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मूल्यपरक पत्रकारिता जरूरी

बीते दिनों अनेक अंकों में अभिनंदन का अभिनंदन व पुलवामा संबंधी समाचार पढ़े। लगा, जैसे 1971 के युद्ध काल में लौट आया हूं। उन दिनों मैं रक्षा मंत्रालय के साप्ताहिक पत्र ‘सैनिक समाचार’ के अंग्रेजी संस्करण का संपादक था, जिसमें तीनों सेनाओं से संबंधित समाचार छपा करते थे। तब मीडिया के वरिष्ठ अधिकारियों और गैर-सरकारी युद्ध-पत्रकारों को भी युद्ध रिपोर्टिंग का प्रशिक्षण दिए जाने के कारण न तो आज की तरह शत्रु पक्ष के हित में विपक्ष के नेताओं के बयान छपते थे और न ही सेना पर कोई उंगली उठाता था। आज पेड व फेक न्यूज पत्रकारिता के कारण सामाजिक, आर्थिक व साइबर अपराध बढ़ते ही जा रहे हैं। सोशल मीडिया जनजीवन पर इस कदर हावी होता जा रहा है, जिसमें झूठ और सच का पता ही नहीं चलता। अत: स्वस्थ एवं मूल्यपरक पत्रकारिता के लिए वैश्विक स्तर पर प्रयास करने की आवश्यकता है, तभी भस्मासुरी तकनीकी युद्ध से लड़ा जा सकता है।
डॉ श्याम सिंह शशि, बी-4/245, सफदरगंज एनक्लेव, नई दिल्ली- 110029

उचित नजरिया
लेखिका आरती आर जेरथ का राजनीतिक क्षेत्र में महिलाओं की कम भागीदारी के लिए आवाज उठाना एक अच्छा कदम है। जब देश की आधी आबादी जीवन के हर क्षेत्र में अब अपनी उत्कृष्ट क्षमता का परिचय दे रही है, तो फिर राजनीति के क्षेत्र में उसे पीछे क्यों रखा गया है? इसमें कोई दोराय नहीं कि भारत जैसे पुरुष प्रधान देश में महिलाएं अपनी जिम्मेदारियों को कहीं अधिक ईमानदारी, निष्ठा और निष्पक्षता के साथ निभा रही हैं। इसका प्रमाण देश की रक्षा मंत्री, विदेश मंत्री व कपड़ा मंत्री समेत सैकड़ों महिलाएं हैं, जो अपने-अपने क्षेत्र में सफलता के साथ देश का नाम रोशन कर रही हैं। आज जब देश वैश्विक स्तर पर सफलता की बुलंदियों को छू रहा है, तब आवश्यक हो जाता है कि राजनीतिक क्षेत्र में भी उसकी हिस्सेदारी बढ़ाई जाए, ताकि यहां भी वह अपनी उत्कृष्ट प्रतिभा का प्रदर्शन कर सके।
अनुपमा अग्रवाल, आगरा रोड, अलीगढ़

पंच बनाम परमेश्वर
वह जमाना प्रेमचंद का था, जब पंच परमेश्वर होते थे। सियासत ने पंच और परमेश्वर को आमने-सामने ला खड़ा किया है। आज पंच बनाम परमेश्वर का मामला जन-अदालत में है। देश की सबसे बड़ी अदालत ने करोड़ों हिंदुओं की आस्था के सबसे बडे़ मामले को मध्यस्थों के हवाले कर दिया है। उम्मीद है कि इस मामले से जुड़े सभी पक्षों में समझौते से एक नया रास्ता निकलेगा, जो भाईचारगी की नई मिशाल पेश कर सके। बेशक मसला पेचीदा है, जहां सियासत हमें आगे बढ़ने नहीं देती, वहीं आस्था पीछे हटने नहीं देती। सवाल यह है कि रामलला की खातिर हम दो कदम बढ़ने से पीछे क्यों हट जाते हैं?
एम के मिश्रा, रातू, रांची, झारखंड 

जान से खेलते डिलीवरी ब्वॉय 
पिछले 70 वर्षों में हमारा देश तकनीकी क्षेत्र में बहुत आगे आया और उसने अनेक ऊंचाइयां हासिल की हैं। निस्संदेह, यह एक खुशी की बात है। आज हर कोई घर बैठे-बैठे खाना मंगवा रहा है। बाजारों में इसकी होड़ सी लगी है। लेकिन इससे जुड़े गंभीर पहलुओं को कोई देखना नहीं चाहता। जो युवा डिलीवरी करने आते हैं, वे वाहन चलाते वक्त अधिकतर फोन पर बातें कर रहे होते हैं। ये लोग कानून का तो उल्लंघन कर ही रहे हैं, अपनी जान भी जोखिम में डाल रहे हैं। डिलीवरी ब्वॉयज समय से पहुंचने की जल्दी में इतनी तेजी से वाहन चलाते हैं, जिससे सड़क दुर्घटनाएं बढ़ रही हैं। ट्रैफिक पुलिस को इस पर ध्यान देना होगा। लोगों के अंदर भी जागरूकता लाने की जरूरत है। डिलीवरी का समय बढ़ाया जाए, ताकि इससे किसी की जान न जाए।
आशीष, राम लाल आनंद कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय

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  • Web Title:mail box hindustan column on 14 March