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गरीब कौन

लोकसभा और राज्यसभा, दोनों सदनों से गरीब सवर्णों के लिए 10 फीसदी आरक्षण की मुहर लग चुकी है। मगर सवाल यह है कि क्या यह आरक्षण कोई बड़ा बदलाव ला पाएगा? नौकरियों में 10 फीसदी आर्थिक आरक्षण की व्यवस्था ठीक वैसे ही लगती है, जैसे किसी एक रोटी में से और 10 फीसदी टुकड़ा अलग कर देना। बजाय रोटी की संख्या बढ़ाने के यह व्यवस्था कितनी फायदेमंद होगी? सवर्णों को आरक्षण देने में बुराई नहीं है, लेकिन क्या यह सभी सवर्णों में प्रतियोगिता की पहले जैसी भावना रखेगा? केंद्र सरकार का यह कदम आगामी लोकसभा चुनाव की तरफ भी इशारा कर रहा है। हकीकत में गरीब सवर्ण तो वह है, जिसकी सालाना आय दो से तीन लाख रुपये है और जो अपना जीवन किसी किराये या छोटे मकान में बसर कर रहा है। अगर सरकार हकीकत में जनता की भलाई करना चाहती है, तो वह इस व्यवस्था में इस तरह के गरीबों को शामिल करे। अन्यथा यह वोट बैंक को लुभाने का प्रयास ही ज्यादा लगता है।

प्रिंस शर्मा, दिल्ली विश्वविद्यालय


तबादले की राजनीति

सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई निदेशक आलोक वर्मा को फिर से अपने पद पर जरूर बहाल कर दिया था, लेकिन इस फैसले के चंद घंटों के बाद ही केंद्र सरकार ने उन्हें अपने पद से हटाकर दूसरे विभाग में भेज दिया। केंद्र का यह कदम देश की सर्वोच्च अदालत के निर्णय को परदे में डालने जैसा है। अयोध्या मंदिर निर्माण, तीन तलाक जैसे मामलों पर तो सरकार अदालती निर्णय मानने की बात कहती है, मगर सीबीआई निदेशक के अदालती फैसले पर वह तबादले की राजनीति करती है। आखिर यह विरोधाभास क्यों? आगामी आम चुनाव में केंद्र सरकार को ऐसे ही ज्वलंत और तीखे सवालों का सामना करना होगा।

मदनलाल लंबोरिया भिरानी


हमें संभलना होगा

सड़क दुर्घटनाएं दिन-प्रतिदिन बढ़ती ही जा रही हैं। इससे हमारे देश की जीडीपी को प्रतिवर्ष तीन फीसदी का नुकसान हो रहा है। हेलमेट और सुरक्षा नियमों का सही से पालन न करने की वजह से भारत में सड़कों पर इतनी ज्यादा मौतें हो रही हैं। इसीलिए हमें यात्रा करने के दौरान सुरक्षा को ज्यादा तवज्जो देनी चाहिए। हमारा यह कदम कई जिंदगियों को बर्बाद होने से रोक सकता है।

नेहा कुमारी, दिल्ली 


सवालों में सरकार

केंद्र सरकार इस बात से भलीभांति परिचित है कि 50 फीसदी से अधिक आरक्षण देना संविधान की मूल भावना के खिलाफ है। ऐसे लोक-लुभावन प्रयास पहले भी असफल हो चुके हैं। फिर भी, सरकार ने यह कदम उठा लिया। इससे पता चलता है कि अब सरकार का पूरा ध्यान लोकसभा चुनावों पर है। हालांकि विपक्षी दल भी इसी रास्ते पर चल रहे हैं। अपने कार्यकाल के अंतिम वर्ष में आरक्षण देना जहां सरकार की मंशा पर ढेरों सवाल खडे़ करता है, वहीं विपक्षी दलों ने भी इसका विरोध न करके अपनी स्वार्थपूर्ण रणनीति ही उजागर की है। जागरूक जनता पूरी गंभीरता के साथ यह सारा दृश्य देख रही है। इसका जवाब वह आने वाले चुनावों में देगी।

हितेंद्र डेढ़ा, चिल्ला गांव, दिल्ली


खत्म होती खेली 

खेली अब दिल्ली में लगभग खत्म हो गई है। पुरानी दिल्ली में एकाध बची भी है, तो उसकी हालत बदतर है। कभी ठेला या तांगा चलाने वालों के बैलों, घोड़ों और भैंसों के लिए जगह-जगह खेली बनाई जाती थी, जिनमें उनके लिए पीने का साफ पानी हुआ करता था। आज ठेले-तांगे तो कम हो ही गए हैं, उनमें जोते जाने वाले मवेशियों के प्रति भी लोग संजीदा नहीं दिखते। इसीलिए उन्हें मजबूरी में गंदा पानी पीना पड़ता है।
 
ललित भसोढ़
 

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