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अच्छे खेल का प्रदर्शन

भारतीय क्रिकेट टीम का वल्र्ड कप का सफर सेमीफाइनल में न्यूजीलैंड से हारकर समाप्त हो चुका है। शुरू से ही विश्व विजेता की प्रबल दावेदार टीम के सेमीफाइनल में इस तरह हारने से प्रशंसकों में खासी नाराजगी और मायूसी है, जो लाजिमी है। जीतने पर प्रशंसा और हारने पर आलोचना कोई नई बात नहीं है। हालांकि भारतीय टीम नंबर वन जरूर है, परंतु यदि समीक्षा की जाए, तो नंबर चार और पांच पर बल्लेबाजी किसे दी जाए, इस सवाल के साथ हमारी टीम वल्र्ड कप में गई थी। एक बड़े टूर्नामेंट में नंबर चार पर खेलने के लिए किसी अनुभवी खिलाड़ी को न ढूंढ़ पाना टीम इंडिया की सबसे बड़ी भूल साबित हुई। फिर भी, हार और जीत खेल का हिस्सा है और इसे इसी रूप में लेना उचित होगा।

विजेंद्र सिंह


पेड़ों को बचाना होगा

बारिश के इस मौसम में देश-प्रदेश में करोड़ों रुपये खर्च करके पौधे लगाए जाएंगे। वर्ष दर वर्ष पौधे लगाने का यह क्रम जारी है, जो बहुत जरूरी भी है। मगर परेशानी की बात यह है कि हर वर्ष बड़े-बड़े पेड़ों को निर्बाध रूप से काटा भी जा रहा है। इस काम में लकड़ी माफिया लगा है। रोके जाने पर रेत माफिया की तरह ये भी मरने-मारने पर उतारू हो जाते हैं। न इनको सरकार का डर है, न पुलिस का खौफ। इसीलिए नए पौधों को लगाने के साथ-साथ जरूरी यह भी है कि पेड़-पौधों को लकड़ी माफिया से बचाया जाए। इसे लेकर सरकार को सख्ती दिखानी पड़ेगी। जब तक इस दिशा में कठोर कानून नहीं बनेगा, तब तक वृक्षों की गैर-कानूनी कटाई को रोकना कठिन है।

हेमा हरि उपाध्याय, उज्जैन


जाति की जंजीर

देश की अर्थव्यवस्था को 50 खरब डॉलर करने के लिए सरकार एड़ी-चोटी का जोर लगा रही है। गगनयान से मानव को अंतरिक्ष में भेजने की तैयारी चल रही है। वैज्ञानिक चंद्रयान-2 पर भी जमकर काम कर रहे हैं। 21वीं सदी के 19वें वर्ष में हम एक नया भारत बनाने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ना चाहते। मगर दूसरी तरफ, जब यह सुनते हैं कि एक दलित युवक को इसलिए मार दिया गया, क्योंकि उसने ऊंची जाति की एक लड़की से शादी कर ली, तो दिल उदास हो जाता है। इसी तरह, जब ऐसी खबरें आती हैं कि एक दलित की बारात को रोकने के लिए सवर्णों द्वारा सड़क को जाम कर दिया गया, या दलित दूल्हे को मंदिर में जाने से रोका गया, तो मन खिन्न हो जाता है। दलित उत्पीड़न की ऐसी घटनाएं कमोबेश पूरे देश से आती रहती हैं। सच्चाई तो यह भी है कि ऐसी चंद घटनाएं ही दर्ज हो पाती हैं, जबकि सैकड़ों वारदातों में दलित डरकर पुलिस में शिकायत ही नहीं दर्ज कराते। क्या पाषाण युग वाली इस मानसिकता के रहते भारत का विश्व गुरु बनने का ख्वाब पूरा हो सकता है?

जंग बहादुर सिंह
 जमशेदपुर, झारखंड


दूसरा पक्ष भी देखें

नश्तर कॉलम में राजेंद्र धोड़पकर का ‘इतना आसान न था विद्वान होना’ शीर्षक व्यंग्य पढ़ा। सोशल मीडिया पर निशाना साधते हुए लेखक ने कहा कि आजकल विद्वान होना काफी ज्यादा आसान हो गया है। उनके विचार अपनी जगह पर सही हैं, लेकिन सच यह भी है कि सोशल मीडिया का इस्तेमाल सिर्फ बेवजह की बातें और संदेश के लिए नहीं, बल्कि संजीदा काम करने के लिए भी किया जा रहा है। कई लोग सोशल मीडिया को लेकर गंभीर हैं और वहां प्रेरक बहस को जन्म देते हैं। रही बात लेखक द्वारा यह लिखने की कि सोशल मीडिया ने लोगों को ऑलराउंडर बना दिया है, तो यह बात बिल्कुल सही जान पड़ती है। दरअसल, किताब न मिलने की सूरत में ऑनलाइन ही तमाम तथ्य जान और समझ लिए जाते हैं, जिसका फायदा आखिरकार उपभोक्ता को ही होता है।

खुशबू संधु
 

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