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स्वामीजी की उपेक्षा

एक क्रांतिकारी और धार्मिक महापुरुष, जो गुजरात की धरती पर ही पैदा हुए और जिन्होंने देश को एक नई राह दिखाई, उन्हें हम सबने बिसरा दिया। 30 अक्तूबर को स्वामी दयानंद सरस्वती की पुण्यतिथि थी, पर उनकी याद में शायद ही कोई कार्यक्रम हुआ। जबकि दयानंद सरस्वती ने धार्मिक रूढ़िवादी विचारों के खिलाफ अकेले संघर्ष किया। आज ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ की बातें खूब की जाती हैं, लेकिन स्वामी दयानंद ने कन्या शिक्षा के मामले में कितना योगदान दिया है, यह किसी से छिपा नहीं है। आज भी आर्य समाज कन्या इंटर कॉलेज उनके अभूतपूर्व योगदान की गवाही दे रहे हैं। क्या स्वामीजी की उपेक्षा अनजाने में हो गई या फिर जान-बूझकर? चूंकि वह वोट नहीं दिला सकते, इसलिए उन्हें याद नहीं किया गया? 
रचना रस्तोगी
मेरठ, उत्तर प्रदेश

सड़क पर गड्ढे

जीटी रोड में बडे़-बडे़ गड्ढों से आम जनता परेशान है। यह देश का सबसे बड़ा रोड है और सबसे व्यस्त भी। मगर उत्तर प्रदेश में यह दुर्दशा की स्थिति में है। सड़क पर आधे से एक फुट गहरे गड्ढे हो चुके हैं। त्योहारी सीजन में लोग जान की बाजी लगाकर इससे गुजर रहे हैं। बसों को भी 40 किलोमीटर का सफर तय करने में दो-दो घंटे तक लग जाते हैं। गड्ढों के कारण इस रोड पर कभी भी कोई बड़ा हादसा हो सकता है। विधानसभा चुनाव से पहले भाजपा ने अपने घोषणापत्र में प्रदेश की सड़कों को गड्ढा-मुक्त बनाने का वादा किया था। मगर यह वादा इस सड़क पर पूरा होता नहीं दिख रहा। संबंधित विभाग को इस दिशा में सक्रियता दिखानी चाहिए।
शशांक वाष्र्णेय, दिल्ली विवि

जनसंख्या और बेरोजगारी

जनसंख्या और बेरोजगारी का गुब्बारा आज की बड़ी समस्या है, और कई दूसरी समस्याओं की जड़ भी। अजीब बात है कि राजनीतिक पार्टियां इससे निपटने के लिए कुछ नहीं कर रही हैं, जिससे अब अराजकता बढ़ने लगी है। दिक्कत यह भी है कि सभी पार्टियों का रुख इस पर एक है। मसलन, पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने राष्ट्रहित में राजे-महाराजाओं के प्रिवी पर्स खत्म करके बैंकों का राष्ट्रीयकरण जरूर किया था, मगर बाद में उनके समय में ही रोजगार में कटौती शुरू कर दी गई थी। अटल बिहारी वाजपेयी के समय में तो कर्मचारियों की पेंशन ही खत्म कर दी गई, जो आज भी आम चर्चा में है। साफ है कि सभी नेताओं को अपनी कुरसी की ही चिंता है, जनता के हित की नहीं। यदि वाकई उन्हें चिंता होती, तो हालात ऐसे न होते। प्राय: सभी नेता सत्ता में आते ही पिछले शासक को दोषी ठहराने लगते हैं, जबकि दूसरों की आलोचना की बजाय कुछ ठोस करने से ही वे आगे निकल सकते हैं। 
वेद मामूरपुर, नरेला

अभियानों की हकीकत

हर मसले पर राजनीति करने वाले हमारे नेताओं को यह जरूर जानना चाहिए कि उनके द्वारा चलाए जा रहे अभियानों या कार्यक्रमों की हकीकत क्या है? खुले में शौच से मुक्ति का अभियान चलाने के बावजूद आज देश की 40 फीसदी किशोरियां खुले में शौच जाने को मजबूर हैं। इतना ही नहीं, ग्रामीण क्षेत्रों की 46 फीसदी किशोरियों को माहवारी के दौरान अस्वच्छ तरीकों का इस्तेमाल करना पड़ता है। एक गैर-सरकारी संगठन नंदी फाउंडेशन की ओर से किए गए इस अध्ययन में यह पता चल रहा है कि भारत की औरतें सेहत और सुविधाओं के मापदंड पर अब भी काफी पीछे हैं। अध्ययन यह भी बताता है कि हर दूसरी किशोरी खून की कमी से पीड़ित है और यह आंकड़ा शहरी व ग्रामीण इलाकों में समान है। यानी कई अहम मामलों में हम आज भी काफी पिछड़े हुए हैं। इन सबके निदान के बारे में हमें  गंभीर होना चाहिए।

अयूब अली, डॉ आंबेडकर नगर
 

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