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हावी होता धनबल 

शुक्रवार को प्रकाशित नीरजा चौधरी का लेख पढ़ा। उसमें उन्होंने वर्तमान लोकसभा चुनाव में हो रहे धनबल के इस्तेमाल पर अपनी प्रतिक्रिया जाहिर की है। लेखिका ने बताया है कि किस तरह चुनावों में धनबल दिनों-दिन हावी होता जा रहा है। यह वाकई भारत की विडंबना है। एक तरफ तो हम अपने आप को दुनिया का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश मानते हैं, दूसरी तरफ लोकतंत्र के नाम पर धनबल और बाहुबल का हमें सामना करना पड़ता है। लेखिका ने अमेरिकी चुनाव के बारे में एक रोचक बात कही कि वहां लोग खुलेआम यह बताते हैं कि वे डेमोक्रेट्स हैं या रिपब्लिकन, क्योंकि मतदाताओं को बाहुबल का सामना नहीं करना पड़ता। इसके विपरीत, हमारे देश में लोग किसी पार्टी विशेष के समर्थन की बातें नहीं कर सकते, क्योंकि इससे उन्हें विरोध का भय सताता है। यह तस्वीर जल्द से जल्द बदलनी चाहिए। क्या यह उम्मीद करें कि हमारा देश जल्द ही इस समस्या से निजात पा लेगा?

शुभम गुप्ता , धनबाद


आम लोगों की सुध

एक तरफ बीएसएनएल आर्थिक तंगी से हलकान है और जेट एयरवेज की उड़ानें बंद होने से करीब 20,000 कर्मियों की रोजी-रोटी पर संकट आ गया है, तो दूसरी तरफ चुनावी रैलियों में जमकर पैसों की बर्बादी की जा रही है। समझ नहीं आ रहा कि देश को बेरोजगारी की अंधी राह पर धकेलकर हमारे दिशानायक कौन-से भारत बनाने का स्वप्न देख रहे हैं? विचारणीय बात यह भी है कि आम आदमी के लिए रोजी-रोटी जुटाना बेहद मुश्किल होता जा रहा है और राजनेता बड़ी-बड़ी गाड़ियों के काफिले के साथ चुनावी रोड शो तथा रैलियों में धन की बर्बादी कर रहे हैं। येन-केन-प्रकारेण सत्ता हथियाने की होड़ में सत्तापक्ष रोजगार की समस्या से आंखें मूंदे बैठा है। एक अहम सवाल यह भी है कि चुनाव प्रचार के लिए धन कहां से आ रहा है? काले धन पर अंकुश लगाने की बात करने वाले नेता चुनाव प्रचार में कौन-सा धन इस्तेमाल कर रहे हैं? सिर्फ भाषणबाजी से किसी समस्या का समाधान संभव नहीं है। खुद के लिए कुछ और तथा आम आदमी के लिए कुछ और सरीखी नेताओं की नीतियां अब देश स्वीकार नहीं करेगा।

सुधाकर आशावादी, ब्रह्मपुरी, मेरठ


गलत है जूता फेंकना

नेताओं पर जूते फेंकने की परंपरा लंबे समय से चली आ रही है। इससे पहले पूर्व वित्त मंत्री पी चिदंबरम की प्रेस कॉन्फ्रेंस में जूता फेंका गया था। अब भारतीय जनता पार्टी के प्रवक्ता निशाने पर लिए गए हैं। प्रेस वार्ताओं में जूते उछालना और फेंकने वाले शख्स का बाहरी होना बताता है कि नेताओं की प्रेस कॉन्फ्रेंस में सुरक्षा में कितनी चूक होती है। ऐसी घटना किसी भी पार्टी की प्रेस वार्ता में हो, बहुत ही निंदनीय है। इस पर पूर्ण रूप से विराम लगाने के लिए सुरक्षा के तमाम प्रबंध किए जाने चाहिए। 

विजय कुमार धनिया, नई दिल्ली


चुनाव में धर्म

देश में लोकतंत्र का महापर्व चल रहा है। सभी पार्टी जीतने के लिए बहुत से वादे कर रही हैं, साथ ही नागरिकों को कहीं न कहीं गुमराह भी किया जा रहा है। ऐसा लग रहा है कि नेताओं के पास चुनाव में उतरने के लिए कोई ठोस मुद्दा नहीं बचा है। आज जिस तरह से सांप्रदायिकता को चुनाव जीतने का जरिया बनाया जा रहा है, उससे देश में जातिवाद बहुत विकराल रूप धारण कर रहा है। सभी दल जाति और मजहब के नाम पर वोट मांग रहे हैं। सांप्रदायिकता के नाम पर चुनाव जीतने वाले नेतागण एक अच्छे लोकतंत्र के लिए खतरा हैं। महंगाई, गरीबी, भ्रष्टाचार, जातिवाद और बेरोजगारी जैसे मुद्दों पर बात न करके धर्म के नाम पर वोट मांगना लोकतंत्र को कमजोर करेगा। चुनाव आयोग ऐसे नेताओं पर सख्त कार्रवाई करनी चाहिए, ताकि चुनाव औचित्यपूर्ण बन सकें। 

आयुष सैनी
 सहारनपुर, उत्तर प्रदेश
 

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