DA Image

अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

क्यों ढोएं जिन्ना को

अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी किसी-न-किसी वजह से चर्चा में रहती ही है। ताजा विवाद सांसद सतीश गौतम द्वारा कुलपति को लिखे उस पत्र से पैदा हुआ है, जिसमें उन्होंने छात्रसंघ कार्यालय में लगी मोहम्मद अली जिन्ना की तस्वीर को हटाने की मांग की है। इस विवाद पर छात्रसंघ के प्रवक्ता का कहना है कि वह तस्वीर आजादी के पहले से वहां है, क्योंकि महात्मा गांधी और जिन्ना, दोनों को छात्रसंघ की मानद सदस्यता दी गई थी। एक तर्क यह भी दिया गया है कि पाकिस्तान बनने के पहले जिन्ना ने भी आजादी की लड़ाई में हिस्सा लिया था। लेकिन सच यह भी है कि आजादी की लड़ाई जब अंतिम दौर में आ गई, तब जिन्ना अंग्रेजों के इशारे पर धर्म के नाम पर एक अलग मुस्लिम राष्ट्र के लिए अड़ गए। उसका क्या नतीजा हुआ, यह इतिहास का एक दर्दनाक अध्याय है। धर्मनिरपेक्षता अपनी जगह है, पर देश के टुकड़े करवाने वाले का प्रशस्तिगान देशभक्ति नहीं हो सकती। पाकिस्तान में जब राष्ट्रपिता महात्मा गांधी को महापुरुष मानकर उन्हें सम्मान नहीं दिया जाता, तो हम जिन्ना को क्यों ढोएं?

विश्व वीर सिंह, नरौली, संभल

सियासत का अखाड़ा

शिक्षण संस्थानों को सियासी अखाड़ा बनाने से भले ही राजनीतिक तत्व स्वयं की पीठ थपथपाएं, मगर संस्थानों में सांप्रदायिकता का विषबेल बोना देश के लिए घातक सिद्ध होगा। विचारों में भिन्नता होना कतई गलत नहीं है, मगर  मत-भिन्नता के कारण हिंसक उपद्रवों की स्वतंत्रता भी किसी को नहीं मिलनी चाहिए। अलीगढ़ मुस्लिम विश्व. की घटना दुखद है, जिसकी निष्पक्ष जांच होनी अपेक्षित है। यही नहीं, शिक्षा के मंदिरों में हथियारों का प्रदर्शन भी यह सोचना को विवश करता है कि ये मंदिर अध्ययन-अध्यापन से राष्ट्र-निर्माण की शिक्षा देने के लिए हैं या फिर हिंसक वारदातों की शिक्षा देने के लिए?

सुधाकर आशावादी, ब्रह्मपुरी, मेरठ


कैसे सुधरे आबोहवा

विश्व स्वास्थ्य संगठन ने प्रदूषित शहरों की जो सूची जारी की है, उसमें दुनिया के 15 सबसे प्रदूषित शहरों में से 14 भारत के हैं। यानी प्रदूषण फैलाने में हम दुनिया का नेतृत्व कर रहे हैं! प्रदूषित शहरों की इस लिस्ट के अनुसार कानपुर पहले और राजधानी दिल्ली छठे नंबर पर है। राजधानी के प्रदूषण को लेकर अक्सर चिंता जाहिर की जाती है, लेकिन अब पूरे देश पर बात करनी होगी। सिर्फ कुछ महानगरों को प्रदूषण मुक्त कर देने से कुछ नहीं होगा, हालांकि यह भी अब तक महज एक सपना ही है। महानगरों में सीएनजी पंपों पर लंबी-लंबी लाइनें लगी रहती हैं और अदालत के आदेशों के बाद भी पुरानी डीजल गाड़ियां सड़कों पर धुआं छोड़ती रहती हैं। पिछले साल सरकार ने घोषणा की थी कि 2030 से देश में बनने वाली सभी कारें इलेक्ट्रॉनिक होंगी, बाद में इस पर चुप्पी साध ली। आखिर कैसे सुधरेगी देश की आबोहवा?

सुभाष बुड़ावन वाला, खाचरौद


असली दलित प्रेम

नेतागण इन दिनों दलितों के घर भोजन और रात्रि-विश्राम करके एक आदर्श स्थापित कर रहे हैं। उन्हें सम्मान दे रहे हैं, और उनके साथ अपनापन दिखा रहे हैं। ऊपरी तौर पर यह एक आदर्श स्थिति लग रही है, मगर क्या यह अच्छा नहीं होता कि नेतागण दलितों के यहां रुकने की बजाय सप्ताह में एक दलित दंपति को भोजन और रात्रि विश्राम के लिए अपने घर पर आमंत्रित करते? जिस दिन ऐसा होने लगेगा, उस दिन यह मान लिया जाएगा कि नेताओं का दलित-प्रेम वास्तविक है, वोट बटोरने के लिए किया जाने वाला नाटक नहीं। आशा है कि सच्चे दलित-प्रेम के वशीभूत होकर नेतागण दलित भाइयों को शीघ्र ही अपने आवास पर भोजन और रात्रि विश्राम के लिए आमंत्रित करेंगे। 

रमेश सचदेव
 

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title:mail box hindustan column on 4 may