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दंगों की वजह

बंगाल और बिहार में हुए सांप्रदायिक दंगे भारत की गंगा-जमुनी तहजीब पर एक बार फिर दाग साबित हो रहे हैं। विभिन्न समुदायों के कुछ असामाजिक तत्वों के कारण लोगों में कटुता बढ़ रही है। किसी भी धर्म या समुदाय का पर्व खुशियां मनाने का अवसर होता है, आखिर कैसे वह अवसर हिंसा व तनाव पैदा कर देता है? इसका मुख्य  कारण यह है कि हमने अपने बच्चों का उचित पालन-पोषण नहीं किया है। उन्हें सामाजिक मूल्यों से कहीं अधिक व्यक्तिगत मूल्यों के बारे में बताया। इस कारण जब कभी उनका व्यक्तिगत हित प्रभावित होता है, वे हिंसक होने में भी नहीं हिचकते। दूसरा कारण सूचना व प्रौद्योगिकी का बेजा इस्तेमाल है। सोशल मीडिया पर झूठी सूचानाएं इस कदर फैलती हैं कि वे लोगों को भ्रमित कर देती हैं और वे हिंसक हो उठते हैं। राजनीतिक महत्वाकांक्षा भी इसकी बड़ी वजहों में से एक है। इसीलिए अच्छे चरित्र व मूल्यों वाले नागरिकों की राजनीति में आमद समाज को एक नई दिशा दिखा सकेगी।

प्रदीप वर्मा, जेएनयू, नई दिल्ली

बैंकों का लिंक टूटना

बैंकों में लिंक टूटने की समस्या इतनी भयावह हो गई है कि इसका तत्काल निदान जरूरी है। प्राय: यह देखा जाता है कि आकस्मिक परिस्थितियों में भी खाताधारी अपने खाते में पैसे होने के बावजूद उसे नहीं निकाल पाता। तेजी से विकास कर रहे राष्ट्र के लिए इस तरह की समस्या अच्छी बात नहीं है। हर बार यह कहना भी सही नहीं है कि गलती बैंकों की है, क्योंकि वे आपदा-प्रबंधन नहीं करते। लिंक का बार-बार टूटना हमारी विद्युत व्यवस्था के दोष को भी दर्शाता है। आजादी के सात दशक बाद भी हम बिजली के मामले में सक्षम नहीं बन पाए हैं। यह इस समस्या को और जटिल बना रहा है।

महेश प्रसाद सिन्हा
मझौलिया रोड, मुजफ्फरपुर, बिहार

दम तोड़ती उम्मीदें

साल 2014 में नौजवानों ने भाजपा की ओर आशा भरी निगाहों से देखा था। उन्हें भरोसा था कि पार्टी उनके सपने को साकार करेगी। मगर 16वीं लोकसभा का कार्यकाल पूरा होने को आया है, और नौजवान खुद को ठगा महसूस कर रहा है। उसे आखिर मिला क्या? प्रतिदिन 1.5 जीबी इंटरनेट डेटा, धार्मिक असहिष्णुता व कट्टरता या स्वरोजगार का झांसा? शिक्षा-व्यवस्था में भ्रष्टाचार की एक के बाद दूसरी घटनाओं ने नौजवानों का शिक्षा-व्यवस्था पर से विश्वास उठा दिया है। वे सड़कों पर आंदोलन करने को मजबूर हुए हैं। अभी सीबीएसई के बाद एफसीआई के पेपर लीक होने की भी खबर आई है। इन सबका हमारे बच्चों पर क्या असर पड़ेगा? क्या वे बड़े होकर देश की सांविधानिक संस्थाओं पर विश्वास कर सकेंगे?

अभिप्रिंस घुवारा
टीकमगढ़, मध्य प्रदेश

बढ़ती आबादी

देश की बढ़ती जनसंख्या पर चिंता और जनसंख्या नीति पर फिर से गौर करने की आवश्यकता बार-बार बताई जाती है। सच भी यही है कि हमारे सीमित संसाधनों पर अनियंत्रित रूप से बढ़ती जनसंख्या का भारी बोझ है। दुर्भाग्य से हमारी सरकार इस ओर ध्यान देना उचित नहीं समझती, क्योंकि यह विषय वोट का है। शायद हमारी सरकारों का विश्वास एक गुब्बारे को उसकी क्षमता से अधिक भरकर फोड़ने में है। जनसंख्या की दृष्टि से हम दुनिया भर में दूसरे सबसे बड़े देश हैं और आबादी बढ़ने की यही गति बनी रही, तो आने वाले वर्षों में हम सिरमौर रहेंगे। जब देश में संसाधनों की इतनी दिक्कत हो, तब क्या यह उचित नहीं होगा कि बढ़ती आबादी को थामने के लिए कुछ ठोस प्रयास किए जाएं? हालांकि इसकी उम्मीद कम ही दिखती है। लगता है कि सरकार ने कुछ नहीं करने का मन बना लिया है। वह तो उस दिन का इंतजार कर रही है, जिस दिन बढ़ती आबादी अपनी जरूरतों की पूर्ति के लिए हिंसक हो जाएगी।

अंकुर त्यागी
बिजनौर, उत्तर प्रदेश

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