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दूरदर्शी राजनीति का टोटा

एयर स्ट्राइक से भारत और पाकिस्तान के बीच पनपे तनावपूर्ण माहौल में दोनों देशों का मीडिया पत्रकारिता-सिद्धांतों को भूलकर युद्ध की भूमिका तैयार कर रहा है। हमारे राजनीतिज्ञ भी लोगों को भड़काकर स्थिति का फायदा उठाने से चूक नहीं रहे। अपने नफे-नुकसान का हिसाब लगाकर हर कोई बयान दे रहा है। सत्तापक्ष एयर सर्जिकल को भुनाने में नैतिकता की सीमाएं लांघ रहा है, तो विपक्षी पार्टियां अपने तर्क-कुतर्क से भ्रम का जाल फैलाने की पूरी चेष्टा कर रही हैं। युद्ध का डर कोई सीमांत गांवों में जाकर पूछे। सबको मालूम है कि युद्ध किसी समस्या का हल नहीं है, फिर भी सकारात्मक कदम उठाने की इच्छाशक्ति किसी राजनीतिज्ञ में नहीं दिखती। किसी ने नहीं सोचा कि युद्ध की स्थिति में अभिनंदन का क्या होता? हमारी राजनीति में दूरदर्शी मार्गदर्शन का बिल्कुल टोटा पड़ गया है।
दिलबर सिंह नेगी, रोहिणी 
dsnegi219@gmail.com
सभी अभिनंदन रिहा हों
भाजपा अध्यक्ष अमित शाह का कहना है कि मोदी सरकार का प्रभाव ऐसा है कि विश्व में सबसे जल्दी कोई कैदी वतन लौटा है, तो वह अभिनंदन है। उनका यह बयान स्वागतयोग्य है। अब मोदी सरकार को पाकिस्तान की जेलों में बंद उन तमाम सैनिकों को छुड़वाना चाहिए, जो वर्षों से वहां न सिर्फ बंद हैं, बल्कि नारकीय यातनाएं झेल रहे हैं। जांबाज पायलट अभिनंदन की तरह यदि हमारे प्रधानमंत्री इन सबको छुड़वाने में सफल हो गए, तो न केवल वह सबकी बोलती बंद कर देंगे, बल्कि देश को भी यह पता चल जाएगा कि न केवल नरेंद्र मोदी में दम है, अपितु उनमें कुछ कर गुजरने की क्षमता भी है, तभी तो देश सुरक्षित हाथों में है।
हेमा हरि उपाध्याय, खाचरौद, उज्जैन
hemahariupadhyay@gmail.com
हुनर कमाएं, डिग्री नहीं
आज आपके पास प्रोफेशनल, टेक्निकल, मेडिकल या फिर कोई अन्य डिप्लोमा सर्टिफिकेट क्यों न हो, लेकिन अगर आपके पास हुनर नहीं है, तो आपकी कहीं पर बात नहीं बनने वाली। वर्तमान समय में सर्टिफिकेट या डिग्रीधारी युवाओं की कमी नहीं है। बस कमी है, तो योग्य अभ्यर्थियों की। जैसा कि आए दिन हमें देखने को मिलता है कि किसी भी सरकारी विभाग में एक पद निकलता है, तो उस पर आवेदक अनेक होते हैं। इससे पता चलता है कि उस पद पर मांगी गई योग्यता के योग्य अभ्यर्थियों की कमी नहीं है, लेकिन उन सभी में से कुछ ही ऐसे होते हैं, जो उस पद के अनुरूप पात्रता को पूर्ण कर पाते हैं। ऐसा शायद इसलिए, क्योंकि आज नौजवानों में डिग्री, डिप्लोमा, सर्टिफिकेट लेने की तो होड़ लगी हुई है, लेकिन सीखने की होड़ काफी कम है। सरकार द्वारा स्किल इंडिया कार्यक्रम तो चलाया जा रहा है, लेकिन उसमें भी अभ्यर्थियों का ध्यान सीखने से ज्यादा सर्टिफिकेट पाने में लगा होता है। इन नौजवानों को समझना चाहिए कि आज भी हुनर का महत्व है, डिग्री का नहीं।
दीपक वाष्र्णेय, अलीगढ़
deepakvarshney231997@gmail.com
शत्रुओं की भाषा
देश में सियासत का स्तर किस हद तक गिरना बाकी है, इसका जवाब तो भविष्य के गर्भ में है, मगर राष्ट्र के स्थान पर स्वार्थ की सियासत देश के सामाजिक सद्भाव को नष्ट-भ्रष्ट करने पर तुली है। आतंकवाद के राक्षस से कैसे निपटना है, यह देश के दिशानायक बखूबी जानते हैं, लेकिन स्वार्थ की सियासत भारतीय शौर्य के अभियानों पर भी उंगली उठाने से बाज नहीं आ रही है। प्रश्न यही है कि अपनी जान पर खेलकर देश को सुरक्षित रखने के सेना के प्रयासों पर आखिर कब तक संकीर्ण सियासत होती रहेगी? देश का आम आदमी भी अब सियासी मनसूबों को समझने लगा है। संकीर्ण सियासत केवल अपने राजनीतिक हित के लिए शत्रुओं की भाषा बोल रही है, जिसे राष्ट्र-हित में उचित नहीं कहा जा सकता।
सुधाकर आशावादी, ब्रह्मपुरी, मेरठ

ss.ashawadi@gmail.com

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