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संवेदनहीन समाज

गुरुवार को मौसम अचानक बदला और राजधानी दिल्ली समेत आसपास के इलाकों में बारिश व ओलावृष्टि होने लगी। बेमौसम बारिश से तापमान में गिरावट तो आई ही, किसानों के चेहरे पर भी मायूसी पसर गई। इस मौसमी कहर के कारण उनके खेतों में लगी सरसों, गेहूं, आलू व अन्य फसलों को भारी नुकसान पहुंचा है। मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में तो लाखों हेक्टेयर खेतों में लगी फसल बर्बाद हो गई। लेकिन शहरी समाज सोशल मीडिया पर इस ओलावृष्टि की तस्वीरें शेयर करके खूब खुशी जाहिर करता दिखा। शायद ही किसी ने किसानों की व्यथा की तरफ ध्यान दिया। जब आम लोग ही अन्नदाताओं की परेशानी नहीं समझेंगे, तो फिर हम सरकार से भला क्या अपेक्षा करें? बहरहाल, राज्य सरकारों को पीड़ित किसानों की हरसंभव सहायता करनी चाहिए, ताकि उनका दुख कम हो सके।

उपासना, दिल्ली विश्वविद्यालय


टिकटों का बंटवारा

आगामी लोकसभा चुनावों का शंखनाद होने वाला है। सभी प्रमुख दल एक्टिव मोड में आ गए हैं। छींटाकशी, जुमलेबाजी और आरोप-प्रत्यारोपों का सिलसिला शुरू हो चुका है। मगर सभी दलों को यह बात जरूर ध्यान में रखनी चाहिए कि तकनीक और सोशल मीडिया के इस युग में जागरूक जनता पूरी मुस्तैदी से सारा तमाशा देख रही है। इसीलिए टिकट बंटवारे से पहले सभी पार्टियों को अपने सांसदों के कामकाज का आकलन जरूर कर लेना चाहिए। उनकी सक्रियता, जनता के प्रति समर्पण, उनकी कार्यशैली, समयबद्धता, जनता के मुद्दों के प्रति उनकी तत्परता आदि पर नजरें डालकर ही उन्हें टिकट देना चाहिए। ऐसा इसलिए, क्योंकि सच्चे लोगों से ही अच्छे दिनों की उम्मीद होती है।

हितेंद्र डेढ़ा, चिल्ला गांव, दिल्ली


यौन शोषण के खिलाफ

आए दिन छोटे-छोटे बच्चे-बच्चियों के साथ यौन शोषण की खबरें आती रहती हैं। ज्यादातर मामलों में तो जान-पहचान या रिश्तेदारों पर ही आरोप लगते हैं। ऐसी घटनाएं सभ्य समाज पर धब्बा हैं। एक सर्वेक्षण बताता है कि देश में प्रत्येक दूसरा बच्चा यौन शोषण का शिकार होता है। समाज का ऐसी घटनाओं पर चुप्पी साधे रहना दरअसल इस समस्या के मूल में है। आज भी लोग बाल यौन शोषण पर खुलकर बात करने में सहज महसूस नहीं करते, जबकि कच्ची उम्र में शोषण का शिकार बनने वाले बच्चों का व्यक्तित्व बाद में पूरी तरह विकसित नहीं हो पाता। ऐसे में, बच्चों को उनके अधिकारों के प्रति जागरूक करना जरूरी है। सरकार के साथ-साथ गैर-सरकारी संस्थाओं को भी इस दिशा में काम करना चाहिए। असल में, इस अपराध पर नियंत्रण के लिए एक जनांदोलन की जरूरत है। फिर, बच्चों को भी समझाने की जरूरत है कि वे अकेले नहीं हैं। यदि उनके साथ कुछ गलत हो रहा है, तो वे अपने माता-पिता को बताएं।

प्रियेश कुमार, पतौरा, मोतिहारी


एप्प की विश्वसनीयता

तकनीक व प्रौद्योगिकी के इस युग में पढ़ाई के क्षेत्र में भी बड़ा बदलाव दिखने लगा है। पठन-पाठन को आसान बनाने के लिए नए-नए शैक्षिक एप्प दिखने लगे हैं। बच्चे भी किताबों की बजाय इन पर ज्यादा भरोसा करते हैं। यह सही है कि इससे बच्चों पर किताबों का बोझ कम होता है, लेकिन सवाल यह है कि ये एप्प भला कितने विश्वसनीय हैं? ये ‘वनवे कम्युनिकेशन’ की तरह लगते हैं, जहां पढ़ाई के दौरान पैदा हुई उलझन का तुरंत जवाब नहीं मिल सकता। ऐसी स्थिति में हमें क्यों नहीं किताबों पर ही भरोसा करना चाहिए? किताब प्रामाणिक होते हैं और उनमें विषयों की पर्याप्त जानकारी होती है, इसीलिए उन्हें विश्वसनीय शिक्षक भी माना जाता है। लिहाजा किताबों से पढ़ाई को ज्यादा महत्व दिया जाना चाहिए।

सौरभ पाठक, ग्रेटर नोएडा
 

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