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आंखें खोलने वाली खबर

हिमालय से निकलने वाली नदियों के उद्गम स्रोत के पिघलने और सन 2100 तक हिंदुकुश के ग्लेशियरों के दो तिहाई हिस्से के समाप्त हो जाने की खबर डराती है। इससे स्वाभाविक ही उत्तर भारत की नदियों पर खतरा मंडराने लगा है। कितने दुख की बात है कि जिन नदियों की बदौलत मानव-सभ्यता फली-फूली, उनका दम घोंटने के लिए मानव ही आमादा है। हिमालय से निकलने वाली नदियों के उद्गम स्रोत के सूख जाने के बाद पैदा होने वाली स्थिति की कल्पना मात्र से ही मन-मस्तिष्क सिहर उठता है। इससे पूरे उत्तर भारत में भयंकर सूखे की स्थिति पैदा होगी और अन्न-उत्पादन बुरी तरह प्रभावित होगा। करोड़ों लोगों के सामने पीने के पानी का अभाव पैदा हो जाएगा। हमारे नीति-नियंताओं को समझना चाहिए कि कथित विकास और सड़क चौड़ीकरण के नाम पर नाजुक हिमालयी पारिस्थितिकी को छेड़ना त्रासद स्थिति पैदा कर देगी, इन सबसे हमें बचना चाहिए। हमें पृथ्वी को और अधिक गरम होने से बचाने के लिए हरसंभव प्रयत्न करना ही होगा, तभी मानव-सभ्यता बची रह सकेगी।

निर्मल कुमार शर्मा, गाजियाबाद


उच्च शिक्षा का निम्न स्तर

शिक्षा का व्यवसायीकरण आज उच्च शिक्षा की सेहत बिगाड़ रहा है। ज्यादातर उच्च शिक्षण संस्थानों का काम छात्रों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्रदान करने की बजाय उन्हें सिर्फ डिग्री देना रह गया है। कहने के लिए निजी शिक्षण संस्थान शिक्षा के विकास के लिए खोले गए, लेकिन असलियत में ज्यादातर संचालक केवल व्यावसायिक दृष्टिकोण से संस्थान चलाते हैं। यहां शिक्षण कार्य करने वाले उच्च शिक्षित और प्रशिक्षित शिक्षकों का भी दोहन होता है। उच्च शिक्षा की इस चिंताजनक दशा से कोई भी अनजान नहीं है, लेकिन सभी मात्र चिंता जाहिर करके अपने कर्तव्य की इतिश्री कर लेते हैं। चिंता जताने से उच्च शिक्षा की गुणवत्ता बेहतर नहीं हो सकती। इसमें सुधार के लिए शासकीय और प्रशासनिक पदों पर आसीन सक्षम अधिकारियों को सार्थक और ठोस पहल करनी होगी।

सुभाष बुड़ावन वाला, खाचरौद


भ्रष्टाचार का रोग
आज पुलिस, प्रशासन, राजनीति कुछ भी भ्रष्टाचार से अछूता नहीं है। जनता की गाढ़ी कमाई का जो पैसा देश के विकास पर खर्च होना चाहिए, वह नेताओं व अधिकारियों के लॉकरों में पहुंच जाता है। अब तो हम भी किसी हद तक भ्रष्टाचार को स्वीकार कर चुके हैं। विश्व बैंक की एक रिपोर्ट भी बताती है कि भारत में सालाना 6,350 करोड़ रुपये रिश्वत का लेन-देन होता है। ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल की करप्शन परसेप्शंस इंडेक्स में भी भारत की र्रैंंकग गिरी है। साफ है कि अब समाज व हमारी न्याय-व्यवस्था को बड़े़ उदाहरण पेश करने होंगे। लोगों में भ्रष्टाचार के नतीजों का खौफ पैदा करना होगा। हालांकि कुछ मामलों में प्रशासन व न्याय-व्यवस्था ने मिसाल जरूर पेश की है, लेकिन चंद मामलों से कुछ नहीं होने वाला। बुराई की एक-एक शाखा को ढूंढ़-ढूंढ़कर काटनी होगी।
भरत यादव, बीएचयू


अब नारी की बारी

प्रेस लोकतंत्र का जिम्मेदार स्तंभ होता है। अपनी इसी जिम्मेदारी को समझते हुए ‘हिन्दुस्तान’ ने हमेशा लोक-महत्व और जन-भागीदारी वाले मसलों को प्रमुखता से उठाया है। पहले ‘आओ राजनीति करें’ और अब ‘अब नारी की बारी’। अखबार द्वारा उठाया गया यह विषय निश्चय ही बेहद संवेदनशील है, क्योंकि यह महिलाओं को उनके अधिकार दिलाने से प्रेरित है। लोकतंत्र को सर्वोत्तम शासन-व्यवस्था माना जाता है, फिर महिलाओं की भागीदारी को नकारकर लोकतंत्र कैसे फल-फूल सकता है? इसलिए हमें महिलाओं को समाज व सत्ता, दोनों में बराबर की हिस्सेदारी देनी होगी, तभी भारतीय लोकतंत्र और मजबूत होगा।

मोहम्मद इरफान, धनबाद
 

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