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मूर्तियों पर सियासत

आजादी के बाद से देश में मूर्तियों पर सियासी खेल खेला जा रहा है। यह खेल अपने समय-चक्र पर होता रहता है। अभी हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री मायावती के कार्यकाल में निर्मित मूर्तियों पर तल्ख टिप्पणी की। इससे बहनजी पर संकट के बादल मंडराते दिख रहे हैं, क्योंकि शीर्ष अदालत इन मूर्तियों पर हुए खर्च को मायावती से वसूलने पर गौर कर रही है। हालांकि  आश्चर्य की बात यह है कि खुद संविधान निर्माता बाबा साहेब आंबेडकर मूर्ति-पूजा के विरोधी रहे, लेकिन सियासी खेल के कारण उनके साथ होने का दावा करने के लिए तमाम दलों ने उनकी प्रतिमाएं लगवाईं। सभी पार्टियों में अपने दल के नायकों और प्रतीकों की प्रतिमाएं लगवाने की होड़ रहती है। मुश्किल यह है कि ये दल विपक्ष में रहते हुए तो इसका खूब विरोध करते हैं, मगर सत्ता में आते ही मूर्तियों की सियासत शुरू कर देते हैं।   

 सुमित बोरा शुक्ला, लखनऊ

हिंदी का सम्मान

भारत में आज भी न्यायपालिका के क्षेत्र में हिंदी भाषा अभी तक अपनी उस तरह से पकड़ नहीं बना पाई है, जिस प्रकार से उसकी पकड़ होनी चाहिए थी। आज भी जिला अदालत से लेकर उच्चतम न्यायालय तक हिंदी उस सम्मान से वंचित है। मगर संयुक्त अरब अमीरात की अदालतों में अरबी और अंग्रेजी के बाद हिंदी को आधिकारिक भाषा का दर्जा दिया गया है। यह हमारे लिए सबक है। भले ही हम हिंदी को अंतरराष्ट्रीय रूप देने के नाम पर इसके प्रचार-प्रसार की बात करते हैं, लेकिन न्यायपालिका में हिंदी का वह दर्जा नहीं मिल सका है, जिसकी वह हकदार है। मौजूदा सरकार को इस विषय पर आवश्यक कदम उठाने चाहिए, और हिंदी को पर्याप्त प्राथमिकता देनी चाहिए।

विजय कुमार धनिया, नई दिल्ली

ऐसे वादे, जो पूरे हों

विपक्ष में रहकर सरकार की आलोचना करना बेहद आसान है और सरकार के विरुद्ध किसी की उचित-अनुचित मांग का आंख बंद करके समर्थन करना बहुत अच्छा लगता है। लेकिन जब वही पार्टी सत्ता में आती है, तो उसे हकीकत का एहसास हो जाता है। कांग्रेस ने राजस्थान में विपक्ष में रहकर गुर्जर आरक्षण का खुलकर समर्थन किया था और उनसे वादा किया था कि यदि वह राज्य की सत्ता में आई, तो गुर्जर आरक्षण को तुरंत मंजूरी देगी। अब चूंकि सत्ता में वह आ चुकी है, तो गुर्जरों ने अपनी पांच प्रतिशत आरक्षण की मांग कांग्रेस को याद दिलाई, पर अब पार्टी टालमटोल कर रही है। जो बात या मांग स्वीकार करने के योग्य न हो, उसका अपने राजनीतिक फायदे के लिए प्रयोग करना कहां तक युक्तिसंगत है? कांग्रेस सहित सभी दलों को चाहिए कि चुनाव पूर्ण वे वही वादे करें, जिन्हें पूरा करना उनके अधिकार-क्षेत्र में हों। मतदाताओं को बरगलाने की नीति बंद होनी चाहिए।

सतप्रकाश सनोठिया, रोहिणी

सुस्त प्रशासन

उत्तर प्रदेश में अवैध शराब के सेवन से चंद दिनों में सैकड़ों लोगों की मौत हो गई। सभी के परिजनों को राज्य सरकार की तरफ से मुआवजा देने की घोषणा की गई है। सवाल यह है कि सख्त आदेशों के बाद भी अवैध शराब का व्यापार भला कैसे संचालित हो रहा था? आबकारी व स्थानीय पुलिस की मिलीभगत इसमें साफ नजर आती है। पुलिसकर्मियों का काम जनता को सुरक्षा देना है, लेकिन वह अपना यह काम शायद ही ईमानदारी से कर रही है। बिना उसकी मिलीभगत के अवैध शराब का कारोबार हो ही नहीं सकता। यदि प्रशासन अपने कार्य के प्रति मुस्तैद हो, तो कोई भी अवैध व्यापार कभी अस्तित्व में नहीं आ सकेगा। पीड़ितों को सिर्फ मुआवजा देना ही सरकार का काम नहीं है। दोषी अधिकारियों के खिलाफ भी उसे सख्त कदम उठाने चाहिए।

विकास वर्मा, मोदीनगर, गाजियाबाद
 

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