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ठिठुरता बचपन 

जीवन तब आसान लगता है, जब घर में जरूरत के सभी सामान मौजूद हों। मगर सबका जीवन इतना हरा-भरा नहीं होता। विश्व में उभरती आर्थिक ताकत की हैसियत रखने वाले भारत में आज भी लाखों लोग फुटपाथ पर अपना जीवन गुजार रहे हैं। अभी इस सर्दी में फुटपाथ पर दिन बिताना भले अच्छा लगे, पर रात में ठंड के गहराने के बाद यह जगह अत्यधिक कष्टदायक हो जाती है। सभी को एक छत की जरूरत होती है, जो मौसम की विभिन्न परिस्थितियों में उनका बचाव कर सके। यह स्थिति बच्चों के लिए कहीं ज्यादा दुखदायी होती है। ऐसी बातें हम लगातार सुनते हैं कि बच्चे हमारे देश के भविष्य हैं, लेकिन हजारों मासूम आज भी फुटपाथों पर ठिठुरते दिख जाएंगे। अगर ये कल के सूत्रधार हैं, तो इन्हें बचाने की जल्द ही कोई पहल की जानी चाहिए।
नेहा सिंह

nehasinghdarpan@gmail.com
हिंसा हमारी संस्कृति नहीं
न हिंदू बुरा है और न मुसलमान, वहशी तो वे हैं, जो इंसानियत के खिलाफ हैं। उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर में गोकशी पर ऐसा बवाल मचा कि उग्र भीड़ ने एक इंस्पेक्टर की जान ले ली। इस मामले की सच्चाई तो उचित और निष्पक्ष जांच से ही सामने आ सकती है। मगर पिछले साल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गोरक्षा के नाम पर हिंसा करने वालों को जमकर लताड़ा था। उन्होंने ट्वीट करके कहा था कि गोरक्षा के नाम पर हिंसा करने वालों से सख्ती से निपटना चाहिए। इसके लिए उन्होंने राज्य सरकारों को विशेष हिदायतें भी दी थीं। भीड़ के हिंसक होने की वजहें दरअसल लोगों का कानून-व्यवस्था से भरोसा उठ जाना, न्यायपालिका की कछुआ गति, कुछ सत्ताधारियों और राजनेताओं का हिंसा करने वालों का बचाव करना आदि हैं। अगर कानून को अपने हाथों में लेने वालों पर कानून-सम्मत कार्रवाई हो, तो भीड़ किसी की जान नहीं ले पाएगी। अब भी यदि भीड़तंत्र को गंभीरता से नहीं लिया गया, तो लोकतंत्र खतरे में आ सकता है। राजनेताओं को वोट बैंक की चिंता छोड़कर ऐसे काम करने चाहिए, जिनसे देश की अखंडता कायम रहे।
राजेश कुमार चौहान, जालंधर

raju09023693142@gmail.com
इंसानियत पर कलंक
गोरक्षा के नाम पर हिंसा आखिर कहां तक सही है? क्या इस दौर में इंसान के जीवन का कोई मूल्य नहीं है? बात यहां धर्म या जाति की नहीं, बल्कि मानवता की है। हम इतने निष्ठुर आखिर कैसे हो सकते हैं और कानून ने कब हमें हिंसा का अधिकार दिया है? हिंसा के दौरान जान की क्षति के साथ-साथ सरकारी संपत्ति को भी क्षति पहुंचती है। उच्चतम न्यायालय ने भी कहा है कि गोरक्षा के नाम पर हिंसा की वारदातें नहीं होनी चाहिए। कोई भी समूह कानून को अपने हाथ में नहीं ले सकता। यह सही है कि हिंदू धर्म में गाय को माता माना जाता है और लोग भावनात्मक रूप से इससे जुड़े हैं, परंतु गोरक्षा के लिए कानून तोड़ना कोई विकल्प नहीं है। सरकार का दायित्व है कि गोरक्षा के नाम पर गुंडागर्दी मचाने वालों को कठोर सजा दे। ऐसे असामाजिक तत्व केवल मानवता को शर्मसार करते हैं। 
साक्षी
badonisakshi5@gmail.com
बीमार बनाता अस्पताल 
कहने को तो दिल्ली में लगभग 50 अस्पताल और 150 मोहल्ला क्लीनिक हैं। इन जगहों पर दवाई और जांच की सुविधा तो अच्छी है, लेकिन सफाई की नहीं। अस्पतालों में मरीज स्वस्थ होने के लिए आते हैं, पर वे अपने साथ ले जाते हैं एक नई बीमारी। अस्पतालों में पान-गुटके की पीक और जगह-जगह कूड़े के ढेर देखे जा सकते हैं। गंदगी की वजह से यहां स्वस्थ लोग भी बीमार पड़ सकते हैं। स्थिति यह है कि कई अस्पतालों में मास्क लगाकर जाना ही सुरक्षित माना जाता है। संबंधित विभाग को इस समस्या का हल निकालना चाहिए। लोगों की मुश्किलें दूर होनी चाहिए।
राहुल सिंह राठौर, दिल्ली विवि
rahul21rathore97@gmail.com

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  • Web Title:mail box hindustan column on 5th december