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निराश करती अंपायरिंग

आईपीएल के मौजूदा सत्र में अंपायरों ने अपनी अंपार्यंरग से क्रिकेट प्रेमियों को काफी निराश किया है। हम सब जानते हैं कि आईपीएल भारत का पेशेवर टी-20 लीग है और कई देशों में इसे उत्साह व रोमांच के साथ देखा जाता है। ऐसे में, अंपायरों को सोच-समझकर अपना निर्णय देना चाहिए, क्योंकि उनके एक गलत फैसले से खेल का नतीजा पूरी तरह प्रभावित हो सकता है। पिछले मैचों में इसके कई उदाहरण हैं। चेन्नई और राजस्थान के मैच में ही मुख्य अंपायर द्वारा बेन स्टॉक्स के अंतिम ओवर के एक बॉल को नो बॉल करार देने के बावजूद लेग अंपायर ने उसे नकार दिया, ऐसे में उन्हें तीसरे अंपायर के पास जाना चाहिए था। हालांकि इससे पहले भी मुंबई और बेंगलुरु के एक मैच में अंतिम गेंद को नो बॉल होने के बाद भी नो बॉल नहीं दिया गया। संभव था कि उस नो बॉल से मैच का पक्ष बेंगलुरु की तरफ होता। इस तरह की गलतियां आईपीएल में अंपायरिंग पर सवाल खड़े करती हैं। इससे दर्शकों का विश्वास भी कम होता है।

    शुभम गुप्ता, धनबाद


ढुलमुल रवैया

राजनीतिक पार्टियों को गोपनीय इलेक्टोरल बॉन्ड और बेनाम स्रोतों से प्राप्त चंदे पर सुप्रीम कोर्ट का सुनवाई का फैसला भ्रष्टाचार व बेईमानी पर कड़ी चोट है। चुनावी बॉन्ड को वित्त विधेयक का रूप देकर सरकार ने बॉन्ड द्वारा करोड़ों रुपये जमा किए। सुशासन, भ्रष्टाचार उन्मूलन का नारा देकर नोटबंदी और जीएसटी (वस्तु और सेवा कर) लागू करने वाली सरकार चुनावी बॉन्ड पर आखिर लाचार और ढुलमुल रवैया क्यों अपना रही है? 

मदनलाल लंबोरिया, भिरानी


फिर सवालों में ईवीएम

प्रथम चरण का चुनाव संपन्न होते ही कुछ राजनीतिक दलों ने ईवीएम हैकिंग का राग अलापना शुरू कर दिया है। कारण स्पष्ट है, नाच न जाने आंगन टेढ़ा। उन्हें आभास हो गया होगा कि जीत इस समय भी कोसों दूर है। इन नेताओं को यह गलतफहमी है कि भारत में सत्ताधारी दल ही चुनाव संपन्न करवाता है। भारत में चुनाव प्रक्रिया को संपन्न करवाने के लिए लाखों अधिकारियों, कर्मचारियों को नियुक्त किया जाता है, जो निष्पक्षता से इस पूरी प्रक्रिया को अंजाम तक पहुंचाते हैं। इसमें पक्षपात या ईवीएम हैकिंग की एक प्रतिशत भी गुंजाइश नहीं होती। आखिर इन नेताओं के लिए कोई अधिकारी या कर्मचारी अपनी नौकरी को क्यों जोखिम में डालना चाहेगा? इसलिए जो आरोप लगाए जा रहे हैं, वे भाजपा पर नहीं, बल्कि सीधे-सीधे अधिकारी और कर्मचारियों पर लगाए जा रहे हैं। इसे तो कहीं से भी उचित नहीं ठहराया   जा सकता।

    जगदीश नौटियाल
 टिहरी गढ़वाल, उत्तराखंड


नजीर है यह नियुक्ति

देश के इतिहास में पहली बार केंद्रीय विश्वविद्यालय जामिया मिल्लिया इस्लामिया में एक महिला प्रोफेसर नजमा अख्तर को कुलपति के रूप में नियुक्त किया गया है। यह नियुक्ति करके सरकार ने महिला सशक्तीकरण की एक मिसाल पेश की है। महिला कुलपति एक तरह से इस विश्वविद्यालय के लिए एक नया प्रयोग है। माना जा रहा है कि इससे विद्यालय प्रांगण में विद्यार्थियों, खासतौर पर छात्राओं को अपनी राय कुलपति के साथ साझा करने में काफी सहूलियत होगी। फिर, शिक्षक के रूप में भी महिलाओं का मनोबल बढ़ेगा। साफ है, इस नियुक्ति को सरकार द्वारा महिलाओं को बढ़ावा देने के प्रति एक सधा हुआ कदम माना जा सकता है। एक सवाल के जवाब में कुलपति का यह कहना कि जैसे परिवार में पिता का अपना एक महत्व है, उससे कहीं ज्यादा मां के रूप में औरत अपने बच्चों को समझने में बेहतर है, कहीं ज्यादा उचित जान पड़ता है। इस अनुभव का प्रयोग वह कैंपस में भी करेंगी, जो सुखद अनुभूति दे रहा है। इसका स्वागत किया जाना चाहिए।

मोहम्मद आसिफ, दिल्ली

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