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संस्कृत का अपमान

जिस संस्कृत ने दुनिया की कई भाषाओं को गढ़ा, जिसने देश को अनेक ग्रंथ दिए, जिसने विश्व को ज्ञान-विज्ञान सिखाया, जो वैज्ञानिक और कंप्यूटर तक की भाषा बन चुकी है, उस संस्कृत भाषा में उत्तराखंड की नई राज्यपाल शपथ नहीं ले पाईं, जबकि यह उनकी इच्छा थी। इसका कारण यह बताया गया कि सांविधानिक पदों पर संस्कृत में शपथ लेने की वैधानिक, तकनीकी और कानूनी अड़चनों को दूर नहीं किया जा सका है। इससे बड़ा दुर्भाग्य हमारे देश के लिए भला क्या हो सकता है कि यहां संस्कृत में कोई शपथ तक नहीं ले सकता? हालांकि हमें आदि संस्कृत भाषा को पुन: विकसित करने की भी कोशिश करनी चाहिए, ताकि आम जनमानस तक इसके मूल ग्रंथ पहुंच सकें। सस्कृत भाषा पर नए सिरे से ध्यान दिए जाने की जरूरत है।
मनमोहन लखेड़ा
देहरादून, उत्तराखंड
arnavmanmohan1974@gmail.com
नहीं भूलेगा आरके स्टूडियो 
यह खबर आई है कि महान शो-मैन, निर्माता, निर्देशक और अभिनेता राज कपूर के ऐतिहासिक आरके स्टूडियो को बेचा जाएगा। इस खबर ने उन मशहूर और चर्चित फिल्मों की यादें ताजा कर दी, जिनका निर्माण इस स्टूडियो में हुआ है। बॉलीवुड के इतिहास में कपूर परिवार का नाम स्वर्णाक्षरों में लिखा है। इसमें आरके स्टूडियो की भूमिका भी काफी अहम है। आग, मेरा नाम जोकर, श्री 420, राम तेरी गंगा मैली सहित कई सुपरहीट फिल्मों का निर्माण इसी स्टूडियो में हुआ है। कई नायक-नायिकाओं को बनाने में भी इस स्टूडियो का महत्वपूर्ण योगदान है। मगर दुर्योग से पिछले वर्ष शॉर्ट सर्किट के कारण इस स्टूडियो में भयंकर आग लग गई और ‘आग’ फिल्म से शुरू हुआ इस स्टूडियो का सफर आग के कारण ही अंत हो गया। यह स्टूडियो इतिहास में हमेशा याद रखा जाएगा।
अनित कुमार राय, बाघमारा, धनबाद
anitkrroybagh@gmail.com
गुलामों सी जिंदगी
तिहाड़ जेल में 13 साल से अधिक की सजा काट चुके एक कैदी के फरार होने से देश की जेल-व्यवस्था फिर चर्चा में है। फरार कैदी का अब तक का रिकॉर्ड बहुत अच्छा था। उसके फरार होने की वजह यह सामने आई है कि उसे जेल अधिकारियों की कार की सफाई के लिए भेजा गया था। वह इसका पहले भी विरोध कर चुका था। हालांकि गुलामी करवाने की ऐसी शिकायतें अन्य कैदियों की भी हैं। कैदी अपने किए जुर्म की सजा काटने जेल में आते हैं। उन्हें गुलाम बनाकर रखना, उनसे नौकर जैसा काम करवाना उचित नहीं है। लेकिन हमारे यहां जेलों में ऐसा ही हो रहा है। एक तरफ हम जेलों को सुधार गृह में बदलना चाहते हैं, तो दूसरी तरफ इस तरह की यातनाएं कैदी को देते हैं, जो उसके सुधार के मार्ग में बाधक होती हैं। जेलों को यातनागृह बनाने से हमें बचना चाहिए।
देवेंद्र जोशी, उज्जैन
joshi.devendra85@gmail.com
डिजिटल साहित्य की मांग
आज के दौर में सभी लोग सोशल मीडिया से कुछ इस तरह से जुड़ गए हैं कि चाहकर भी अब उन्हें इससे अलग नहीं किया जा सकता। और अलग करें भी तो क्यों, जब सोशल मीडिया उनको आसानी से हर विषय की जानकारी उपलब्ध करा रहा है? हां, यह अलग बहस का विषय है कि यह जानकारी कितनी सकारात्मक है और कितनी नकारात्मक? मगर आज के समय में तमाम जानकारियां गूगल से मांगी जा सकती है। साहित्य के संदर्भ में भी अब यही सच लगने लगा है। इस बार दिल्ली पुस्तक मेले में काफी संख्या में लोग जरूर पहुंच रहे हैं, पर मेले में ई-बुक रीडर की संख्या ही ज्यादा दिख रही है। इससे पता चलता है कि आज के समय में कोई भी किताबें नहीं पढ़ना चाहता। डिजिटल फॉर्म में पढ़ने की दिलचस्पी बढ़ रही है। इस नए ट्रेंड पर अध्ययन किया जाना चाहिए।
सुनाक्षी दुबे
डॉ भीमराव आंबेडकर कॉलेज
sunakshidubey88@gmail.com

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  • Web Title:mail box hindustan column on 29 august