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दोहरा झटका

भाजपा को शत्रुघ्न सिन्हा से मिले एक झटके को अभी महीना भी नहीं बीता था कि मिसेज सिन्हा ने भी सपा का दामन थाम लिया और अब गृह मंत्री के विरुद्ध उनके चुनाव लड़ने की चर्चा है। पूनम सिन्हा के सपा में आने की आधिकारिक घोषणा के बाद से भाजपा को अब ‘डबल सिन्हा’ अटैक का सामना करना पड़ सकता है। चूंकि एक तरफ अनुभवी नेता के तौर पर शत्रुघ्न सिन्हा का पटना साहिब लोकसभा क्षेत्र में जनता के बीच अपना स्थान है, तो वहीं पूनम सिन्हा को गठबंधन में होने का फायदा मिल सकता है। ऐसे में, राजनीतिक विश्लेषकों के लिए भी इस खेल को समझना जरा मुश्किल हो सकता है, क्योंकि इस आम चुनाव को नेता चुनाव नहीं,आजादी की एक अदृश्य लड़ाई के तौर पर प्रस्तुत कर रहे हैं। देखना रोमांचक होगा कि श्रीमान और श्रीमती सिन्हा इस ‘आजादी के युद्ध’ के प्रवाह को आगे बढ़ाते हैं या अपनी एक अलग लहर से जनता को रूबरू कराते हैं!

वैभव शर्मा


मतभेद बढ़ाती बहस

आजकल के चुनावी माहौल में लोगों में बहुत जोश दिख रहा है। वे राजनीतिक पार्टियों को लेकर आपस में मतभेद रख रहे हैं, जिससे समाज टूट रहा है। राजनीतिक पार्टियां अपना स्वार्थ सिद्ध कर लेती हैं, पर लोग आपस में उनके लिए लड़ने को हमेशा तैयार रहते हैं। आपसी सौहार्द खत्म कर लेते हैं। लोगों को आपस में नहीं लड़ना चाहिए। देश का प्रत्येक नागरिक अपनी पसंद के उम्मीदवार को वोट देने के लिए स्वतंत्र है। यही एक अच्छे लोकतंत्र की पहचान भी है। लोकतंत्र में चुनाव को एक त्योहार के रूप में मनाना चाहिए, जिसमें सभी उत्साहपूर्वक भाग लें।

शिवानंद सिंह, मेरठ


नजीर है यह फैसला

बदजुबानी पर चुनाव आयोग की कार्रवाई सांविधानिक संस्थाओं के लिए एक नजीर है। कहते हैं, चुनाव लोकतंत्र की आत्मा है और चुनावी तकरीरें उसकी जान। देश की बड़ी आबादी को उम्मीद रहती है कि उम्मीदवार लोगों में तरक्की की तस्वीर खींचने की कोशिश करेंगे। मगर अफसोस कि सियासी रैलियों में निजी जिंदगी पर हमले किए जाते हैं और अब डिग्रियों, मजहबी पहचान और मुंहफट बयानबाजी ने असल मुद्दों की जगह ले ली है। हमेशा की तरह फिसलती जुबान का शिकार ज्यादातर औरतें होती हैं। सियासत में ऊंचे मुकाम पाए लोगों के स्तरहीन बयान लोकतंत्र पर सीधा हमला हैं। बदजुबानी से भले किसी की जीत पक्की हो जाए, मगर लोकतंत्र की रूह को चोट लगनी भी तय है। चुनावी दौर का परवान चढ़ना अभी बाकी है। ऐसे में, तकरीरों में गरमाहट और उम्मीदवारों की बौखलाहट में इजाफे की भी पूरी गुंजाइश है। हम क्यों न उम्मीद करें कि आयोग अपनी ताकत के मुताबिक आगे भी सख्त फैसले लेगा, ताकि गाली-गलौज की बजाय बात मुद्दों पर हो।

एमके मिश्रा, रातू, रांची


मजबूत बने आयोग

देश का प्रतिनिधित्व करने की होड़ में कुछ नेताओं के बिगडे़ बोल पर चुनाव आयोग का ‘48 से 72 घंटे तक’ का लगाम कुछ हद तक काम कर सकता है। भले ही आयोग ने यह कदम माननीय सर्वोच्च न्यायालय के हस्तक्षेप के बाद उठाया हो। आदर्श चुनाव आचार संहिता लागू रहने के बाद भी चुनाव आयोग द्वारा स्वयं कठोर निर्णय न लिए जाने से हमें टी एन शेषन की याद हो आती है। चुनाव आयोग देश की कितनी महत्वपूर्ण संस्था है, यह शेषन ने ही हम देशवासियों को बताया। इसकी गरिमा बनी रहनी चाहिए। बदजुबानी चुनावी रण में बंद होनी ही चाहिए, क्योंकि यह हमारे सांस्कृतिक मूल्यों के खिलाफ है। चुनाव आयोग आदर्श चुनाव आचार संहिता के तहत सभी राजनीतिक दलों के साथ समन्वय बनाकर कठोर निर्णय लेने की ओर अग्रसर हो, जिससे हम जनता इस आम चुनाव में निर्भीक होकर मतदान कर सकें।

संजय चंद, न्यू एरिया, हजारीबाग
 

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