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उपवास पर नेता


आजकल भारत में ‘उपवास’ की राजनीति जोर पकड़ रही है। जिसे देखो, वही उपवास पर बैठ रहा है। लेकिन राजनीति के चक्कर में राजनेता अक्सर जनता को ही भूल जाते हैं। इसे देश के लाखों लोगों द्वारा किए जा रहे अनिश्चितकालीन ‘उपवास’ से समझा जा सकता है। ‘ग्लोबल हंगर इंडेक्स’ में भारत 100वें स्थान पर है। इस मामले में हम उत्तर कोरिया और बांग्लादेश से भी पीछे हैं। इस सूची में भारत को ‘गंभीर’ श्रेणी में रखा गया है। यह सूची बता रही है कि आखिर क्यों भारतीय अनिश्चितकालीन ‘उपवास’ कर रहे हैं। देश में न जाने कितने लोग रोज भूखे पेट सोते हैं, या यूं कहें कि ‘उपवास’ रखते हैं। उन्हें इंतजार है कि कोई नेता ऐसा सत्ता में आएगा, जो इनका ‘उपवास’ खत्म करेगा, मगर सच तो यह है कि नेता तो खुद ‘उपवास’ पर हैं।
प्रसन्न कुमार, देहरादून


और कितनी निर्भया
रामराज्य का सपना देखती देश की जनता को शायद रामराज्य जैसा अनुभव नहीं हो रहा है। न जाने कितनी निर्भया आज इंसाफ को तरस रही हैं। चाहे वह उन्नाव की घटना हो या कठुआ की। इंसाफ पाने की इस लड़ाई में न जाने देश की कितनी बेटियां होम हो रही हैं। अब तो अदालत भी यह कहने को मजबूर हो गई है कि ‘ऐसे में पुलिस-प्रशासन पर से जनता का भरोसा ही उठ जाएगा’। सवाल यह है कि क्यों हर बार पीड़िता को इंसाफ दिलाने के लिए मीडिया को उतरना पड़ता है? मीडिया में खबर आने के बाद ही सियासत गरमाती है और प्रशासन की नींद खुलती है। समाज में फैली इस बीमारी से लिए हमें सबसे पहले वैचारिक दरिद्रता से उबरना होगा। निर्भया कांड के बाद नया कानून तो बना, लेकिन अपराधियों के मनसूबे कमजोर नहीं हुए हैं। सिर्फ दिल्ली में ही पिछले आठ महीनों में महिलाओं के विरुद्ध 1,500 से अधिक आपराधिक मामले दर्ज किए गए हैं। यह हाल देश की राजधानी का है, तो बाकी राज्यों में महिलाओं की स्थिति आसानी से समझी जा सकती है। न जाने कब हमारी सरकारें कुंभकर्णी नींद से जागेंगी?
अभिषेक मालवीय, नोएडा


आर्थिक आरक्षण 
देश में आरक्षण का मुद्दा दिन-ब-दिन ज्वलंत रूप धारण करता जा रहा है, जिसकी आग में पूरा देश धू-धू कर जल रहा है। जातिगत आधार देश की एकता-अखंडता और संप्रभुता को लीलने के लिए तैयार बैठा है। सरकार को इस पर महत्वपूर्ण रुख अपनाना चाहिए और आर्थिक स्थिति के आधार पर आरक्षण देने का प्रावधान करना चाहिए, भले लाभार्थी किसी भी जाति या धर्म का हो। जब तक ऐसा नहीं होगा, देश प्रगति की राह पर सुगमता से आगे नहीं बढ़ सकता। इसीलिए आरक्षण से मुक्ति दिलाने के लिए सरकार को हरसंभव उपाय करना ही चाहिए।
राहुल उपाध्याय, भोपाल


पब्लिक सेक्टर का हाल
स्वतंत्रता के बाद कोई भी विकसित देश भारत के औद्योगिक विकास में मदद नहीं करना चाहता था और तब के पूंजीपतियों के पास भी इतनी पूंजी नहीं थी कि वे बड़े उद्योग स्थापित कर सकें। उन्हें बुनियादी उद्योगों से तुरंत मुनाफे की उम्मीद भी नहीं थी। इसलिए केंद्र सरकार ने जनता के धन से सार्वजनिक उद्योगों की स्थापना की। मगर आज पब्लिक सेक्टर के कारण विकसित हुए बुनियादी उद्यमों और सरकार की पूंजीपति-परस्त नीतियों के कारण पूंजीपति इन सार्वजनिक उद्योगों को औने-पौने दामों में हथियाना चाहते हैं। इसके लिए नेताओं, नौकरशाहों और तथाकथित अर्थशास्त्रियों का वे सहारा ले रहे हैं, जो लगातार पब्लिक सेक्टर के खिलाफ दुष्प्रचार कर रहे हैं। मगर यह याद रखना चाहिए कि इसी पब्लिक सेक्टर ने 2008 की मंदी में भारतीय अर्थव्यवस्था को बचाया था। इसलिए देश की रक्षा के लिए इनकी रक्षा बहुत जरूरी है।
हरेंद्र सिंह कीलका, सीकर
 

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