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नदी-तालाबों की खुदाई

आजकल बारिश का मौसम है और इस मौसम में अपने यहां दो ही बातें होती हैं- या बाढ़ आती है या फिर सूखा पड़ता है। अफसोस की बात है कि आजादी के सात दशक के बाद भी हम इन प्राकृतिक आपदाओं के असर को कम करने का तरीका नहीं ढूंढ़ पाए हैं, जबकि राहत-कार्य के नाम पर काफी बड़ी धनराशि खर्च कर चुके हैं। मेरे विचार से इन दोनों समस्याओं का एक ही हल है, और वह है खुदाई। पुराने जमाने में हर गांव में पांच-सात या उससे अधिक तालाब होते थे, जिनमें बारिश का पानी जमा होता था। ये सब हमने खत्म कर दिए हैं। इस कारण बारिश का जो पानी इन तालाबों में जमा हो जाता था, वह अब बहकर बर्बाद हो जाता है। जरूरी है कि अधिक से अधिक तालाब खोदे जाएं और हर वर्ष बरसात से पहले उनकी गहरी खुदाई हो। इसी तरह, नदियों की खुदाई करके हम बाढ़ का मुकाबला कर सकते हैं। ये काम मुश्किल जरूर हैं, पर नई तकनीक से काम करना फायदेमंद होगा। 
सुरेन्द्र पाल सिंह
 राजनगर एक्सटेंशन, गाजियाबाद
surendra.oct9@gmail.com
प्रचार पर बेजा खर्च
केंद्र और राज्य सरकारों को अपनी योजनाओं में विज्ञापन को भी शामिल कर लेना चाहिए, क्योंकि योजना से जनता को लाभ होता हो या न होता हो, लेकिन विज्ञापन से सरकारों को लाभ जरूर होता है। सरकारें आती हैं, शासन करती हैं और चली जाती हैं, मगर छोड़ जाती हैं विज्ञापनों में योजनाएं। क्या हमारे शासक यह नहीं जानते कि योजना को बनाने के बाद यदि उसकी जमीनी हकीकत की समीक्षा की गई होती या देखा गया होता कि जरूरतमंदों को उसका कितना लाभ मिल रहा है, तो उन्हें जनता के पैसों से जनता के लिए बनाई गई नीति का गुणगान करने     के लिए किसी विज्ञापन का सहारा नहीं लेना पड़ता?  
दीपक सिंह नेगी, जनकपुरी, नई दिल्ली
negi.deepu.18@gmail.com
दरकती विपक्षी एकता
राज्यसभा के उप-सभापति चुनाव में विपक्षी दलों द्वारा साझा उम्मीदवार बनाए जाने के बाद भी सत्ता पक्ष को जीत हासिल हुई, जबकि आंकड़ों के गुणा-भाग में वह विपक्ष से पीछे था। इससे एक बार फिर साबित होता है कि विपक्ष पर बीजेपी की रणनीति भारी पड़ रही है। विपक्ष के पास संख्यात्मक रूप से ज्यादा वोट थे, लेकिन कांग्रेस सैद्धांतिक रूप से शिवसेना और बीजेडी जैसे दलों को अपने साथ करने में नाकाम रही। चूंकि आम चुनाव में अब ज्यादा समय नहीं बचा है। इसीलिए यह घटनाक्रम विपक्षी एकता का दावा करने वाले नेताओं के लिए किसी बड़े झटके से कम नहीं है। विपक्ष को बाहरी मंचों पर ही नहीं, सदन के भीतर भी एकता दिखानी होगी।
महेश कुमार, सिद्धमुख, राजस्थान

mkumar.sidhmukh@gmail.com
वीरान होते गांव
औद्योगिकीकरण के कारण बीते कुछ वर्षों में लोगों का पलायन गांवों से शहरों की तरफ तेजी से बढ़ा है। इससे एक तरफ जहां शहर आबादी के बोझ से कराह उठे हैं, वहीं गांवों का जीवन बोझिल हो गया है। दुखद है कि आजादी के 70 वर्षों के बाद भी हम शहरों व गावों के विकास की कोई संतुलित और सफल योजना नहीं बना सके हैं। आजादी के बाद तमाम सरकारों ने गांवों के विकास के वादे जरूर किए, लेकिन आज भी गांव विकास की परिकल्पना से दूर हैं। गांव में रोजगार के साधन न होने से लोग शहरों की तरफ रुख करते हैं। इसका नतीजा यह होता है कि शहर पर बोझ बढ़ता है और उसके बाहरी इलाकों में झुग्गी-झोपड़ियों और कच्ची कॉलोनियों का विकास होता है। अगर हम शहरों को वास्तव में स्मार्ट बनाना चाहते हैं, तो सबसे पहले हमें शहरों में बढ़ती इस अमीरी-गरीबी के अंतर को खत्म करना होगा। इसके लिए गांवों पर कहीं ज्यादा ध्यान देना होगा। समावेशी विकास ही हमारे देश को आगे ले जाएगा।
अनीस शीराजी
कुन्दरकी, मुरादाबाद
shirazi80@gmail.com

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  • Web Title:mail box hindustan column on 11 august