी होगी। इतना ही नहीं, चिकित्सक बाहर से दवा लाने व जांच कराने के लिए मरीजों को बाध्य नहीं कर सकें, इसकी भी व्यवस्था होनी चाहिए। जाहिर है, इस सबके लिए प्रशासन की कार्यप्रणाली में आमूल-चूल बदलाव लाना होगा। प्रदेश सरकार को स्वास्थ्य विभाग के प्रशासनिक ढांचे को दुरुस्त करने के लिए नई रणनीति बनानी होगी।
कुलदीप मोहन त्रिवेदी, उन्नाव

बांटने की राजनीति 
भारत में धर्म के आधार पर राजनीति तो अंग्रेजों के समय से होती आ रही है। अंग्रेज इसीलिए भारत पर इतने वर्षों तक राज भी कर पाए, क्योंकि उन्हें हमारी कमजोरी पता थी। उन्होंने ‘बांटो और राज करो’ की नीति पर चलना शुरू किया। खैर, अंग्रेजों को तो हमने देश से बाहर खदेड़ दिया, लेकिन लगता है कि उनकी नीतियां हमारे नेताओं ने अपना ली हैं। जाति और धर्म में भेद करके वोट-बैंक तैयार किए जा रहे हैं। स्वतंत्रता के 70 वर्ष हो गए हैं। इन दशकों में देश में साक्षरता दर तो बढ़ी है, पर वोट बैंक की राजनीति बदस्तूर कायम है। हाल ही में शीर्ष अदालत ने एससी/एसटी ऐक्ट में संशोधन का क्या फैसला किया कि पूरे देश को आगजनी व तोड़-फोड़ में झोंक दिया गया। चारों ओर अराजकता फैल गई। कहा जा रहा है कि कुछ नेताओं ने लोगों को गुमराह किया और उन्हें हिंसा के लिए भड़काया। वोट बैंक की यह राजनीति आखिर कब खत्म होगी? हमारे देश के लोग कब तक वैचारिक टकराव में उलझे रहेंगे? और कब सिर्फ देश की प्रगति व उन्नति को ध्यान में रखकर जनता अपना प्रतिनिधि चुनेगी?
मोंटी चौहान, सेक्टर- 44, नोएडा

असहिष्णुता का दौर
त्रिपुरा में लेनिन की प्रतिमा तोड़ दी गई, और प्रतिक्रिया में श्यामा प्रसाद मुखर्जी, बाबा साहेब अंबेडकर व पेरियार जैसी पूजनीय शख्सियतों की प्रतिमाओं को नुकसान पहुंचाया गया। सवाल यह है कि लोकतांत्रिक समाज में क्या सत्ता हासिल करते ही प्रतीकों को हमेशा के लिए उखाड़ फेंक देना उचित है? प्रतिमाएं तोड़ देने से विचारधाराएं खत्म हो जाएंगी, यह सोचना नादानी है। प्रतीकों की राजनीति असहिष्णुता के नए दौर के आने का खतरनाक संकेत है। वक्त रहते हमें इस पर लगाम लगानी होगी। अगर जल्दी ही ऐसा नहीं किया गया, तो देश का सामाजिक ताना-बाना पूरी तरह से ध्वस्त हो जाएगा।
युधिष्ठिर लाल कक्कड़
गुरुग्राम, हरियाणा

सिर्फ आरोप-प्रत्यारोप
बीती 16 फरवरी को प्रधानमंत्री ने परीक्षा के दबाव को लेकर देश भर के विद्यार्थियों से संवाद करते हुए कहा था कि भारत का हरेक नागरिक जन्मजात राजनेता होता है। उनकी यह बात सही लगती है। कोई भी क्षेत्र हो, किसी भी उम्र के लोग हों, मौका मिलते ही वे राजनीति करने लगते हैं। पिछले दिनों सीबीएसई के पेपर लीक मामले को लेकर भी खूब राजनीति हुई। यह सही है कि चूक हुई है, पर कहीं भी खामी को दूर करने पर बात नहीं हुई। सिर्फ आरोप-प्रत्यारोप हुए और एक-दूसरे को खूब कोसा गया। क्या यह विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र को शोभा देता है?
उत्सव रंजन, नीमा, हजारीबाग

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