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स्वार्थ की राजनीति 

इतिहास से सबक सीखना शर्म की बात नहीं होनी चाहिए। जिस प्रकार इन दिनों अनुसूचित जाति बनाम सवर्ण को लेकर राजनीतिक घमासान हो रहा है, उसे देखकर लगता है कि आज उन अंग्रेज शासकों की आत्मा फूली नहीं समा रही होगी, जिन्होंने अपना दबदबा बनाने के लिए जातिगत राजनीति का जहर घोला था। दुर्भाग्य तो यह है कि आजादी के सात दशक के बाद भी जाति का यह जहर हमारे समाज में कायम है। बल्कि यह निरंतर बढ़ता ही जा रहा है और वोट के आकांक्षी नेता इस पर अपने स्वार्थ की रोटियां सेंकने से बाज नहीं आ रहे हैं। देश की जनता को यह खेल भली-भांति समझ लेना चाहिए। इस तरह की राजनीति अब खत्म होनी चाहिए।
रंजीत सिंह, मेरठ
ranjitvskmeerut@gmail.com
चढ़ते दाम
चौतरफा दबाव के बावजूद पेट्रोल-डीजल की कीमतों का बढ़ना दर्शाता है कि सरकार जनता की तकलीफों के प्रति बेपरवाह है। आंखें मूंदकर बैठी सरकार को राहत के तत्काल जरूरी कदम उठाने चाहिए, पर ऐसा नहीं हो रहा है। मनमोहन सिंह सरकार के समय जब आज का सत्ता पक्ष विपक्ष में था, तब बढ़े दामों पर रोज हंगामा मचाया करता था। मगर आज वह चुपचाप बैठा है। न ही सरकारी खजाने से जनता को कोई राहत दी गई है, न ही एक्साइज ड्यूटी घटाई गई है। चूंकि नेताओं को मुफ्त में तेल, बिजली, आवास की सुविधा मिल जाती है, इसलिए इन्हें आम लोगों के दुख का अंदाजा नहीं होता। बेहतर होगा कि इन्हें मिलने वाली तमाम सुविधाएं छीन ली जाएं, तभी इन्हें महंगाई का एहसास होगा।
वसीम राजा
 जामिया मिल्लिया इस्लामिया,  दिल्ली
wasraj1@gmail.com
बंद में बवाल 
लोकतंत्र में सरकार की गलत नीतियों का विरोध बेहद जरूरी है। फिर चाहे वह देश के नागरिकों द्वारा हो या फिर विपक्षी पार्टियों द्वारा। मगर जब विरोध-प्रदर्शन की आड़ में राजनीति का गंदा खेल खेला जाता है, तो वह हानिकारक साबित होता है। पिछले कुछ दिनों के अंदर विभिन्न संगठनों और राजनीतिक पार्टियों द्वारा किए गए भारत बंद ने ऐसे ही कई सवाल खड़े किए हैं। आखिर ‘भारत बंद’ के नाम पर की गई हिंसा और तोड़-फोड़ के नुकसान की भरपाई करने की जिम्मेदारी किसकी है? तेल की बढ़ती कीमतों के खिलाफ विपक्ष के बंद में राजधानी दिल्ली में शांतिपूर्ण प्रदर्शन देखने को मिला, लेकिन बिहार, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र में जमकर बवाल काटा गया। इससे लाखों रुपये का नुकसान देश को उठाना पड़ा है। हिंसा और तोड़-फोड़ पर उतारू ये लोग आखिर क्यों भूल जाते हैं कि जिस संपत्ति का वे नुकसान कर रहे हैं, वह हमारे-आपके द्वारा दिए गए टैक्स से ही तैयार हुई है। इसकी भरपाई भी सरकार टैक्स में वृद्धि करके ही करेगी। इसलिए जब कभी हड़ताल व बंद का आह्वान कर सार्वजनिक संपत्ति को चोट पहुंचाएं, तो यही समझें कि आप दूसरे की नहीं, अपनी संपत्ति का नुकसान कर रहे हैं।
पीयूष कुमार, नई दिल्ली
piyushkumar9570399320@gmail.com
मौत का सीवर
यह दुख की बात है कि हमारे देश में आज भी लोगों की मौत सफाई के दौरान हो रही है। देश में एक तरफ स्वच्छता की मुहिम चल रही है, तो दूसरी तरफ मोती नगर का दर्दनाक हादसा सामने आ गया। आखिर इसके लिए जिम्मेदार कौन है? तमाम टेक्नोलॉजी होने के बावजूद आज भी ऐसी घटनाएं सामने आ रही हैं। दरअसल, हमारे देश को भ्रष्टाचार ने अंदर से इतना खोखला कर दिया है कि इसकी कीमत गरीब लोगों को चुकानी पड़ रही है। सुरक्षा उपकरण की खरीद के लिए धन आए होंगे, पर ऊपर ही ऊपर उसकी बंदरबांट हो गई होगी। ऐसी घटनाओं से हमें सीख लेने की जरूरत है। सरकार को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि सीवर की सफाई के दौरान अब किसी की मौत नहीं होगी।
आशीष, दिल्ली
ashishgusain234@gmail.com

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