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आरोपों का चुनाव

चुनाव में एक-दूसरे को कमतर बताने के आरोपों के बीच जनता के अहम मुद्दे गुम हो गए हैं। कोई भी दल उन मुद्दों पर बात नहीं कर रहा, जो इन चुनावों में उठने चाहिए थे। जैसे, अगर वे सत्ता में आएंगे, तो किस तरह की शिक्षा नीति बनाएंगे, कैसे हर व्यक्ति को बेहतर स्वास्थ्य सुविधा मुहैया कराएंगे, रोजगार के लिए उनकी नीति क्या होगी और भ्रष्टाचार को रोकने के लिए वे किस तरह से प्रभावी कदम उठाएंगे? इन सबको छोड़कर बहस इस बात पर हो रही है कि मेरी कमीज से ज्यादा तुम्हारी कमीज गंदी है। दाग मेरे दामन से ज्यादा तुम्हारे दामन पर हैं। मगर असल मुद्दों पर खुद का दृष्टिकोण बताने की जरूरत कोई नहीं समझता। चुनाव तो पूरी तरह से स्तरहीन आरोपों तक सिमट गया है। क्या राजनीतिक दल जनता के सवालों के घेरे में आने से बचने के लिए चुनाव में असल मुद्दों से दूर रहना चाहते हैं? जाहिर है, मतदाताओं को ही सोचना-समझना होगा कि इन आरोपों की असल हकीकत क्या है? असल मुद्दों को दरकिनार करने का यह चलन कल के लिए कहीं ज्यादा खतरनाक है।

युधिष्ठिर लाल कक्कड़, गुरुग्राम

गिरती नैतिकता

पिछले कुछ वर्षों में देश के कर्णधारों और नेताओं में अनुशासन की कमी के साथ-साथ नैतिकता भी गिरी है। यह जनहित व देशहित में ठीक नहीं है। किसी की जुबान फिसलकर भ्रम फैला रही है, तो किसी पर करोड़ों रुपये में टिकट बेचने का आरोप लग रहा है। कोई प्रधानमंत्री पद की गरिमा के साथ खिलवाड़ कर रहा है, तो कोई इतनी निम्न-स्तरीय भाषा का प्रयोग कर रहा है कि उसे बयां करना भी अशोभनीय है। इन सबमें जनता के मूल मुद्दों को हवा में उड़ा दिया गया है और व्यक्तिगत आरोप-प्रत्यारोप तक सारा मसला सिमट गया है। जिनका अपनी जुबान पर लगाम नहीं, जिनके आचार-विचार ठीक नहीं, जिन पर कई आपराधिक मुकदमे चल रहे हैं और जिनकी नैतिकता खत्म हो गई है, उनसे भला यह कैसे उम्मीद की जा सकती है कि वे मतदाताओं को सुशासन देंगे और उन्हें सही दिशा प्रदान करेंगे।

महेश नेनावा, इंदौर, मध्य प्रदेश

अनिवार्य हो मतदान

लोकसभा चुनाव छठे चरण को भी पार कर गया। फिर भी, हमारे आसपास काफी संख्या में ऐसे लोग मिलते हैं, जो आने वाली सरकार से उम्मीदें तो ढेर सारी लगाकर बैठे हैं, परंतु वे मतदान करने नहीं गए। वोट देना हर नागरिक का अधिकार और कर्तव्य है। यह जानते हुए भी कि मतदान और लोकतंत्र के बीच परस्पर संबंध है, लोगों को ढुलमुल रवैया नहीं अपनाना चाहिए। मुमकिन हो, तो वोट देना अनिवार्य बना देना चाहिए। अगर कोई व्यक्ति किसी कारणवश वोट नहीं दे पाता है, तो उससे कारण पूछा जाना चाहिए और उत्तर संतोषजनक न पाए जाने पर उस पर कार्रवाई होनी चाहिए। हम सबको यह समझना चाहिए कि लोकतंत्र की सफलता मतदाताओं की जागरूकता पर ही निर्भर है। अगर मतदाता अपनी जिम्मेदारी नहीं समझेंगे, तो उन्हें मजबूर किया ही जाना चाहिए। 

करुणा सिंह, झरिया

विकृत मानसिकता

एक महिला अधिकारी की तस्वीर पिछले कुछ दिनों से सोशल मीडिया पर खूब शेयर की जा रही है। कहा जा रहा है कि वह महिला लखनऊ में चुनाव करवाने पहुंची हैं। उनके हाथ में ईवीएम भी साफ-साफ नजर आता है। मगर दुख तब होता है, जब कुछ लोग उन्हें बड़ी अभद्रता से देखते हैं। वे तो यह भी कहने से नहीं चूकते कि चुनाव आयोग को करोड़ों रुपये मतदाता जागरूकता के नाम पर यूं ही खर्च करने की जगह ऐसी महिलाओं को पोलिंग बूथ पर भेजना चाहिए। ऐसी भद्दी सोच से मन क्षुब्ध हो उठता है। जब समाज के लोगों की ऐसी सोच होगी, तो महिलाएं खुद के सुरक्षित होने की आखिर कल्पना भी कैसे कर सकेंगी?

स्वालिहा

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