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चुनाव लड़ने की योग्यता

लोकतंत्र के जो रक्षक, उम्मीदवार के रूप में सामने आते हैं, उनकी योग्यता की एक बार चुनाव आयोग को जरूर समीक्षा करनी चाहिए। सरकार को एक ऐसी समिति का गठन करना चाहिए, जो प्रत्याशियों की योग्यता का पैमाना तय करे। वही लोग चुनाव लड़ सकें, जो प्रतिनिधि बनने के योग्य हों। पिछले कई वर्षों से देखा जा रहा है कि बड़े अपराधों के आरोपों के बावजूद लोग चुनाव लड़ लेते हैं, प्रतिनिधि बन जाते हैं। जो बिल्कुल शिक्षित नहीं हैं, उनको भी चुनाव में आराम से टिकट मिल जाता है। और ऐसे अयोग्य लोग, जो राजनीतिक परिवार से संबंधित होते हैं, उन्हें भी आसानी से टिकट मिल जाता है, जिसके कारण लोकतंत्र में गलत लोग चुनकर आ जाते हैं। ऐसा होता रहा, तो भारत के लिए परिणाम बुरे होंगे। इसीलिए जल्द से जल्द एक ऐसी कमेटी का गठन हो, जो चुनाव लड़ने की योग्यता का नया पैमाना तय करे। 
राहुल वर्मा, सत्यवती कॉलेज

 

मतदान का महत्व 
लोकतंत्र के प्रमुख उत्सव का बिगुल बज चुका है। चुनाव आयोग जागरूक है, कोई कसर बाकी नहीं छोड़ रहा है। इसके बावजूद विघ्नकारी तत्व चुनाव कार्यक्रम में कमियां खोजने में जुटे हैं। कोई अपने धार्मिक आधार पर चुनाव की तारीखों पर प्रश्नचिन्ह लगा रहा है, कोई अन्य कमियां खोज रहा है। कौन नहीं जानता कि भारत विभिन्न संस्कृतियों एवं परंपराओं का देश है। सबकी अपनी-अपनी आस्थाएं हैं, किंतु सवाल यह है कि क्या कोई व्यक्तिगत धर्म राष्ट्रधर्म से ऊपर हो सकता है? समस्याएं तो किसी न किसी के साथ सदैव रहती ही हैं, सो अपने मताधिकार का प्रयोग करने में कोई व्यक्तिगत समस्या आडे़ नहीं आनी चाहिए।
सुधाकर आशावादी, ब्रह्मपुरी, मेरठ

 

स्वयं से शुरू 
बढ़ते प्रदूषण के कारण देश के हालात बद से बदतर होते जा रहे हैं। हर कोई एक दूसरे को जिम्मेदार ठहराता है। इस प्रदूषण से निपटने के लिए सरकार ने न जाने कितनी योजनाएं बना डालीं, किंतु यथोचित सुधार की कोई आशा नहीं है। यदि वास्तव में हमें अपने देश को बुलंदियों पर देखना है, तो उसके लिए हमें स्वयं आगे आना होगा। हमें खुद में परिवर्तन करना पड़ेगा, तभी हम दूसरों से परिवर्तन की आशा कर सकेंगे। अपने देश को सुंदर और स्वच्छ बनाने के लिए हमें स्वयं को बदलना होगा। हम अकेले पूरे भारत को साफ नहीं कर सकते, लेकिन मेरे जैसे लाखों युवा स्वयं को बदलने की प्रतिभा अर्जित कर लेते हैं, तो कोई भी हमें दुनिया में सबसे स्वच्छ देश बनने से नहीं रोक सकता। देश का भविष्य हमारे हाथों में ही है।
संध्या, आंबेडकर कॉलेज (डीयू)

 

निरर्थक बयान रोकें 
देश में बेतुके और निरर्थक बयानों की बाढ़ आई हुई है, इसके लिए किसी एक को जिम्मेदार ठहराना न्यायपूर्ण नहीं होगा। बहती गंगा में सब हाथ धो रहे हैं। इन बयानों को देख-सुन-पढ़कर ऐसा लगता है, हम मजाक बनकर रह गए हैं। अब तो ऐसी बयानबाजी पर सख्ती से रोक लगाने की कानूनी कवायद होनी चाहिए। केवल वही बोला जाए, जो देशहित, जनहित में हो। 
हेमा हरि उपाध्याय 
जावरा रोड, खाचरोद, उज्जैन

 

लोकतंत्र का महाकुंभ 
एक तरफ यह चुनावी महाकुंभ चुनाव आयोग के लिए चुनौती भरा है, वहीं दूसरी तरफ, भाजपा की असली परीक्षा है। एक ओर, इस महाकुंभ में लोगों को सरकार के कार्यकाल का मूल्यांकन करने का मौका मिलेगा, वहीं दूसरी ओर, महागठबंधन को भाजपा को हराने के लिए इस परीक्षा को पास करना होगा। तारीखों का एलान होने के बाद जाहिर है, अब आरोप-प्रत्यारोप का सिलसिला प्रारंभ हो जाएगा। 
 अभयजीत कुमार सिंह, दिल्ली

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  • Web Title:mail box hindustan column on 13 March