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कैसे समाज में हैं हम 

हमारा समाज कितना संवेदनहीन हो चुका है, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि व्यक्तिगत दुश्मनी का बदला लेने के लिए र्दंरदों ने एक मासूम को इतनी खौफनाक मौत दे दी। यह कैसा समाज बनाया है हमने, जो एक तरफ तो कन्याओं की पूजा करता है, दूसरी ओर कन्या भू्रण हत्या करता है और ऑनर किलिंग के नाम पर बेटियों को मौत के घाट उतार देता है? हम 21वीं सदी में हैं। फिर भी यह बर्बरता! आखिर हम एक ऐसा समाज कब बनाएंगे, जिसमें स्त्री और पुरुष बराबर हों, जहां मासूम बच्चे अपने घर के बाहर निर्भय होकर खेल सकें? उम्मीद करती हूं कि लोग ऐसी घटनाओं से सबक लेंगे और गुस्से व स्वार्थ को अपने ऊपर इतना हावी नहीं होने देंगे कि उससे मानवता हार जाए। 

माधुरी राठौर, बिलसंडा, पीलीभीत 


अब सांसदों की बारी

जनता ने अपना जनादेश दे दिया। अब सत्ताधारियों की यह नैतिक जिम्मेदारी बनती है कि वे आम लोगों की सेवा को अपना फर्ज समझें, और उनकी समस्याएं दूर करें। अफसोस तो इस बात का है कि सरकार बन जाने के बाद सत्ताधारी आम जनता को भूल ही जाते हैं, या यूं कहें कि अगले चुनाव तक लंबी तानकर सो जाते हैं। बहुत कम सांसद ऐसे होंगे, जो पांच साल तक अपने-अपने संसदीय क्षेत्र की समस्याओं को जानने की कोशिश करते होंगे। वक्त का तकाजा है कि अब जिन सांसदों को जनता ने संसद तक पहुंचाया है, वे सदन में देशहित और जनहित में फैसले करें, न कि बिना वजह हो-हल्ला मचाकर संसद का समय बर्बाद करें। सत्ता व विपक्ष के सांसद अपने राजनीतिक द्वेष को संसद की दहलीज से बाहर रखकर उसमें प्रवेश करें। देश के मतदाताओं ने अपनी जिम्मेदारी निभा दी है, अब आपकी बारी है। जिस दिन सांसद अपने-अपने क्षेत्र की समस्याओं का हल निकालना शुरू कर देंगे, उस दिन सारा देश ही स्मार्ट बन जाएगा। 

राजेश कुमार चौहान, जालंधर


अब बचाव की गुंजाइश नहीं

केंद्र की अधिकांश योजनाएं राज्यों को ही लागू करनी होती हैं। आज देश के 16 राज्यों में भाजपा या फिर उसके सहयोगी दलों की सरकारें हैं। लेकिन दक्षिण में तमिलनाडु को छोड़ दें, तो कहीं भी भाजपा और सहयोगी दल की सरकार नहीं है। फिर कई गैर-भाजपा शासित राज्य केंद्र से असहयोग भी कर रहे हैं। ऐसे में, मोदी सरकार के लिए राज्यों का सहयोग लेकर अपनी नीतियों को लागू करना और बेहतर नतीजे देना मुश्किल हो सकता है। इस कठिनाई के बावजूद चूंकि मोदी सरकार प्रचंड बहुमत से सत्ता में आई है, इसलिए उसके पास अपने वायदों को पूरा करने से बचने के लिए किसी दलील की कोई गुंजाइश नहीं बची है। 

नवीनचंद्र तिवारी, रोहिणी, दिल्ली

दोषियों को तुरंंत सजा मिले 

देश भर में बच्चियों और महिलाओं के साथ हो रहे यौन अपराधों ने देश की कानून-व्यवस्था पर प्रश्नचिह्न लगा दिया है। भले ही कठुआ कांड में छह दोषियों को सजा सुनाई जा चुकी हो, किंतु अधिकतर मामलों में अपराधियों पर नकेल कसने में प्रशासन नाकाम रहता है। अलीगढ़ के टप्पल में बालिका की हत्या कर उसके अंग भंग करने वालों को कब सजा मिलेगी? यह सवाल मुंह बाए खड़ा है। विडंबना यह है कि किसी भी घटना की गहन जांच से पहले ही उसका ट्रायल सोशल मीडिया में प्रारंभ हो जाता है। जो लोग घटनास्थल के इर्द-गिर्द भी नहीं होते, वे अपने-अपने निर्णय सुनाने लगते हैं। इससे एक गलत परंपरा जन्म ले रही है। होना तो यह चाहिए कि पुलिस अपना कार्य संविधान के दायरे में पूरी मुस्तैदी और तत्परता से करे, मगर कई बार आरोपियों के समर्थन में तथाकथित मानवाधिकारवादी खड़े हो जाते हैं। जरूरी है कि अमानवीय और जघन्य कृत्यों की सजा शीघ्र व सख्त हो, ताकि कोई ऐसा अपराध करने का दुस्साहस न कर सके।

सुधाकर आशावादी
 ब्रह्मपुरी, मेरठ 

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