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रोजगार का आलम

भारत नौजवानों का देश है, पर हाल यह है कि यहां युवाओं के हाथों में ही रोजगार नहीं है। प्रत्येक विभाग में सेवानिवृत्त लोगों को ही काम देने की बातें होती रहती हैं। नौजवानों के रोजगार की तरफ न विभाग का ध्यान है और न सरकार का। इससे गरीबी और अमीरी का ग्राफ बढ़ता जा रहा है, क्योंकि जो पहले रोजगार संपन्न थे, उन्हें ही काम का अवसर मिल रहा है, जबकि जिस परिवार ने जैसे-तैसे करके अपने बच्चों को पढ़ाया-लिखाया और काबिल बनाया, उनके पास कोई रोजगार नहीं है। सरकार अनुबंध पर काम करने वाले लोगों को स्थाई करने का वादा जरूर करती है, पर यह वोट पाने के लिए ही किया जाता है। चुनाव के बाद सभी वादे भुला दिए जाते हैं। सरकार को गंभीरता दिखानी चाहिए, और सभी कुशल हाथों के लिए रोजगार की व्यवस्था करनी चाहिए।

अनुज कुमार गौतम, दिल्ली


अस्पतालों की दुर्दशा

एक तो देश में आबादी के हिसाब से सरकारी अस्पताल नहीं हैं, फिर उनमें से कई ऐसे हैं, जहां इलाज की सही व्यवस्था नहीं है। इससे खासतौर से गरीब मरीजों को काफी कष्ट होता है। उनके पास दो विकल्प होते हैं, या तो मन-मारकर वहीं इलाज कराएं या फिर निजी अस्पतालों का रुख करें। अगर सरकारी अस्पताल में ही वे इलाज कराते हैं, तो सही इलाज न मिलने से उनकी परेशानी बढ़ जाती है। और यदि वे किसी तरह निजी अस्पताल जाते हैं, तो वहां उनका जमकर आर्थिक शोषण किया जाता है। अस्पतालों में तोड़-फोड़ करने वालों का यही कष्ट है। सरकार को इस तरफ ध्यान देना चाहिए। सरकारी अस्पतालों में इलाज की अच्छी व्यवस्था होनी चाहिए।

सौरभ कुमार राजा, हजारीबाग


तुरंत हो फैसला

निर्भया के बाद शुरू हुआ जघन्य गैंगरेप का सिलसिला खत्म होता नहीं दिख रहा है। बलात्कार और फिर पीड़िता की हत्या एक क्रूरतम अपराध है, जिसकी सजा सिर्फ फांसी होनी चाहिए, और वह भी जल्द से जल्द। मगर ऐसा शायद ही होता है। मेडिकल, पुलिस कार्रवाई और कोर्ट की सुनवाई में काफी वक्त गुजर जाता है। इस दरम्यान कई बार अपराधी की स्वाभाविक मौत हो जाती है। सरकार ने कानून सख्त करने की कोशिश की है, और ऐसे मामलों के लिए फास्ट ट्रैक कोर्ट बनाने की चर्चा भी है। मगर जमीन पर इसका अब भी बहुत ज्यादा असर नहीं दिख रहा। कानून को सख्त करके ऐसे अपराधियों को फौरन फांसी की सजा देनी चाहिए, ताकि दूसरे अपराधियों में खौफ पैदा हो। यौन शोषण जैसे अपराधों से निपटने के लिए पोर्न बेवसाइटों पर भी रोक जरूरी है।

शोएब फराज, रिछा, बरेली


अंग्रेजी बनाम मातृभाषा

भारत की एक प्रमुख खासियत है, विविधता में एकता। मगर विभिन्न प्रकार की विविधताओं में एक विविधता शिक्षा की भाषा है, जिसमें एकता का न होना समस्या पैदा करता है। देश में शिक्षा पाने वाले दो समूह हैं। एक अपनी मूल भाषा में इसे हासिल कर रहा है, जबकि दूसरा समूह अंग्रेजी की ओर आकर्षित है। वह अंग्रेजी माध्यम से शिक्षा हासिल कर रहा है। इस स्थिति से दोनों समूहों में स्वाभाविक तौर पर दूरी बन रही है। इसकी एक वजह यह भी है कि अंग्रेजी में शिक्षा हासिल करने वाले विद्यार्थियों का करियर काफी विस्तृत होता है, जबकि अपनी मूल भाषा में पढ़ाई करने वाले छात्रों के लिए अवसर सीमित होते हैं। शिक्षा प्रणाली के इस अंतर को समझना और इसे दूर करना राष्ट्र के विकास के लिए अत्यंत आवश्यक है। हमें एक ऐसी शिक्षा प्रणाली अपनानी चाहिए, जो इन दोनों समूहों के अंतर को दूर करे और दोनों को रोजगार के समान अवसर मुहैया कराए। इससे मातृभाषा के प्रति विशेष आग्रह रखने वाले लोगों की शिकायत भी दूर हो जाएगी। क्या सरकार ऐसा करेगी?

मनीषा रानी

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