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अच्छे उम्मीदवारों की कमी

चुनाव आदर्शों और विचारधाराओं के आधार पर ही लडे़ जाने चाहिए, जिनमें उम्मीदवारों के चरित्र और उनकी अच्छाई महत्वपूर्ण कसौटी हो। मगर आज तमाम दलों में धनबल और बाहुबल ही उम्मीदवारी के आधार बन गए हैं। इससे अच्छे लोग राजनीति से दूर हो गए हैं। जनता अंतत: किसे चुनेगी, यह तो आने वाला वक्त ही बताएगा, लेकिन सच यही है कि दो बुरे लोगों में से कम बुरे को चुनना आज के लोकतंत्र की नियति बन चुकी है। विभिन्न माध्यमों के जरिए बेशक जनता को लोकसभा चुनावों में मतदान के लिए प्रेरित किया जा रहा है, लेकिन न तो उम्मीदवारों के चयन में और न ही मुद्दों के चुनाव में उसके मत को महत्व दिया जाता है। आज अधिकांश उम्मीदवार दागी हैं। वे खुलेआम आचार संहिता का उल्लंघन करते हैं। चुनाव में पैसों का खेल भी किसी से छिपा नहीं है। अब शायद ही कोई नेता ऐसा दिखता है, जो अपनी साफ छवि या काम के बलबूते वोट मांग रहा हो। ऐसे में, जनता आखिर किसे और क्यों चुने?

मोहित सोनी, कुक्षी, मध्य प्रदेश


शायद संभलें नेतागण

इस बार चुनाव में धर्म के आधार पर वोट मांगने वाले नेताओं की संख्या बढ़ती जा रही है। मायावती से लेकर सिद्धू तक सभी यही कोशिश कर रहे हैं कि किसी तरह एक संप्रदाय विशेष के वोट उनकी पार्टी को मिलें। इस माहौल में चुनाव आयोग की भूमिका सिर्फ नोटिस जारी करने तक सीमित थी। लेकिन भला हो सुप्रीम कोर्ट का, जिसने चुनाव आयोग को उसकी शक्तियां याद दिला दीं और आयोग ने भी त्वरित कार्रवाई करते हुए कई नेताओं के प्रचार पर प्रतिबंध लगा दिया। आशा है, अब नेताओं के मन में चुनाव आयोग का भय बनेगा और वे देश को तोड़ने वाली इस तरह की हरकतों से दूर रहेंगे।

बृजेश श्रीवास्तव, गाजियाबाद


दायित्व निभाए आयोग

लोकतंत्र के महाकुंभ में प्रचार-प्रसार के दौरान राजनेताओं की तरफ से ऐसी कई प्रतिक्रियाएं भी सामने आ रही हैं, जो देश के लोकतंत्र पर बहुत बड़ा प्रश्नचिह्न लगा रही हैं। नेतागण जिस तरह से अपनी चुनावी रैलियों व प्रचार-प्रसार के दौरान विपक्षी नेताओं पर टीका-टिप्पणी करते हैं, वह बेहद शर्मनाक है। यह टिप्पणी कभी-कभी तो अशालीन और अश्लील भी हो जाती है। देश के अहम मुद्दों को लेकर चुनावी रैलियों में शायद ही कहीं चिंतन झलकता दिखता है। ऐसे नेता सत्ता की कमान संभालने के लिए तैयार तो बैठे हैं, पर उन्हें विपक्षी दलों पर टिप्पणी करने से फुरसत नहीं है। हालांकि ऐसा कोई पहली बार नहीं हो रहा है। यह उत्तरोत्तर गति पकड़ता जा रहा है। चुनाव आयोग का बढ़ता ढीला रवैया इसका मुख्य कारण है। चुनाव आयोग को अपने दायित्वों के बारे में गंभीरता से सोचना चाहिए और आपसी सौहार्द बिगाड़ने वाले नेताओं पर सख्त कार्रवाई करनी चाहिए।

सैफ जाफरी, देहरादून

छात्र राजनीति का पतन

भारत में छात्र राजनीति का अपना इतिहास रहा हैर्, ंकतु आज जो राजनीति छात्रों के मध्य पनप रही है, वह काफी स्तरहीन है। इसकी मुख्य वजहें हैं- छात्र राजनीति में आए हिंसक बदलाव और राजनीतिक दलों का इसमें बढ़ता दखल। यही वजह है कि जो राजनीति कभी छात्रों की आवाज थी और जिसे सामाजिक क्रांति और बदलाव का प्रेरक माना जाता था, आज वह धन और बल से प्रेरित है। दिल्ली विश्वविद्यालय के 2018 के छात्र संघ चुनाव में 44.6 प्रतिशत विद्यार्थियों ने वोट दिया था, जिसमें नोटा का प्रयोग पिछले 11 वर्षों में सबसे अधिक किया गया। हालांकि इस आंकड़े का एक अन्य पहलू यह भी है कि कैंपस में 55.4 फीसदी छात्र ऐसे थे, जिन्होंने मतदान न करके इस व्यवस्था में अपना अविश्वास जाहिर किया। देश के अन्य विश्वविद्यालयों की भी यही गति है। वहां भी छात्र राजनीति का स्तर लगातार गिर रहा है।

हेमंत कुमार, दिल्ली विश्वविद्यालय
 

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