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गन्ना किसानों का संकट

लगभग पूरे पश्चिमी उत्तर प्रदेश में दो एकड़ से कम जमीन वाले किसानों की संख्या अधिक है। इन किसानों का गुजारा मुख्यत: गन्ना और गेहूं की फसलों पर निर्भर है। ये किसान गन्ना काटकर गेहूं की फसल बोते हैं, और फिर उसी जमीन पर गन्ने की फसल लगाते हैं। परंतु यह चक्र तभी संभव है, जब गन्ने की फसल मिल द्वारा समय पर अर्थात नवंबर माह के आखिरी सप्ताह तक उठवा ली जाए। फिलहाल ऐसा नहीं हो पा रहा है। जिन किसानों के पास ज्यादा जमीन व गन्ना है, नवंबर महीने के अंत तक मिल मालिक केवल उनको ही पर्ची जारी करते हैं। बाकी किसानों को पर्ची नहीं भेजी जाती। समय पर पर्ची न मिलने से इन छोटे किसानों के खेतों में गन्ना जून के प्रथम सप्ताह तक खड़ा रहता है, और इस प्रकार इनकी गेहूं की फसल मारी जाती है। इस समस्या पर सरकार गंभीरता से विचार करे। मिल चालू होने पर वह या तो छोटे किसानों को पहले पर्ची जारी करने का प्रबंध करे या फिर नवंबर के अंत तक सभी किसानों को बराबर-बराबर पर्ची जारी की जाए, ताकि अपने गुजारे के लिए सभी किसानों को गेहूं की फसल बोने का अवसर मिल सके।

धर्मपाल सिंह, बागपत

लोकतंत्र की गिरती मर्यादा

यह समाचार चौंकाने वाला है कि सुप्रीम कोर्ट और चुनाव आयोग के गंभीर प्रयासों के बावजूद आम चुनाव में हर पांच प्रत्याशियों में से एक पर गंभीर आपराधिक मुकदमा चल रहा है। इससे ऐसा लगता है कि अब चुनाव और लोकतंत्र सब कुछ ढकोसला बनकर रह गया है। अपने यहां चुनाव तो अब इतना खर्चीला हो गया है कि एक शिक्षित, ईमानदार और सभ्य आम नागरिक चुनाव लड़ ही नहीं सकता! चुनाव प्रक्रिया में अब उन उम्मीदवारों की हैसियत बढ़ने लगी है, जिनके पास अकूत संपत्ति होती है। यही लोग मतदाताओं को तरह-तरह के प्रलोभन देकर उनके वोट खरीदने में सक्षम होते हैं। ऐसे दागियों, बलात्कार, हत्या और संगीन अपराध के आरोपी सदस्यों से भरी संसद से लोक-कल्याणकारी, जन-कल्याणकारी और जनोपयोगी कानून, कृत्य और उसके पालन की हम भला कैसे आशा कर सकते हैं? जाहिर है, देश का भविष्य अंधकारमय नजर आता है। इसका एक ही समाधान है कि आम जनता को राजनीतिक रूप से जागरूक बनाया जाए, ताकि वे उचित प्रतिनिधि को संसद भेज सकें।

निर्मल कुमार शर्मा, गाजियाबाद

निजी स्कूलों की मनमानी

नए शैक्षणिक सत्र के साथ निजी स्कूलों पर मनमाने ढंग से फीस वसूली के आरोप लगने भी शुरू हो गए हैं। हालांकि सरकार ने भी बच्चों को शिक्षा उपलब्ध कराने के लिए स्कूलों की व्यवस्था की है, लेकिन अधिकांश अभिभावक अपने बच्चों को सरकारी स्कूलों में नहीं पढ़ाते। ऐसा नहीं है कि सरकारी स्कूलों के शिक्षक योग्य नहीं होते। फिर भी, इन स्कूलों में बच्चों की संख्या इतनी कम होती है कि शिक्षकों को घर-घर जाकर बच्चों को बुलाना पड़ता है। शिक्षा विभाग को इसे रोकने के लिए गंभीरता दिखानी चाहिए।

अंजलि रूहेला, अम्बैहटा पीर

रक्षक या भक्षक 

सहारनपुर में हुई लूट की एक वारदात में जीआरपी इंस्पेक्टर, दो सिपाहियों सहित छह लोग शामिल पाए गए हैं। वर्दी की आड़ में देश और नागरिकों की रक्षा की सौगंध खाने वाले पुलिस वालों का इस तरह की वारदात को अंजाम देना बेहद चिंता का विषय है। हाल ही में लखनऊ  में भी इस तरह का एक वाकया सामने आया था। अत: इस तरह के कृत्यों को रोकने के लिए सरकार को इसके पीछे छिपे कारणों का पता लगाना चाहिए और उन कारणों को दूर किए जाने के लिए जरूरी कदम उठाने चाहिए। अगर सख्ती नहीं दिखाई जाएगी, तो जनता का पुलिस पर से विश्वास उठ जाएगा, जो न जनता के हित में होगा और न ही देश के हित में। 

अनुपमा अग्रवाल, अलीगढ़

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  • Web Title:mail box hindustan column on 16 may