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दलबदल का दौर शुरू

 


चुनाव आयोग द्वारा आम चुनाव की तारीखों के एलान के साथ ही राजनेताओं के दल-बदल का दौर शुरू हो गया है। पांच साल तक जिस पार्टी के सांसद-विधायक रहे और ‘माननीय होने का गर्व महसूस करते रहे, उस गर्व को बरकरार रखने के लिए वे सारे उसूलों को ताक पर फेंकने से भी नहीं झेंप रहे। देश के मतदाताओं को भी सोचना चाहिए जिन नेताओं का खुद कोई राजनीतिक धर्म नहीं होता, उन्हें दोबारा जिताने से क्या फायदा? वैसे तो कहा जाता है कि लोकतंत्र में विपक्ष भी सरकार के बराबर ताकत रखता है, लेकिन यह बात दलबदलू माननीयों को समझ में नहीं आती। लुटियन जोन का नशा इस कदर हावी होता है कि उन्हें इसके अलावा कहीं और रहना पंसद नहीं आता। भारतीय राजनीति की इस दलबदल प्रथा पर रोक लगाने का मौका एक बार फिर मतदाताओं के पास आया है। ऐसे नेताओं को सबक सिखाना चाहिए, ताकि उन्हें विपक्ष में रहने का अनुभव हो सके। इससे लोकतंत्र के प्रति लोगों का विश्वास पुख्ता होगा। 

इमरान रईस, हैदराबाद


मतदान से देश का कल्याण

लोकतांत्रिक महापर्व का आगाज हो चुका है। चुनाव आयोग और राजनीतिक पार्टियां समर में उतर चुकी हैं, परंतु लोकतंत्र की आत्मा जिसमें बसती है, अर्थात जनता, उसे इस चुनाव में बहुत सोच-समझकर भाग लेना पडे़गा। विवेक, अनुभव, ज्ञान और राष्ट्रहित जैसे व्यापक विचारों पर आधारित मतदान की आवश्यकता है। हां, यह एक अकाट्य सत्य है कि आज की जनता जागरूक हो चुकी है। ऐसे में, कामना यही है कि विवेकपूर्ण मतदान से वे देश को अराजक और असामाजिक तत्वों से सुरक्षित करे। 

देवेश कुमार ‘देव’, गिरिडीह


सारगर्भित भाषण 

कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी ने गुजरात में अपने दो तीन मिनट के संक्षिप्त भाषण में जनमानस को प्रभावित करने वाले सभी पहलुओं को बहुत ही मर्यादित तरीके से प्रस्तुत करके एक परिपक्व राजनेता का परिचय दिया है। हिंदीभाषी क्षेत्रों में इंदिरा गांधी की अपनी एक विशेष पहचान रही है। वह अपना भाषण मर्यादित और नियंत्रित रखती थीं। सार्वजनिक मंचों से लेकर संसद तक, अब असली मुद्दे तो गायब हो गए हैं, सिर्फ एक-दूसरे पर कीचड़ उछालने की राजनीति की जा रही है। वर्षों बाद कोई मर्यादित और सारगर्भित भाषण सुनने का मिला, जिसमें मतदाता को उसकी जिम्मेदारी का एहसास कराने का बोध था। आजकल के नेताओं के भाषण तो हिंदी भाषा पर अत्याचार करते हैं। एक समय था, जब लोग अटलजी का भाषण सुनने जाते थे, आजकल भाड़े की भीड़ इकट्ठी की जाती है। जब अमर्यादित भाषणों का चौतरफा शोर हो, तब इसके बीच से उठने वाली कोई भी समझदार आवाज गौर से सुनी जाती है।

रचना रस्तोगी, मेरठ 


शराब पर पाबंदी जरूरी 

अभी उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में कई दर्जन लोगों की मौत की खबर जेहन से उतरी भी नहीं थी कि असम में अनेक लोग इसके शिकार बन गए। शराबखोरी से हमारे देश में निरंतर मौत तो हो ही रही है, इसके कारण अनगिनत परिवार और समाज भी बर्बाद हो रहे हैं, क्योंकि यह अनेक बीमारियों, मानसिक और शारीरिक उत्पीड़न, दुर्घटनाओं, धन के नुकसान और ढेर सारे अपराधों की जननी है। दुख की बात है कि इससे महिला उत्पीड़न और हत्या की घटनाएं बढ़ती ही जा रही हैं। दुर्भाग्य से सरकार इसके जरिये होने वाली राजस्व कमाई का कुतर्क देती रहती है। लेकिन यह सरासर गलत रास्ता है, क्योंकि गलत कार्य से होने वाली आय क्या कभी उचित हो सकती है? इसलिए इसकी जगह स्वास्थ्यप्रद खाद्य और पेय पदार्थों का उत्पादन ही सर्वहित में है। इसलिए शराब पर पूर्ण प्रतिबंध बहुत जरूरी है।  

वेद मामूरपुर, नरेला  

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